महर्षि कपोत (Maharishi Kapota)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि कपोत: भगवान शिव के 8वें योगावतार और ज्ञान के प्रदीप्त पुंज

महर्षि कपोत: भगवान शिव के 8वें योगावतार और सांख्य ज्ञान के संरक्षक

एक शोधपरक आलेख: योगावतार परंपरा और महर्षि कपोत का दार्शनिक महत्व (The 8th Yogavatara of Lord Shiva)

भारतीय शैव पुराणों (जैसे शिव पुराण और लिंग पुराण) के अनुसार, प्रत्येक द्वापर युग में भगवान शिव योग विद्या की पुनर्स्थापना के लिए एक विशिष्ट रूप में अवतरित होते हैं। इसी गौरवशाली परंपरा में **8वें योगावतार** का नाम महर्षि कपोत (Maharishi Kapota) है। उन्हें सांख्य दर्शन और योग साधना के रहस्यों का आदि ज्ञाता माना जाता है। महर्षि कपोत का जीवन त्याग, वैराग्य और ईश्वरीय चेतना के साथ एकात्म होने का जीवंत उदाहरण है।

📌 महर्षि कपोत: एक दृष्टि में
अवतार क्रम भगवान शिव के 28 योगावतारों में 8वाँ (8th)
प्रमुख शिष्य कपिल, आसुरि, पंचशिख और वागुली
मुख्य दर्शन पाशुपत योग और सांख्य तत्व
विशेष गुण परम वैराग्य और अपरिग्रह
ग्रंथ उल्लेख शिव पुराण, लिंग पुराण, वायु पुराण
⏳ काल निर्धारण एवं युग (Time Period)
युग
8वाँ द्वापर युगवर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर का आठवाँ कालखंड।
सांप्रदायिक स्थान
प्राचीन योगाचार्यसांख्य दर्शन की गुरु-शिष्य परंपरा के महत्वपूर्ण स्तम्भ।

1. दार्शनिक संदेश: 'कपोत-वृत्ति' का अर्थ

महर्षि के नाम 'कपोत' (जिसका अर्थ कबूतर होता है) के पीछे एक गहरा दार्शनिक रहस्य छिपा है। शास्त्रों में **'कपोत-वृत्ति'** को संन्यासियों के लिए श्रेष्ठ माना गया है।

  • अपरिग्रह: जैसे कबूतर कल के लिए भोजन का संग्रह नहीं करता और केवल उतना ही चुगता है जितना वर्तमान के लिए आवश्यक हो, वैसे ही महर्षि कपोत ने संसार को 'अपरिग्रह' (Non-hoarding) का पाठ पढ़ाया।
  • संतोष: उन्होंने सिखाया कि न्यूनतम संसाधनों में अधिकतम शांति प्राप्त करना ही वास्तविक योग है।
  • निरंतर गतिशीलता: वे किसी एक स्थान के प्रति आसक्त नहीं हुए और निरंतर भ्रमण करते हुए ज्ञान का प्रचार करते रहे।

2. महर्षि कपोत के चार दिव्य शिष्य

शिव के प्रत्येक योगावतार की भांति, महर्षि कपोत के भी चार प्रमुख शिष्य हुए, जिन्होंने उनके ज्ञान को आगे बढ़ाया:

  1. कपिल (Kapila): सांख्य दर्शन के प्रणेता (ये भगवान विष्णु के अवतार कपिल से भिन्न हो सकते हैं या उन्हीं के सिद्धांतों के पोषक हो सकते हैं)।
  2. आसुरि (Asuri): सांख्य परंपरा के महान आचार्य।
  3. पंचशिख (Panchashikha): जिन्होंने सांख्य सूत्रों को व्यवस्थित किया।
  4. वागुली / वारकलि (Baguli): ज्ञान मार्ग के प्रखर तपस्वी।

इन चारों शिष्यों ने महर्षि कपोत के सानिध्य में 'अद्वैत' और 'प्रकृति-पुरुष' के रहस्यों को समझा।

"अष्टमे द्वापरे चैव कपोतो नाम शंकरः।
तत्रापि शिष्याश्चत्वारः कपिलाद्या यशस्विनः॥"
अर्थ: आठवें द्वापर में शिव 'कपोत' नाम से अवतरित हुए, जहाँ उनके कपिल आदि चार यशस्वी शिष्य हुए। — (पुराण वचन)

3. निष्कर्ष

महर्षि कपोत का चरित्र हमें यह याद दिलाता है कि योग केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक अनुशासन है। उन्होंने 'कपोत-वृत्ति' के माध्यम से मानवता को सादगी और उच्च चिंतन का मार्ग दिखाया। भगवान शिव के अवतार के रूप में, वे योग विद्या के वह अविनाशी बीज हैं, जिनकी सुगंध आज भी भारतीय दर्शन की गहरी परतों में महसूस की जा सकती है।


संदर्भ (References)

  • शिव पुराण (शतरुद्र संहिता - 28 अवतार वर्णन)।
  • लिंग पुराण (पूर्व भाग - योगावतार प्रकरण)।
  • वायु पुराण - ऋषि वंशावली खंड।
  • भारतीय दर्शन का इतिहास - डॉ. राधाकृष्णन।

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