आचार्य वसुबन्धु: योगाचार के सूर्य, विज्ञानवाद के प्रवर्तक और बौद्ध दर्शन के अद्वितीय मनोवैज्ञानिक
भारतीय दार्शनिक आकाश में आचार्य वसुबन्धु (Vasubandhu) एक ऐसा देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी मेधा ने न केवल बौद्ध दर्शन की दिशा बदली, बल्कि पूरे भारतीय ज्ञान-विज्ञान को एक मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान किया। उन्हें बौद्ध जगत में 'द्वितीय बुद्ध' के रूप में पूजा जाता है। वसुबन्धु केवल एक दार्शनिक नहीं थे, बल्कि वे चेतना (Consciousness) के सबसे बड़े अन्वेषक थे। उन्होंने आधुनिक मनोविज्ञान के अस्तित्व में आने से 1500 वर्ष पूर्व ही मन की उन परतों को उघाड़ दिया था, जहाँ तक आज का न्यूरो-साइंस पहुँचने का प्रयास कर रहा है।
- 1. प्रस्तावना: बौद्ध मेधा का चरम उत्कर्ष
- 2. जीवन परिचय: गान्धार की धरती से उदय
- 3. सर्वास्तिवाद काल: 'अभिधर्मकोश' की रचना का इतिहास
- 4. महायान में प्रवेश: भाई असंग की युक्ति और परिवर्तन
- 5. विज्ञानवाद (Yogacara): जगत मात्र चित्त की तरंग है
- 6. आलय-विज्ञान (Storehouse Consciousness) का अद्वितीय सिद्धांत
- 7. तीन स्वभाव: वास्तविकता के तीन स्तर
- 8. दार्शनिक संपदा: वसुबन्धु की प्रमुख रचनाएँ
- 9. निष्कर्ष: वसुबन्धु की वैश्विक और चिरस्थायी विरासत
| पूरा नाम | आचार्य वसुबन्धु (Acharya Vasubandhu) |
| उपाधि | द्वितीय बुद्ध, सहस्त्र-शास्त्र-प्रणेता, विज्ञानवादी शिखर |
| काल | चौथी-पाँचवीं शताब्दी (लगभग 320–400 ईस्वी) |
| जन्म स्थान | पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर, पाकिस्तान), प्राचीन गान्धार साम्राज्य |
| पारिवारिक पृष्ठभूमि | पिता: कौशिक (विद्वान ब्राह्मण), ज्येष्ठ भ्राता: आचार्य असंग |
| दर्शन | योगाचार (Yogacara) / विज्ञानवाद (Vijnanavada) |
| प्रमुख ग्रंथ | अभिधर्मकोश, विंशतिका, त्रिंशिका, वज्रच्छेदिका टीका, सप्तदशभूमि शास्त्र |
2. जीवन परिचय: गान्धार की धरती से उदय
आचार्य वसुबन्धु का जन्म चौथी शताब्दी में प्राचीन भारत के गान्धार साम्राज्य की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) में हुआ था। वे एक अत्यंत कुलीन और विद्वान ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। उनके पिता कौशिक ऋग्वेद के मर्मज्ञ ज्ञाता थे। वसुबन्धु तीन भाई थे, और तीनों ही महान बौद्ध भिक्षु बने। उनके सबसे बड़े भाई असंग (Asanga) थे, जिन्होंने महायान बौद्ध धर्म की योगाचार शाखा की स्थापना की।
वसुबन्धु बचपन से ही अत्यंत प्रखर और तर्कशील बुद्धि के स्वामी थे। उन्होंने वेदों का अध्ययन किया, लेकिन सत्य की खोज में वे बौद्ध विहारों की ओर आकर्षित हुए। वे तत्कालीन प्रभावशाली शाखा 'सर्वास्तिवाद' (Sarvastivada) में दीक्षित हुए। उनकी सीखने की भूख इतनी प्रबल थी कि वे किसी भी सिद्धांत की गहराई तक जाए बिना शांत नहीं बैठते थे।
3. सर्वास्तिवाद काल: 'अभिधर्मकोश' की रचना
