महर्षि वैशंपायन: महाभारत के प्रथम कथावाचक और यजुर्वेद के महान आचार्य
एक विस्तृत पौराणिक और आध्यात्मिक विश्लेषण (The Prime Narrator of Mahabharata & Master of Yajurveda)
भारतीय सनातन ज्ञान परंपरा में महर्षि वैशंपायन (Maharishi Vaishampayana) एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी हैं। वे महर्षि कृष्ण द्वैपायन **वेदव्यास** के उन चार प्रमुख शिष्यों में से एक थे, जिन्हें व्यास जी ने वेदों के संपादन के बाद उनके प्रचार-प्रसार का उत्तरदायित्व सौंपा था। वैशंपायन ऋषि को विशेष रूप से **यजुर्वेद** के ज्ञान का संरक्षक बनाया गया। इसके अतिरिक्त, इतिहास के पन्नों में उनकी ख्याति उस महान ऋषि के रूप में है, जिन्होंने महाराज जनमेजय के सर्प-सत्र यज्ञ के दौरान पहली बार संपूर्ण **महाभारत** का वाचन किया था।
| गुरु | महर्षि वेदव्यास (Krishna Dwaipayana Vyasa) |
| वेद उत्तरदायित्व | यजुर्वेद (Yajurveda) |
| मुख्य शिष्य | महर्षि याज्ञवल्क्य (शुरू में) |
| प्रसिद्ध उपलब्धि | महाभारत के प्रथम कथावाचक |
| श्रोता | महाराज जनमेजय (परीक्षित के पुत्र) |
| ग्रंथ उल्लेख | महाभारत, पुराण, चरक संहिता (प्रणेता के रूप में) |
1. यजुर्वेद के आचार्य और याज्ञवल्क्य प्रसंग
वेदव्यास जी ने जब वेदों का विभाग किया, तब उन्होंने वैशंपायन को यजुर्वेद का आचार्य नियुक्त किया। वैशंपायन के अनेक शिष्य हुए, जिनमें **महर्षि याज्ञवल्क्य** अत्यंत मेधावी थे।
एक बार वैशंपायन और याज्ञवल्क्य के बीच किसी कारणवश विवाद हो गया। वैशंपायन ने क्रुद्ध होकर याज्ञवल्क्य से कहा— "मेरे द्वारा दी गई विद्या को वापस कर दो।" तब याज्ञवल्क्य ने अपनी सीखी हुई विद्या को वमन (उल्टी) के रूप में त्याग दिया। अन्य शिष्यों ने 'तित्तिरि' (Tittiri - तीतर) पक्षी बनकर उस विद्या को ग्रहण किया, जिससे यजुर्वेद की 'तैत्तिरीय शाखा' (कृष्ण यजुर्वेद) का जन्म हुआ। बाद में याज्ञवल्क्य ने सूर्य देव की आराधना कर **'शुक्ल यजुर्वेद'** प्राप्त किया। यह प्रसंग वैशंपायन के अनुशासन और गुरु-शिष्य परंपरा की गहनता को दर्शाता है।
2. महाभारत का प्रथम सार्वजनिक वाचन
महाभारत ग्रंथ की रचना व्यास जी ने की, किन्तु उसे संसार के सम्मुख लाने का श्रेय वैशंपायन को जाता है।
- जनमेजय का सर्प-सत्र: जब महाराज परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के काटने से हुई, तो उनके पुत्र जनमेजय ने नागों के विनाश के लिए 'सर्प-सत्र' यज्ञ किया।
- व्यास की आज्ञा: उस यज्ञ में व्यास जी भी उपस्थित थे। जनमेजय ने अपने पूर्वजों (पांडवों और कौरवों) के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की। व्यास जी की आज्ञा से वैशंपायन ने उस विशाल जनसभा में महाभारत की कथा का वाचन किया।
- ग्रंथ का स्वरूप: वैशंपायन द्वारा कही गई यह कथा **'भारत'** संहिता कहलाई, जिसमें मूलतः २४,००० श्लोक थे (बाद में यह १ लाख श्लोकों का महाभारत बना)।
3. आयुर्वेद और चिकित्सा में योगदान
बहुत कम लोग जानते हैं कि कुछ ग्रंथों में आयुर्वेद के महान आचार्य **चरक** को वैशंपायन का ही अवतार या उनका शिष्य माना गया है। 'चरक संहिता' के प्रारंभिक सूत्रों में वैशंपायन का उल्लेख चिकित्सा ज्ञान के संवाहक के रूप में मिलता है। वे न केवल आध्यात्मिक बल्कि भौतिक और जैविक विज्ञान (Life Science) के भी मर्मज्ञ थे।
4. निष्कर्ष
महर्षि वैशंपायन का व्यक्तित्व गुरु-भक्ति और ज्ञान के संरक्षण का प्रतीक है। यदि वे महाभारत की कथा महाराज जनमेजय को न सुनाते, तो शायद आज विश्व का यह सबसे बड़ा महाकाव्य हम तक इस रूप में न पहुँचता। वे यजुर्वेद की परंपरा के स्तंभ हैं और उनकी शिक्षाएं आज भी तैत्तिरीय और अन्य शाखाओं के माध्यम से जीवित हैं। वेदों के संपादन के कार्य को आगे बढ़ाकर उन्होंने भारतीय ज्ञान को अमर बना दिया।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- महाभारत (आदि पर्व - सर्प-सत्र प्रसंग)।
- श्रीमद्भागवत महापुराण (द्वादश स्कन्ध - वेद विभाजन)।
- विष्णु पुराण (वेद शाखा वर्णन)।
- तैत्तिरीय संहिता एवं चरक संहिता के प्रारंभिक सूत्र।
