Class 8 Hindi Malhar Chapter 3 Ek Aashirwad | एक आशीर्वाद कविता भावार्थ एवं प्रश्नोत्तर

Sooraj Krishna Shastri
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एक आशीर्वाद

तृतीयः पाठः (पाठ ३) — मल्हार (कक्षा ८)
  • १. मूल कविता (दुष्यंत कुमार रचित प्रेरक एवं ओजस्वी कविता)
  • २. कवि-परिचय & पाठ का सारांश (दुष्यंत कुमार का साहित्यिक परिचय एवं मूल भाव)
  • ३. कविता का सम्पूर्ण विस्तृत भावार्थ (पद-वार सरल व्याख्या)
  • ४. मेरी समझ से & मिलान करें (MCQs एवं स्तम्भ मिलान)
  • ५. पंक्तियों पर चर्चा & सोच-विचार (विस्तृत प्रश्नोत्तर)
  • ६. भाषा की बात & व्याकरण (संज्ञा-क्रिया सम्बन्ध, बेमेल शब्द/पर्यायवाची)

मूल कविता, सारांश एवं कवि-परिचय

जा,
तेरे स्वप्न बड़े हों
भावना की गोद से उतरकर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें
चाँद-तारों-सी अप्राप्य सच्चाइयों के लिए
रूठना-मचलना सीखें
हँसें
मुसकराएँ
गाएँ
हर दीये की रोशनी देखकर ललचाएँ
उँगली जलाएँ
अपने पाँवों पर खड़े हों।
जा,
तेरे स्वप्न बड़े हों।

पाठ का सारांश

'एक आशीर्वाद' दुष्यंत कुमार द्वारा रचित एक अत्यंत ओजस्वी और नई पीढ़ी को नई दिशा देने वाली कविता है। इसमें कवि बच्चों व युवाओं को केवल काल्पनिक दुनिया में न खोकर जीवन में बड़े और ऊँचे लक्ष्य (सपनों) को निर्धारित करने का आशीर्वाद देते हैं। कवि चाहते हैं कि सपने केवल भावना तक सीमित न रहें, बल्कि वे धरातल पर उतरकर वास्तविक जीवन की सच्चाइयों से टकराएँ, ज्ञान की हर लौ से जुड़ें, चुनौतियों का सामना करते हुए असफलता से भी सीखें और अंततः आत्मनिर्भर बनकर जीवन में विजय प्राप्त करें।

कवि-परिचय (दुष्यंत कुमार)

दुष्यंत कुमार (1933–1975) हिंदी साहित्य के अत्यंत लोकप्रिय कवि, नाटककार एवं आधुनिक गज़लकार थे। उनका जन्म राजपुर नवादा, बिजनौर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। बहुत कम उम्र में ही उन्होंने हिंदी कविता को अपनी विविध रचनाओं और जीवंत, ओजपूर्ण भाषा से समृद्ध किया। उनका गज़ल-संग्रह 'साये में धूप' हिंदी साहित्य की कालजयी कृतियों में गिना जाता है। उनका संपूर्ण रचना-संसार 'दुष्यंत कुमार रचनावली' (चार खंडों) में प्रकाशित है।

कविता का विस्तृत सम्पूर्ण भावार्थ

प्रथम भाग: "जा, तेरे स्वप्न बड़े हों... चलना सीखें"

भावार्थ: कवि बच्चों एवं युवा वर्ग को हृदय से आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि तुम्हारे जीवन के सपने और लक्ष्य बहुत बड़े तथा ऊँचे हों। वे केवल कोरी कल्पनाओं या भावनाओं के सुंदर झूले में न झूलते रहें, बल्कि जल्द ही धरातल पर उतरकर यथार्थ की भूमि पर चलना सीखें। इसका अर्थ है कि अपने सपनों को केवल सोच में न रखें, उन्हें पूरा करने के लिए व्यावहारिक जीवन में कार्य करना शुरू करें।

द्वितीय भाग: "चाँद-तारों-सी अप्राप्य सच्चाइयों के लिए... रूठना-मचलना सीखें"

भावार्थ: कवि प्रेरित करते हुए कहते हैं कि जो लक्ष्य पहली नज़र में असंभव, दूर या चाँद-तारों जैसे अप्राप्य प्रतीत होते हैं, उन्हें पाने के लिए हठ करना, रूठना और संघर्ष करना सीखो। बच्चे जिस प्रकार किसी वस्तु को पाने के लिए मचलते हैं, उसी प्रकार युवाओं में भी अपने बड़े और कठिन से कठिन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अटूट जिद और तड़प होनी चाहिए।

तृतीय भाग: "हँसें, मुसकराएँ, गाएँ... उँगली जलाएँ, अपने पाँवों पर खड़े हों।"

भावार्थ: जीवन के हर क्षण में प्रसन्नता, उत्साह और उमंग का भाव बना रहे— वे हँसें, मुस्कुराएँ और गीत गाएँ। ज्ञान और अवसर की जहाँ भी रोशनी (दीपक) दिखे, उसे पाने के लिए ललचाएँ। लक्ष्य-प्राप्ति के मार्ग में आने वाली मुश्किलों, जोखिमों और कष्टों (उँगली जलाने) से न घबराएँ, क्योंकि अनुभव का ताप ही इंसान को निखारता है। अंत में कवि आशीर्वाद देते हैं कि तुम अपने सामर्थ्य पर पूर्णतः आत्मनिर्भर बनो और अपने पाँवों पर खड़े होकर एक महान जीवन जियो।

