महर्षि पुलस्त्य: ब्रह्मा के मानस पुत्र, प्रजापति और ज्ञान के आदि स्रोत
एक विस्तृत पौराणिक और आध्यात्मिक विश्लेषण (The Saptarishi & Forefather of Ravana and Kubera)
सनातन धर्म की ऋषि परंपरा में महर्षि पुलस्त्य (Maharishi Pulastya) का स्थान अत्यंत गरिमामयी है। वे ब्रह्मा जी के उन दस प्रमुख मानस पुत्रों में से एक हैं, जिन्हें सृष्टि की रचना हेतु 'प्रजापति' बनाया गया था। महर्षि पुलस्त्य न केवल प्रथम मन्वन्तर के सप्तर्षि हैं, बल्कि वे ज्ञान के उस प्रवाह के वाहक भी हैं जिसने पुराणों को सुरक्षित रखा। उनका चरित्र कठोर तपस्या और अगाध ज्ञान का अद्भुत संगम है।
| पिता | भगवान ब्रह्मा (मानस पुत्र) |
| पत्नी | हविर्भू (कर्दम ऋषि की पुत्री) और प्रतिच्य |
| पुत्र | महर्षि अगस्त्य और महर्षि विश्रवा |
| पौत्र (Grandson) | कुबेर, रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण |
| विशेष पद | प्रजापति एवं सप्तर्षि |
| प्रमुख ग्रंथ सम्बन्ध | विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत, रामायण |
1. पुलस्त्य वंश: रावण और कुबेर का प्राकट्य
महर्षि पुलस्त्य का वंश रामायण की कथा का आधार स्तंभ है। उनका विवाह कर्दम ऋषि की पुत्री हविर्भू से हुआ था, जिनसे अगस्त्य और विश्रवा नामक दो महान पुत्र हुए।
- विश्रवा: पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा ने ही कुबेर और रावण जैसे प्रतापी पुत्रों को जन्म दिया।
- कुबेर और रावण: कुबेर (देवताओं के कोषाध्यक्ष) और रावण (लंकापति) दोनों ही पुलस्त्य ऋषि के पौत्र थे। रावण को अक्सर 'पुलस्त्य-नंदन' या 'पुलस्त्य-पौत्र' कहकर संबोधित किया जाता है।
- विभीषण का धर्म: रावण के भाई विभीषण ने अपने दादा पुलस्त्य के ऋषि गुणों को आत्मसात किया, जिसके कारण वे असुर कुल में जन्म लेकर भी परम भक्त हुए।
2. ज्ञान की परंपरा: विष्णु पुराण और पुलस्त्य
महर्षि पुलस्त्य का योगदान केवल वंशावली तक सीमित नहीं है, वे ज्ञान के भी आदि आचार्य हैं। विष्णु पुराण की उत्पत्ति की कथा महर्षि पुलस्त्य से जुड़ी है।
जब महर्षि पराशर (व्यास के पिता) अपने पिता शक्ति की मृत्यु का बदला लेने के लिए राक्षसों का विनाश कर रहे थे, तब महर्षि पुलस्त्य ने उन्हें रोककर अहिंसा का उपदेश दिया। प्रसन्न होकर पुलस्त्य ने पराशर को आशीर्वाद दिया कि वे पुराणों के महान ज्ञाता बनेंगे। इसी आशीर्वाद के फलस्वरूप पराशर ने विष्णु पुराण की रचना की।
3. आध्यात्मिक महत्व और तपस्या
पुलस्त्य ऋषि को 'श्रवण' (सुनने की शक्ति) का स्वामी माना जाता है। वे सदैव वेदों के पाठ और ध्यान में लीन रहते थे। उनकी तपस्या इतनी उग्र थी कि स्वयं इंद्र भी उनसे भयभीत रहते थे। उन्होंने ही महाभारत में भीष्म पितामह को विभिन्न तीर्थों की महिमा का वर्णन सुनाया था, जिसे 'तीर्थयात्रा पर्व' के नाम से जाना जाता है।
4. निष्कर्ष
महर्षि पुलस्त्य का जीवन हमें यह सिखाता है कि महान कुल में जन्म लेना सौभाग्य है, किन्तु व्यक्ति अपने कर्मों से ही पहचाना जाता है। उनके वंश में जहाँ रावण जैसे तामसी गुण वाले लोग हुए, वहीं कुबेर और अगस्त्य जैसे सात्विक महापुरुष भी हुए। वे ज्ञान के संरक्षक और धर्म के रक्षक के रूप में युगों-युगों तक वंदनीय रहेंगे।
संदर्भ (References)
- श्रीमद्भागवत महापुराण (तृतीय स्कन्ध)।
- विष्णु पुराण (प्रथम अंश - पराशर-पुलस्त्य संवाद)।
- वाल्मीकि रामायण (उत्तर काण्ड)।
- महाभारत (वन पर्व - तीर्थयात्रा पर्व)।
