महर्षि सनातन (Maharishi Sanatana)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि सनातन: ब्रह्मा के तृतीय मानस पुत्र और नित्य सिद्ध योगी

महर्षि सनातन: ब्रह्मा के तृतीय मानस पुत्र और नित्य सिद्ध योगी

आध्यात्मिक और पौराणिक विश्लेषण (The Third Kumara: Sage Sanatana)

भारतीय धर्मग्रंथों और पुराणों में महर्षि सनातन (Maharishi Sanatana) का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे ब्रह्मा जी के चार प्रमुख मानस पुत्रों (सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार) में से एक हैं। 'सनातन' शब्द का अर्थ ही है—'जो सदा से है और सदा रहेगा' (Eternal)। ये ऋषि जन्म से ही ब्रह्मज्ञानी थे और इन्होंने सृष्टि के भौतिक विस्तार में भाग लेने के बजाय ईश्वर की भक्ति और तपस्या का मार्ग चुना। वे नित्य किशोर अवस्था में रहते हुए तीनों लोकों में अबाध गति से विचरण करते हैं।

📌 महर्षि सनातन: एक दृष्टि में
पिता भगवान ब्रह्मा (मानस पुत्र)
समूह चतुःकुमार (सनकादि ऋषि)
क्रम तृतीय कुमार (Third among the Kumaras)
स्वरूप दिगम्बर, ५ वर्षीय बालक
मार्ग नैष्ठिक ब्रह्मचर्य और ज्ञान मार्ग
निवास तपोलोक / जनलोक
⏳ काल निर्धारण एवं युग
सृष्टि काल
आदि सृष्टि (Primordial Creation)ब्रह्मा जी के मन से सृष्टि के बिलकुल आरंभ में उत्पन्न हुए।
अवस्था
कालातीत (Timeless)ये ऋषि काल (समय) के प्रभाव से मुक्त हैं, अतः इनकी कोई आयु सीमा नहीं है।

1. आध्यात्मिक महत्व: 'सनातन' शब्द का अर्थ

महर्षि सनातन का नाम ही उनके व्यक्तित्व की परिभाषा है। 'सनातन' का अर्थ है शाश्वत, पुरातन होते हुए भी नित्य नूतन।

"यं वै विधुरमृतं शाश्वतं नित्यमच्युतम्।" अर्थ: जो अविनाशी है, अमृत स्वरूप है और शाश्वत है, वही सनातन है।

ब्रह्मा जी ने इन्हें प्रजा उत्पन्न करने (मैथुनी सृष्टि) का आदेश दिया था, किन्तु इन्होंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। इनका तर्क था कि यदि वे गृहस्थ जीवन में फंस गए, तो वे परब्रह्म के निरंतर ध्यान से विमुख हो जाएंगे। इनका यह निर्णय भारतीय संस्कृति में 'निवृत्ति धर्म' (Renunciation) की नींव बना।

2. उपदेश: निवृत्ति मार्ग और भक्ति

महर्षि सनातन और उनके भाई सामूहिक रूप से उपदेश देते हैं। श्रीमद्भागवत और महाभारत के शांति पर्व में इनके संवाद मिलते हैं।

  • मोक्ष का स्वरूप: उन्होंने राजा पृथु को उपदेश देते हुए कहा था कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप भौतिक देह से भिन्न है।
  • जय-विजय प्रसंग: जब ये वैकुण्ठ गए और द्वारपालों ने इन्हें रोका, तो इन्होंने ही उन्हें शाप दिया था। यह घटना सिद्ध करती है कि भक्त का अपमान भगवान को भी स्वीकार नहीं होता।
  • ज्ञान और भक्ति का समन्वय: यद्यपि वे ज्ञानी हैं, किन्तु वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्त भी हैं। वे मानते हैं कि ज्ञान का अंतिम लक्ष्य 'भक्ति' ही है।

3. निष्कर्ष

महर्षि सनातन भारतीय ऋषि परंपरा के एक ऐसे स्तंभ हैं, जो हमें स्मरण कराते हैं कि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य 'ब्रह्म प्राप्ति' है। उनका बाल स्वरूप हमें निर्मलता और अहंकार शून्यता का संदेश देता है। वे आज भी सूक्ष्म रूप में विद्यमान माने जाते हैं और ज्ञान के पिपासु साधकों का मार्गदर्शन करते हैं।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • श्रीमद्भागवत पुराण (तृतीय और चतुर्थ स्कन्ध)।
  • महाभारत (शांति पर्व - मोक्षधर्म)।
  • ब्रह्म पुराण।
  • शिव पुराण (सृष्टि खंड)।

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