॥ वैराग्य चिंतन ॥
शाश्वत सुख का मार्ग: आशा का त्याग
तस्मादाशां त्यजेत् प्राज्ञो यदीच्छेच् शाश्वतं सुखम्॥
Tasmādāśāṃ tyajet prājño yadicchecc śāśvataṃ sukham ||
हिन्दी अनुवाद
विस्तृत शब्दार्थ
| आशा (Āśā) | अपेक्षा, कामना या उम्मीद (Hope/Expectation) |
| भङ्गकरी (Bhaṅgakarī) | नष्ट करने वाली या भंग करने वाली |
| पुंसाम् (Puṃsām) | मनुष्यों का / पुरुषों का |
| अजेयारातिसंनिभा | अजेय (न जीतने योग्य) शत्रु के समान |
| त्यजेत् (Tyajet) | त्याग देना चाहिए (Should renounce) |
| प्राज्ञो (Prājño) | बुद्धिमान व्यक्ति (Wise man) |
| शाश्वतं सुखम् | अविनाशी या स्थायी प्रसन्नता |
व्याकरण एवं सूक्ष्म अर्थ
1. संधि: अजेय + अराति + संनिभा। 'अराति' का अर्थ होता है शत्रु। जो शत्रु जीता न जा सके, वैसी है 'आशा'।
2. क्रिया: 'त्यजेत्'—यह विधिलिङ् लकार है, जो 'चाहिए' के अर्थ में निर्देश देता है।
3. दार्शनिक संकेत: यहाँ 'आशा' का अर्थ जीवन के प्रति उत्साह छोड़ना नहीं, बल्कि 'फल की आसक्ति' छोड़ना है। जब हम किसी से उम्मीद लगाते हैं, तो हम अपनी खुशी की चाबी दूसरे के हाथ में दे देते हैं।
आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता
संवादात्मक कथा: पिङ्गला का वैराग्य
श्रीमद्भागवत में 'पिङ्गला' नाम की एक गणिका की कथा आती है। वह पूरी रात अपने प्रेमियों की प्रतीक्षा करती रही कि कोई आएगा और उसे धन देगा। वह आशा में तड़पती रही और सो न सकी।
आधी रात बीतने पर उसे बोध हुआ— "यह आशा ही मेरे दुख का कारण है।" जैसे ही उसने अपेक्षा छोड़ी, उसका मन शांत हो गया और वह सुख की नींद सोई। उसने कहा— "आशा ही परम दुख है, और निराशा (अपेक्षा का न होना) ही परम सुख है।"
शिक्षा: सुख बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि भीतर की 'तृप्ति' में है।

