महर्षि सनन्दन: ब्रह्मा के द्वितीय मानस पुत्र और अध्यात्म विद्या के प्रकाशक
शोधपरक और आध्यात्मिक आलेख (Detailed Profile of Sage Sanandana)
भारतीय सनातन धर्म के ग्रंथों के अनुसार, महर्षि सनन्दन (Maharishi Sanandana) ब्रह्मा जी के उन चार मानस पुत्रों में से एक हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से 'चतुःकुमार' (Sanakadi Rishis) कहा जाता है। ब्रह्मा जी ने सृष्टि की वृद्धि के लिए अपने संकल्प से सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार को उत्पन्न किया था। महर्षि सनन्दन ज्ञान और वैराग्य की प्रतिमूर्ति माने जाते हैं। इन्होंने गृहस्थ जीवन को स्वीकार करने के बजाय ब्रह्मचर्य का मार्ग चुना और अपना जीवन नारायण की भक्ति और ज्ञान के प्रसार में समर्पित कर दिया।
| पिता | भगवान ब्रह्मा (मानस पुत्र) |
| समूह | चतुःकुमार (सनकादि ऋषि) |
| स्वरूप | नित्य ५ वर्ष के बालक (Eternal Child) |
| विशेष सिद्धि | आत्मज्ञान और नैष्ठिक ब्रह्मचर्य |
| मुख्य ग्रंथ सम्बन्ध | श्रीमद्भागवत एवं पुराण |
| उपदेश विषय | ज्ञान, वैराग्य और भक्ति मार्ग |
1. आध्यात्मिक भूमिका: भागवत धर्म का प्रसार
महर्षि सनन्दन की भूमिका भागवत धर्म के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, भगवान नारायण ने ब्रह्मा जी को जो गुप्त ज्ञान दिया था, उसे ब्रह्मा जी ने अपने मानस पुत्रों को हस्तांतरित किया।
विशेष रूप से महर्षि सनन्दन को उस ज्ञान की रक्षा और उसे पात्र शिष्यों तक पहुँचाने का श्रेय दिया जाता है। इन्होंने 'सनत्सुजात' संवाद के माध्यम से भी जटिल आध्यात्मिक गुत्थियों को सुलझाया। इनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए भौतिक आयु नहीं, बल्कि मन की शुद्धता और वैराग्य की आवश्यकता होती है।
2. दर्शन: 'नित्य बालक' स्वरूप का रहस्य
सनन्दन और उनके भाइयों का सदैव पांच वर्ष के बालक के रूप में रहना एक गहरा दार्शनिक संदेश देता है। यह स्वरूप इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान प्राप्ति के बाद मनुष्य का चित्त बालक की भाँति निष्पाप, सरल और अहंकार रहित हो जाता है।
महर्षि सनन्दन के दर्शन में 'माया' का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने ब्रह्मा जी के आदेश 'प्रजा बढ़ाओ' को इसलिए अस्वीकार किया था क्योंकि वे जानते थे कि संसार का विस्तार अज्ञान के बंधन को बढ़ाता है। उन्होंने निवृत्ति मार्ग (Path of Inward Journey) को श्रेष्ठ सिद्ध किया।
3. निष्कर्ष
महर्षि सनन्दन भारतीय मनीषा के वह प्रकाश पुंज हैं जो हमें सिखाते हैं कि संसार में रहकर भी संसार से निर्लिप्त कैसे रहा जाए। वे न केवल ब्रह्मा के पुत्र हैं, बल्कि सम्पूर्ण साधक समुदाय के मार्गदर्शक हैं। भागवत परंपरा में उन्हें 'आदि आचार्य' के रूप में वंदनीय माना जाता है। उनकी स्तुति मात्र से साधक के भीतर वैराग्य और भक्ति का संचार होता है।
संदर्भ (References)
- श्रीमद्भागवत महापुराण (तृतीय स्कन्ध)
- विष्णु पुराण (प्रथम अंश)
- नारद पंचरात्र
- पद्म पुराण (पाताल खण्ड)
