आचार्य भरतमुनि: भारतीय नाट्यशास्त्र के प्रणेता, 'रस सिद्धांत' के जनक और पंचम वेद के रचयिता | Bharata Muni

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य भरतमुनि: भारतीय सौंदर्यशास्त्र के जनक और 'नाट्यशास्त्र' के विश्वकर्मा

आचार्य भरतमुनि: भारतीय नाट्यशास्त्र के प्रणेता, रस-सिद्धांत के जनक और 'पंचम वेद' के रचयिता

भारतीय संस्कृति में कला, संगीत, नृत्य और नाटक केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि मोक्ष प्राप्ति और आत्म-साक्षात्कार के मार्ग हैं। इस महान परंपरा की नींव रखने वाले युगपुरुष थे—आचार्य भरतमुनि। उन्होंने 'नाट्यशास्त्र' (Natya Shastra) की रचना करके विश्व को अभिनय और सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) का पहला और सबसे पूर्ण व्याकरण दिया। आज हम जिसे 'क्लासिकल डांस' या 'क्लासिकल म्यूजिक' कहते हैं, उसकी प्रत्येक मुद्रा, प्रत्येक स्वर और प्रत्येक भाव का उद्गम भरतमुनि के इसी ग्रंथ से हुआ है। वे भारतीय कला जगत के 'ब्रह्मा' हैं।

📌 आचार्य भरतमुनि: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
नाम आचार्य भरतमुनि (Bharata Muni)
उपाधि नाट्य-पितामह, रस-सिद्धान्त प्रवर्तक
काल विवादित (200 ई.पू. से 200 ई. के मध्य), त्रेता युग (पौराणिक)
प्रमुख ग्रंथ नाट्यशास्त्र (Natya Shastra)
दर्शन सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) / रसवाद
मूल सिद्धांत रस निष्पत्ति (Rasa Realization)
योगदान शास्त्रीय नृत्य, संगीत, छंद और मंच सज्जा का मानकीकरण

2. पौराणिक उत्पत्ति: 'नाट्यवेद' का सृजन

नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति की कथा अत्यंत रोचक और दार्शनिक है। यह कथा बताती है कि कला का उद्देश्य क्या है।

पंचम वेद का निर्माण

त्रेता युग के आरंभ में जब लोग काम, क्रोध और लोभ के वशीभूत होकर दुखी होने लगे, तब इंद्र के नेतृत्व में सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए। उन्होंने प्रार्थना की—"हमें एक ऐसा खेल (क्रीडनीयक) चाहिए जो दृश्य भी हो और श्रव्य भी। चारों वेद (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद) शूद्रों और सामान्य जन के लिए वर्जित हैं, अतः एक ऐसा 'पाँचवाँ वेद' बनाइए जो सभी वर्णों और जातियों के लिए सुलभ हो।"

तब ब्रह्मा जी ने चारों वेदों से तत्व लिए:

  • ऋग्वेद से पाठ्य (संवाद/Text)।
  • सामवेद से गीत (Music/Song)।
  • यजुर्वेद से अभिनय (Acting/Gestures)।
  • अथर्ववेद से रस (Emotion/Sentiment)।

इनको मिलाकर उन्होंने 'नाट्यवेद' की रचना की और इसे पृथ्वी पर लागू करने का कार्य भरतमुनि और उनके 100 पुत्रों को सौंपा।

3. नाट्यशास्त्र: विश्व का प्रथम विश्वकोश

भरतमुनि द्वारा रचित 'नाट्यशास्त्र' केवल नाटक की किताब नहीं है, बल्कि यह ललित कलाओं का विश्वकोश (Encyclopedia) है। इसमें 36 (कुछ संस्करणों में 37) अध्याय और लगभग 6000 श्लोक हैं।

इस ग्रंथ की व्यापकता अकल्पनीय है। इसमें निम्नलिखित विषयों पर सूक्ष्म चर्चा है:

  • रंगमंच निर्माण: थिएटर का आर्किटेक्चर कैसा हो।
  • अभिनय: शरीर, वाणी और मन का उपयोग।
  • नृत्य: तांडव और लास्य, 108 करण (मुद्राएं)।
  • संगीत: श्रुति, स्वर, ग्राम, मूर्छना और वाद्य यंत्र।
  • छंद और व्याकरण: संवादों का ढांचा।
  • आहार्य: मेकअप, वेशभूषा और आभूषण।

भरतमुनि कहते हैं—"न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला..." अर्थात ऐसा कोई ज्ञान, शिल्प, विद्या या कला नहीं है जो नाट्य में न हो।

4. रस सिद्धांत: विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी

भरतमुनि का सबसे क्रांतिकारी और अमर योगदान उनका 'रस सूत्र' है। यह भारतीय सौंदर्यशास्त्र की रीढ़ है।

"विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः"

अर्थात—विभाव (कारण), अनुभाव (शारीरिक चेष्टाएं) और व्यभिचारी (संचारी भाव) के संयोग से ही 'रस' की निष्पत्ति होती है।

स्थायी भाव और रस

भरतमुनि ने मानव मन के 8 स्थायी भावों (Permanent Emotions) को पहचाना और उनसे उत्पन्न होने वाले 8 रसों का वर्णन किया:

