भारतीय चित्रकला के षडङ्ग (Six Limbs of Art)
"रूपभेदाः प्रमाणानि भावलावण्ययोजनम्। सादृश्यं वर्णिकाभंगं इति चित्रं षडङ्गकम्॥"
प्रस्तावना
प्राचीन भारतीय कला केवल कल्पना की अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि यह एक अत्यंत वैज्ञानिक और अनुशासित पद्धति पर आधारित थी। विष्णुधर्मोत्तर पुराण (चित्रसूत्र) और वात्स्यायन के 'कामसूत्र' की व्याख्या में 'यशोधर पंडित' ने चित्रकला के छह मौलिक अंगों का वर्णन किया है। ये सिद्धांत आज भी कला के विद्यार्थियों और कलाकारों के लिए मील का पत्थर साबित होते हैं।
विस्तृत विश्लेषण: चित्रकला के छह स्तंभ
1. रूपभेदाः (Knowledge of Appearance)विश्लेषण: इसका अर्थ केवल देखना नहीं, बल्कि "भेद" को समझना है। एक कलाकार को पुरुष और स्त्री, बालक और वृद्ध, अथवा एक शेर और चीते के शारीरिक बनावट और स्वभाव के अंतर का सूक्ष्म ज्ञान होना चाहिए। यह कलाकार की दृष्टि की गहराई को दर्शाता है। |
2. प्रमाणानि (Proportion and Measurement)विश्लेषण: यह कला का गणितीय पक्ष है। शरीर के अंगों का एक-दूसरे के सापेक्ष अनुपात (Anatomy) कैसा हो, इसे 'ताल' या 'मान' कहा जाता था। यदि अनुपात सही न हो, तो चित्र कितना भी सुंदर क्यों न हो, वह अस्वाभाविक प्रतीत होता है। |
3. भाव (Emotional Expression)विश्लेषण: भाव चित्र की आत्मा है। निर्जीव चित्र में प्राण तभी फूँके जाते हैं जब उसमें नवरसों (श्रृंगार, करुण, शांत आदि) की अभिव्यक्ति हो। आँखों की चमक या होंठों की मुस्कान के जरिए कलाकार आंतरिक भावनाओं को प्रकट करता है। |
4. लावण्य-योजनम् (Aesthetic Infusion)विश्लेषण: भाव यदि आंतरिक है, तो लावण्य बाह्य सौंदर्य है। यह चित्र में चमक, कोमलता और आकर्षण पैदा करता है। जिस प्रकार भोजन में नमक स्वाद बढ़ाता है, उसी प्रकार लावण्य चित्र की गरिमा और आकर्षण को बढ़ाता है। |
5. सादृश्यं (Similitude or Resemblance)विश्लेषण: सादृश्य का अर्थ है सत्य के निकट होना। कलाकार ने जो देखा या सोचा, वह कैनवास पर वैसा ही उतरे। यह केवल 'कॉपी' करना नहीं है, बल्कि विषय की मूल प्रकृति (Essence) को चित्रित करना है। |
6. वर्णिकाभंगः (Skillful Color and Brushwork)विश्लेषण: यह तकनीकी पक्ष है। इसमें रंगों का मिश्रण, ब्रश चलाने का तरीका (Stroke) और छाया-प्रकाश (Light and Shade) का ज्ञान शामिल है। रंगों के सही चुनाव से ही चित्र में गहराई (Depth) पैदा होती है। |
निष्कर्ष
भारतीय कला के ये षडङ्ग हमें सिखाते हैं कि एक उत्कृष्ट कृति के लिए केवल कौशल ही काफी नहीं है, बल्कि उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण (प्रमाण), दार्शनिक गहराई (भाव) और तकनीकी निपुणता (वर्णिकाभंग) का मेल होना अनिवार्य है। अजंता के चित्रों से लेकर आधुनिक भारतीय चित्रकला तक, इन सिद्धांतों की गूँज स्पष्ट सुनाई देती है।
"कला वह साधना है जो अदृश्य भावों को दृश्य रूप प्रदान करती है।"