प्रारंभिक वर्षों में वसुबन्धु सर्वास्तिवाद के कट्टर समर्थक थे। वे सत्य की खोज में कश्मीर गए, जो उस समय 'वैभाषिक' दर्शन का सबसे बड़ा केंद्र था। वहां उन्होंने चार वर्षों तक अज्ञातवास में रहकर गुरुओं से दीक्षा ली। कश्मीर से लौटने के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म के संपूर्ण बिखरे हुए सिद्धांतों को एक सूत्र में पिरोने का महान कार्य किया।
वसुबन्धु ने 'अभिधर्मकोश' (Treasury of Abhidharma) की रचना की। इसमें 600 कारिकाएँ (श्लोक) हैं। यह ग्रंथ इतना शक्तिशाली है कि इसे बौद्ध धर्म का 'एन्साइक्लोपीडिया' कहा जाता है। इसमें उन्होंने पदार्थ (Matter), चित्त (Mind), नैतिकता, पुनर्जन्म और निर्वाण का ऐसा सटीक और गणितीय विश्लेषण किया है कि आज भी तिब्बत, चीन और जापान के मठों में इसे अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाता है।
वसुबन्धु की महानता यह थी कि उन्होंने इसी ग्रंथ के 'भाष्य' में अपने ही मत की कमियों को उजागर किया, जिससे उनके स्वतंत्र और शोधपरक दृष्टिकोण का पता चलता है।
4. महायान में प्रवेश: भाई असंग का प्रभाव
शुरुआत में वसुबन्धु महायान (Mahayana) दर्शन के बहुत बड़े आलोचक थे। वे अक्सर महायान का उपहास उड़ाते हुए कहते थे कि यह केवल कल्पनाओं का अंबार है। उनके बड़े भाई असंग, जो महायान के महान आचार्य थे, अपने भाई की इस विमुखता से बहुत दुखी थे।
असंग ने वसुबन्धु को सही मार्ग पर लाने के लिए एक युक्ति अपनाई। उन्होंने रुग्णता का बहाना किया और वसुबन्धु को अपने पास बुलाया। वहां असंग के शिष्यों ने वसुबन्धु के सामने 'अक्षयमति सूत्र' और 'दशभूमिक सूत्र' का पाठ किया। उन सूत्रों की दार्शनिक गहराई और असीम करुणा को सुनकर वसुबन्धु का अहंकार टूट गया।
उन्हें अपनी भूल का ऐसा अहसास हुआ कि वे पश्चाताप स्वरूप अपनी जीभ काटने लगे। तब असंग ने उन्हें रोकते हुए कहा—"जीभ काटने से क्या होगा? अब इस जीभ का उपयोग महायान की रक्षा और व्याख्या में करो।" इसके बाद वसुबन्धु ने अपना शेष जीवन महायान और विज्ञानवाद को समर्पित कर दिया।
5. विज्ञानवाद (Yogacara): जगत मात्र चित्त है
महायान में आने के बाद वसुबन्धु ने अपने जीवन का श्रेष्ठतम दर्शन दिया, जिसे 'विज्ञानवाद' (Vijnanavada) या 'योगाचार' कहा जाता है। उनका मूल मंत्र था—"विज्ञप्तिमात्रमेवैतत्"।
वसुबन्धु ने सिद्ध किया कि जिसे हम 'बाहरी जगत' समझते हैं, उसकी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। पहाड़, नदी, घर और यहाँ तक कि हमारा शरीर भी वास्तव में हमारे चित्त (Mind) का ही एक प्रक्षेप (Projection) है।
उनके प्रमुख तर्क:
- स्वप्न का उदाहरण: जिस प्रकार स्वप्न में हमें डरावने शेर या सुन्दर उपवन दिखाई देते हैं और वे उस समय पूर्णतः सत्य लगते हैं, लेकिन जागने पर पता चलता है कि वे सब मन की ही रचना थे। जाग्रत अवस्था भी इसी प्रकार की एक 'दीर्घकालिक स्वप्न' है।
- परमाणु खंडन: वसुबन्धु ने तर्क दिया कि यदि परमाणु का कोई विस्तार है, तो उसके भाग होंगे, और यदि भाग नहीं हैं, तो वे जुड़कर बड़ी वस्तु कैसे बनाएंगे? अतः बाहरी वस्तु केवल एक मानसिक निर्माण (Mental Construction) है।
6. आलय-विज्ञान (Storehouse Consciousness)