  1. रति (प्रेम) शृंगार रस (Erotic)
  2. हास (हँसी) हास्य रस (Comic)
  3. शोक (दुख)करुण रस (Pathetic)
  4. क्रोध (गुस्सा) रौद्र रस (Furious)
  5. उत्साह (ऊर्जा) वीर रस (Heroic)
  6. भय (डर)भयानक रस (Terrible)
  7. जुगुप्सा (घृणा) वीभत्स रस (Odious)
  8. विस्मय (आश्चर्य)अद्भुत रस (Marvelous)

(नोट: 'शांत रस' को बाद में अभिनवगुप्त जैसे आचार्यों ने जोड़ा, भरतमुनि ने मूलतः 8 रसों की ही चर्चा की थी।)

[Image of Navarasa facial expressions]

5. अभिनय के चार स्तंभ: आंगिक से सात्विक तक

भरतमुनि ने 'अभिनय' (Acting) शब्द को परिभाषित किया। 'अभि' (की ओर) + 'नय' (ले जाना)। अर्थात जो अर्थ को दर्शकों तक ले जाए। उन्होंने अभिनय के चार भेद बताए:

  • आंगिक (Angika): शरीर के अंगों (हाथ, पैर, कमर, मुख) द्वारा भाव प्रकट करना। इसी से शास्त्रीय नृत्यों की हस्त-मुद्राएं निकली हैं।
  • वाचिक (Vachika): संवाद, स्वर का उतार-चढ़ाव, उच्चारण और भाषा।
  • आहार्य (Aharya): वेशभूषा, मेकअप, रंगमंच की सज्जा और आभूषण।
  • सात्विक (Satvika): यह सबसे कठिन है। यह अंतर्मन की अवस्था है जो शरीर पर अनियंत्रित प्रतिक्रिया के रूप में दिखती है—जैसे रोमांच (रोंगटे खड़े होना), स्वेद (पसीना), अश्रु (आंसू), या वेपथु (कंपकंपी)।

6. रंगमंच और प्रेक्षागृह: प्राचीन थिएटर का विज्ञान

आज के आधुनिक थिएटरों में जो 'अकॉस्टिक्स' (ध्वनि विज्ञान) का प्रयोग होता है, भरतमुनि ने हजारों साल पहले उसका वर्णन किया था। उन्होंने तीन प्रकार के प्रेक्षागृह (Theatre Halls) बताए:

  • विकृष्ट (Rectangular): आयताकार, देवताओं के लिए।
  • चतुरस्र (Square): वर्गाकार, राजाओं और कुलीनों के लिए।
  • त्र्यस्र (Triangular): त्रिभुजाकार, घरेलू या तांत्रिक प्रयोगों के लिए।

उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिया कि थिएटर बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए (गुफा जैसा होना चाहिए) ताकि अभिनेता की सूक्ष्म भाव-भंगिमाएं (Micro-expressions) अंतिम पंक्ति के दर्शक तक भी पहुँच सकें और आवाज गूंजे नहीं।

7. प्रथम नाटक: देवासुर संग्राम और श्राप

नाट्यशास्त्र के अनुसार, भरतमुनि ने सबसे पहला नाटक 'अमृत मंथन' (या त्रिपुरदाह) खेला। इसे देखने के लिए देवता और असुर दोनों आए। नाटक में असुरों की हार दिखाई गई थी।

नाट्य का वास्तविक उद्देश्य

असुरों को लगा कि यह नाटक उनका अपमान करने के लिए है, इसलिए उन्होंने विघ्न डालना शुरू कर दिया। तब ब्रह्मा जी ने असुरों को समझाया—
"नाटक किसी एक का पक्ष नहीं लेता। यह 'त्रैलोक्यानुकरणम्' (तीनों लोकों का अनुकरण) है। इसमें धर्म, क्रीड़ा, अर्थ, शांति, हास्य, युद्ध, काम और वध—सब कुछ दिखाया जाएगा। यह दुखियारों को सांत्वना देने वाला और अज्ञानियों को ज्ञान देने वाला होगा।"

इसीलिए भरतमुनि के नाटक को "सार्ववर्णिक" (Universal) कहा गया है।

8. निष्कर्ष: भरतमुनि की वैश्विक विरासत

आचार्य भरतमुनि केवल एक लेखक नहीं, बल्कि एक द्रष्टा ऋषि थे। उन्होंने मानव मनोविज्ञान (Psychology) को कला (Art) के साथ ऐसे गूंथा कि वह अध्यात्म (Spirituality) बन गई।

आज भारत का भरतनाट्यम, ओडिसी, कथक या कुचिपुड़ी हो, या फिर हिंदी सिनेमा का अभिनय—सबकी जड़ें कहीं न कहीं भरतमुनि के 'रस सिद्धांत' से जुड़ी हैं। उन्होंने हमें सिखाया कि जीवन स्वयं एक रंगमंच है और हम सब इसके पात्र हैं। उनका संदेश था कि कला का उद्देश्य केवल "वाह" करना नहीं, बल्कि "आह" (करुणा/संवेदना) जगाना और अंततः "शांति" प्रदान करना है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • नाट्यशास्त्र - आचार्य भरतमुनि (अभिनवगुप्त की अभिनवभारती टीका सहित)।
  • Indian Aesthetics - K.C. Pandey.
  • The Number of Rasas - V. Raghavan.
  • History of Sanskrit Poetics - P.V. Kane.
  • भरत और भारतीय नाट्यकला - डॉ. नगेन्द्र।

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