Maharishi Parashuram: The Architect of India's Geographical Unity

Sooraj Krishna Shastri
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॥ महर्षि परशुराम ॥

भारतवर्ष की भौगोलिक एकता और ग्राम-संस्कृति के अमर प्रतिष्ठापक

ग्राम-संस्कृति के जनक

भारतवर्ष की वर्तमान भौगोलिक सीमाओं के निर्धारण का श्रेय यदि किसी एक महापुरुष को जाता है, तो वे महर्षि परशुराम हैं. जहाँ अन्य चक्रवर्ती राजाओं ने साम्राज्यों और नगरों का निर्माण किया, वहीं महर्षि परशुराम ने भारत की आत्मा, यानी 'गाँवों' की नींव रखी. वे केवल विजेता नहीं, बल्कि राज्यों और नगरों से दूर वनों में बस्तियाँ बसाने वाले प्रथम 'समाज-शिल्पी' थे.

अखंड भारत: हिमालय से सागर तक

महर्षि परशुराम का प्रभाव क्षेत्र किसी एक राज्य तक सीमित नहीं था। पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश के लोहित कुंड से लेकर पश्चिम में राजस्थान की महादेव गुफा तक, और उत्तर में हिमाचल के भृगुतुंग से लेकर दक्षिण में केरल तक—संपूर्ण भारत में वे ईश्वर रूप में पूजित हैं.

"केरल की उत्पत्ति की कथा अत्यंत रोचक है। जब परशुराम जी ने जीती हुई सारी पृथ्वी दान कर दी, तो उनके तप के लिए कोई स्थान शेष न रहा। तब उन्होंने अपना फरसा (परशु) समुद्र में फेंका, जिससे समुद्र पीछे हट गया और 'चेरस्थलम्' यानी केरल की भूमि निकली. आज भी केरल का मानचित्र उस फरसे के आकार जैसा ही प्रतीत होता है."

प्रमुख तीर्थ और ऐतिहासिक साक्ष्य

📍 खैराडीह (बलिया) इसे महर्षि परशुराम की पावन जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है.
📍 दोहरीघाट (मऊ) सरयू तट पर स्थित यह स्थान 'दो हरि' (श्रीराम और परशुराम) के मिलन का साक्षी है, जैसा कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित है.
📍 सोहनाग (देवरिया) धनुषभंग के पश्चात उग्र संवाद से शांत होकर परशुराम जी ने यहाँ विश्राम और तप किया था। यहाँ का सरोवर आज भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है.
📍 परशुराम कुंड (अरुणाचल) मातृ-हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए महर्षि ने ब्रह्मपुत्र स्थित इसी कुंड में स्नान किया था.
📍 टांगीनाथ धाम (झारखंड) मान्यता है कि यहाँ उनका फरसा (टांगी) गड़ा हुआ है, जिस पर सदियों से धूप और बारिश के बाद भी जंग नहीं लगती.
📍 महेन्द्र पर्वत (ओडिशा) यह पर्वत उनकी प्रमुख तपस्थली रहा है.

परशु: सृजन और संहार का प्रतीक

महर्षि परशुराम के हाथ में सुशोभित 'परशु' केवल युद्ध का शस्त्र नहीं, बल्कि मानव विकास का एक उपकरण (कुल्हाड़ी) भी है. इसी उपकरण से वनों को साफ कर मनुष्यों के लिए सुरक्षित आवास बनाए गए, जिससे गाँवों का निर्माण संभव हुआ.

उनका जीवन विलासिता से दूर, पहाड़ों और वनों के शांत वातावरण में बीता। यदि आज भारत गाँवों में बसता है, तो निस्संदेह ये गाँव महर्षि परशुराम की सृजनात्मकता और दूरदर्शिता की ही देन हैं.

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