महर्षि कृतिका (Maharishi Kritika)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि कृतिका: भगवान शिव के 20वें योगावतार और योग मार्ग के प्रणेता

महर्षि कृतिका: भगवान शिव के 20वें योगावतार और सिद्ध योग के संरक्षक

एक शोधपरक और आध्यात्मिक आलेख: योगावतार परंपरा और महर्षि कृतिका का महत्व (The 20th Yogavatara of Lord Shiva)

भारतीय शैव दर्शन और पुराणों के अनुसार, भगवान शिव ने धर्म की ग्लानि होने पर प्रत्येक द्वापर युग में योग की शिक्षा देने के लिए अवतार ग्रहण किए। इन **28 योगावतारों** की सूची में महर्षि कृतिका (Maharishi Kritika) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे 20वें द्वापर युग में अवतरित हुए और उन्होंने उस समय के जिज्ञासुओं को 'शिव-योग' और 'पाशुपत तत्व' का गूढ़ ज्ञान प्रदान किया। उन्हें ऋषियों के समाज में एक अत्यंत प्रभावशाली और प्रखर योगाचार्य के रूप में वंदनीय माना जाता है।

📌 महर्षि कृतिका: एक दृष्टि में
अवतार क्रम भगवान शिव के 28 योगावतारों में 20वाँ (20th)
युग 20वाँ द्वापर (वैवस्वत मन्वन्तर)
प्रमुख शिष्य भारद्वाज, अंगिरा, केवल और साक्ष
मुख्य दर्शन शैव योग, पाशुपत ज्ञान
ग्रंथ उल्लेख शिव पुराण, लिंग पुराण, वायु पुराण
⏳ काल निर्धारण एवं युग (Era Analysis)
मन्वन्तर
वैवस्वत मन्वन्तरयह वर्तमान कल्प का सातवाँ मन्वन्तर है।
द्वापर काल
20वाँ द्वापर (20th Dvapara)जब धर्म की रक्षा हेतु शिव ने 'कृतिका' रूप में अवतार लिया।

1. अवतार का उद्देश्य: योग की पुनर्स्थापना

पुराणों के अनुसार, जब-जब पृथ्वी पर वैदिक ज्ञान का ह्रास होता है और मनुष्य आत्म-तत्व को भूलकर केवल बाहरी अनुष्ठानों में उलझ जाता है, तब भगवान शिव एक महायोगी के रूप में प्रकट होते हैं। महर्षि कृतिका के रूप में शिव ने **हिमालय के पावन क्षेत्रों** में तपस्या की और 'पाशुपत योग' के उन गुप्त रहस्यों को उद्घाटित किया, जो जीव को 'पशुत्व' (अज्ञान) के बंधनों से मुक्त कर 'पशुपति' (ईश्वर) के समीप ले जाते हैं।

उनके उपदेशों में कर्म, भक्ति और ज्ञान का सुंदर समन्वय था। उन्होंने सिखाया कि शरीर को माध्यम बनाकर आत्मा का साक्षात्कार कैसे किया जाए। यही कारण है कि उन्हें 'कृतिका' कहा गया, जिसका एक अर्थ 'कर्मों को पवित्र करने वाला' भी है।

2. महर्षि कृतिका के चार महान शिष्य

शिव के प्रत्येक योगावतार की भांति, महर्षि कृतिका के भी चार प्रमुख शिष्य हुए, जिन्होंने उनके ज्ञान को दिशा-दिशा में फैलाया:

  • भारद्वाज (Bharadwaja): ये उन प्रसिद्ध ऋषियों के वंशज या उन्हीं का स्वरूप माने जाते हैं जिन्होंने योग की सूक्ष्म क्रियाओं में महारत हासिल की।
  • अंगिरा (Angira): इन्होंने मंत्र विज्ञान और तपस्या के समन्वय पर बल दिया।
  • केवल (Kevala): इन्होंने 'कैवल्य' (मुक्ति) की प्राप्ति के सरल मार्ग बताए।
  • साक्ष (Shaksha): इन्होंने ज्ञान की प्रत्यक्ष अनुभूति (साक्षात्कार) पर विशेष शोध किया।
"विंशतितमे द्वापरे तु कृतिका नाम शंकरः।
भारद्वाजश्चांगिराश्च केवलः साक्ष एव च॥"
अर्थ: बीसवें द्वापर में शिव 'कृतिका' नाम से अवतरित हुए, जहाँ भारद्वाज, अंगिरा, केवल और साक्ष—ये उनके चार मुख्य शिष्य हुए। — (लिंग पुराण)

3. निष्कर्ष

महर्षि कृतिका भारतीय ऋषि परंपरा के वह प्रदीप्त पुंज हैं जिन्होंने योग विद्या को लुप्त होने से बचाया। वे शिव के उस गंभीर और शांत स्वरूप के प्रतिनिधि हैं जो मौन और तप के माध्यम से जगत का कल्याण करते हैं। आज भी जो साधक शैव योग का अध्ययन करते हैं, वे महर्षि कृतिका और उनके शिष्यों द्वारा स्थापित सिद्धांतों से लाभान्वित होते हैं। वेदों और पुराणों में उनकी महिमा सदैव अक्षुण्ण रहेगी।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • शिव पुराण (शतरुद्र संहिता - 28 अवतार प्रकरण)।
  • लिंग पुराण (पूर्व भाग - अध्याय 24)।
  • वायु पुराण (ऋषि वंशावली खंड)।
  • कूर्म पुराण (अध्याय 52 - शिव अवतार)।

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