वसुबन्धु का सबसे क्रांतिकारी मनोवैज्ञानिक योगदान 'आलय-विज्ञान' की खोज है। वे कहते हैं कि हमारी साधारण चेतना के पीछे एक अत्यंत गहरी चेतना की परत है जहाँ हमारे अनादि काल के कर्मों के 'बीज' (Seeds) संचित रहते हैं।
- संस्कारों का भंडार: आलय-विज्ञान एक निरंतर बहती हुई नदी की तरह है, जहाँ हमारे हर विचार और क्रिया का प्रभाव बीज रूप में जमा होता रहता है।
- पुनर्जन्म का आधार: जब एक शरीर मरता है, तो यही आलय-विज्ञान संस्कारों के उन बीजों को लेकर दूसरे शरीर में प्रविष्ट होता है।
- मुक्ति की प्रक्रिया: जब कोई साधक ध्यान के माध्यम से इस आलय-विज्ञान को शुद्ध कर लेता है, तो उसे 'निर्वाण' प्राप्त होता है।
7. तीन स्वभाव: वास्तविकता की परतें
वसुबन्धु ने वास्तविकता को समझने के लिए उसे तीन स्वभावों में विभाजित किया:
- 1. परिकल्पित स्वभाव (Imagined Nature): वह दुनिया जिसे हम अपनी कल्पना और शब्दों से गढ़ते हैं (जैसे रस्सी में सांप की कल्पना)।
- 2. परतंत्र स्वभाव (Dependent Nature): वह दुनिया जो 'कारण और प्रभाव' (Cause and Effect) पर टिकी है।
- 3. परिनिष्पन्न स्वभाव (Absolute Nature): परम सत्य। यह जानना कि केवल 'विज्ञप्ति' (चेतना) ही सत्य है और बाकी सब भ्रांति है।
8. प्रमुख रचनाएँ: वसुबन्धु की दार्शनिक विरासत
वसुबन्धु को 'सहस्त्र-शास्त्र-प्रणेता' कहा जाता है। उन्होंने तर्कशास्त्र, मनोविज्ञान, योग और भक्ति पर ग्रंथों की बाढ़ ला दी। उनकी प्रमुख कृतियाँ आज भी विश्व दर्शन का गौरव हैं:
- अभिधर्मकोश: बौद्ध दर्शन का सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ।
- विंशतिका विज्ञप्तिमात्रतासिद्धि: बाहरी जगत के खंडन के लिए 20 मारक कारिकाएँ।
- त्रिंशिका विज्ञप्तिमात्रतासिद्धि: चेतना के विकास और आलय-विज्ञान को समझाने वाली 30 कारिकाएँ।
- वज्रच्छेदिका प्रज्ञापारमिता टीका: बुद्ध के वचनों की मनोवैज्ञानिक व्याख्या।
- सुखवतीव्यूह सूत्र टीका: भक्ति और प्रार्थना मार्ग पर उनका अतुलनीय योगदान।
9. निष्कर्ष: वसुबन्धु की वैश्विक विरासत
आचार्य वसुबन्धु का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। चीन के महान यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) मुख्य रूप से वसुबन्धु के दर्शन का अध्ययन करने ही भारत आए थे और उन्होंने उनके ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद किया।
आज का आधुनिक मनोविज्ञान और 'क्वांटम फिजिक्स' वसुबन्धु के सिद्धांतों की पुष्टि कर रहे हैं। वसुबन्धु ने हमें सिखाया कि शांति किसी बाहरी वस्तु में नहीं, बल्कि अपने ही चित्त को समझने और उसे शुद्ध करने में है। वे सचमुच भारतीय मेधा के उस स्वर्ण युग के प्रतीक हैं जब भारत विश्व को 'ज्ञान' की ज्योति दे रहा था।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- अभिधर्मकोश - आचार्य वसुबन्धु (आचार्य नरेन्द्र देव द्वारा अनुवादित एवं व्याख्यायित)।
- विज्ञानवाद और वसुबन्धु - डॉ. भरत सिंह उपाध्याय।
- बौद्ध दर्शन के महान आचार्य - राहुल सांकृत्यायन।
- Seven Works of Vasubandhu - Stefan Anacker.
- History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta (Vol II).