अभ्यास-कार्यम् : मेरी समझ से एवं मिलान

१. कविता में किसे संबोधित किया गया है?
उत्तर: बच्चों / युवा वर्ग को।
२. "तेरे स्वप्न बड़े हों" पंक्ति में 'स्वप्न' से क्या आशय है?
उत्तर: आकांक्षाएँ और रुचियाँ रखना तथा बड़े लक्ष्य निर्धारित करना।
३. "उँगली जलाएँ" पंक्ति में उँगली जलाने का भाव है—
उत्तर: चुनौतियों को स्वीकार करना एवं कष्टों से नहीं घबराना।
४. "अपने पाँवों पर खड़े हों" पंक्ति से क्या आशय है?
उत्तर: आत्मनिर्भर होना।

मिलकर करें मिलान (स्तम्भ १ एवं स्तम्भ २)

स्तम्भ १ (कविता की पंक्ति) स्तम्भ २ (सही भाव / संदर्भ)
१. भावना की गोद से उतरकर जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें भावनाओं में न बहकर वास्तवकिता का सामना करना।
२. हर दीये की रोशनी देखकर ललचाएँ विविध ज्ञान के प्रति आकृष्ट होना और उसे पाने की ललक होना।
३. चाँद-तारों-सी अप्राप्य सच्चाइयों के लिए रूठना-मचलना सीखें असंभव से लगने वाले लक्ष्यों के लिए हठ और प्रयास करना।
४. हँसें / मुसकराएँ / गाएँ सपनों को आनंद और मुस्कुराहटों में बदलें। कठिन परिस्थितियों में भी मनोबल बनाए रखें।

अभ्यास-कार्यम् : पंक्तियों पर चर्चा एवं सोच-विचार

(क) "जा, तेरे स्वप्न बड़े हों" पंक्ति से कवि क्या संदेश देना चाहते हैं?
उत्तर: कवि नई पीढ़ी को यह संदेश देना चाहते हैं कि वे अपनी दृष्टि को व्यापक बनाएँ और छोटी-मोटी इच्छाओं में न उलझकर बड़े, ऊँचे और राष्ट्र-कल्याण से जुड़े महान लक्ष्य निर्धारित करें।
(ख) "जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें" से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: इसका तात्पर्य यह है कि सपनों को केवल मन की कल्पना में न रखकर, उन्हें यथार्थ और व्यावहारिक धरातल पर लाने के लिए ठोस कदम उठाना सीखें।
(ग) "हर दीये की रोशनी देखकर ललचाएँ/उँगली जलाएँ" पंक्ति का क्या आशय है?
उत्तर: इसका आशय है कि ज्ञान, प्रकाश और नए अवसरों को पाने के लिए मन में तड़प होनी चाहिए और उस मार्ग में यदि कुछ कष्ट या असफलता (उँगली जलना) भी मिले तो उसका साहसपूर्वक सामना करना चाहिए।
(घ) आपके अनुसार बड़े सपने कौन-कौन से हो सकते हैं और क्यों?
उत्तर: बड़े सपने वे हैं जो केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित न होकर समाज, देश और मानवता के उत्थान में योगदान दें; जैसे— वैज्ञानिक बनकर मानव सेवा करना, श्रेष्ठ शिक्षक या डॉक्टर बनना, अथवा पर्यावरण रक्षा करना।
(ङ) सपनों और लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ललक के साथ और क्या-क्या होना आवश्यक है?
उत्तर: ललक के साथ-साथ सुदृढ़ योजना, निरंतर अभ्यास, कड़ी मेहनत, धैर्य, अनुशासन और असफलता के बाद पुनः खड़े होने का साहस आवश्यक है।

भाषा की बात (व्याकरण एवं शब्द-ज्ञान)

(क) 'स्वप्न' शब्द से जुड़े विभिन्न शब्द

सम्बद्ध शब्द: लक्ष्य, आकांक्षा, कल्पना, यथार्थ, परिश्रम, सफलता, आत्मनिर्भरता, योजना, प्रेरणा, दृढ़ निश्चय।

(ख) बेमेल शब्द पर घेरा (समान अर्थ न देने वाले शब्द)

शब्द समानार्थक शब्द बेमेल शब्द (समान अर्थ नहीं देते)
पृथ्वीधरा, वसुधा, अवनिसुता (बेटी)
चाँदशशि, निशाकर, मयंकमधुकर (भौंरा)
तारेनक्षत्र, तारक, उडुगणसोम (अमृत/चंद्रमा)
रोशनीप्रकाश, उजाला, आलोकलालिमा (लाल रंग)
स्वप्नसपना, कल्पना, इच्छायथार्थ (वास्तविकता/विलोम)
दीयाज्योति, दीपक, प्रदीपदीन (गरीब/दुखी)

(ग) शीर्षक की सार्थकता

इस कविता का शीर्षक 'एक आशीर्वाद' सर्वथा उपयुक्त और सार्थक है, क्योंकि पूरी कविता में एक अग्रज/कवि नई पीढ़ी और बाल-मन को जीवन में साहसी, उच्च-महत्वाकांक्षी और आत्मनिर्भर बनने का पावन आशीर्वाद व शुभकामनाएँ दे रहा है।

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