Hans aur Kauwa Ki Kahani: संगति का असर और इंसान की दो प्रवृत्तियाँ (Moral Story)

Sooraj Krishna Shastri
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हंस, कौवा और ब्राह्मण

"संगति का असर: जैसी सोच, वैसी नियति"

🦢 भाग 1: हंस की बुद्धिमानी

प्राचीन समय की बात है। एक शहर में दो ब्राह्मण रहते थे—एक बहुत गरीब और दूसरा अमीर। गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी के रोज-रोज के झगड़ों से तंग आ चुका था। एकादशी के दिन, दुखी होकर वह जंगल की ओर चल पड़ा, यह सोचकर कि कोई शेर उसे खा ले तो मुक्ति मिले।

जंगल में उसे एक गुफा दिखी, जहाँ एक शेर सो रहा था। शेर की नींद में खलल न पड़े, इसलिए बाहर एक हंस पहरा दे रहा था। हंस ने जब ब्राह्मण को आते देखा, तो चिंता में पड़ गया।

🦢 हंस की सोच (सात्विक): "अगर यह ब्राह्मण अंदर गया, तो शेर जागेगा और इसे मार डालेगा। आज एकादशी का पवित्र दिन है, मुझे पाप लगेगा। इसे कैसे बचाऊँ?"

हंस ने चतुराई से जोर से आवाज लगाई:

"ओ जंगल के राजा! उठो! आज आपके भाग्य खुल गए हैं। एकादशी के दिन स्वयं विप्र-देव (ब्राह्मण) आपके द्वार पधारे हैं। जल्दी उठकर इन्हें दक्षिणा दें और विदा करें, इससे आपका मोक्ष हो जाएगा।"

शेर दहाड़कर उठा। हंस की बात उसे सही लगी। उसने अपने शिकार किए हुए मनुष्यों के पुराने गहने ब्राह्मण के चरणों में रख दिए और उसे नमन किया। हंस ने इशारा किया—"विप्रदेव! गहने उठाओ और भाग जाओ, यह शेर है, कभी भी मन बदल सकता है।" ब्राह्मण गहने लेकर सुरक्षित घर लौट गया।

🦅 भाग 2: कौवे की कुटिलता

गरीब ब्राह्मण के धनवान होने की खबर सुनकर अमीर ब्राह्मण की पत्नी को ईर्ष्या हुई। उसने लालच में आकर अपने पति को भी उसी जंगल में भेजा।

अगली एकादशी को अमीर ब्राह्मण उसी गुफा के पास पहुँचा। लेकिन इस बार पहरेदार बदल चुका था। अब वहाँ हंस नहीं, एक कौवा बैठा था।

🦅 कौवे की सोच (तामसिक): "वाह! ब्राह्मण आया है। अब मैं शोर मचाकर शेर को जगाऊँगा। शेर गुस्से में उठेगा, ब्राह्मण को मारेगा और खाएगा। बचा-खुचा मांस मुझे भी मिलेगा। मेरा भी पेट भर जाएगा।"

कौवे ने जोर-जोर से "कांव-कांव" करना शुरू कर दिया। शेर गुस्से में दहाड़ते हुए जागा। उसने सामने ब्राह्मण को देखा, तो उसे पिछले एकादशी की हंस वाली बात याद आ गई। वह समझ गया कि यह कौवा उसे उकसा रहा है।

"हंस उड़ सरवर गये, अब काग भये प्रधान।
थे तो विप्र थांरे घरे जाओ, मैं किनाइनी जिजमान.."

अर्थ: "हे ब्राह्मण! अच्छी सोच वाले 'हंस' तो उड़कर सरोवर चले गए हैं। अब यहाँ 'कौवा' प्रधान है जो मुझे पाप करने (तुम्हें मारने) के लिए उकसा रहा है। इससे पहले कि मेरी बुद्धि फिर जाए, तुम यहाँ से भाग जाओ। शेर किसी का जजमान नहीं होता।"

अमीर ब्राह्मण जान बचाकर वहाँ से भागा।

🎭 हमारे जीवन के हंस और कौवे

यह कहानी केवल जानवरों की नहीं, हमारे समाज और चरित्र की है। हमारे आस-पास भी दो तरह के लोग होते हैं:

🦢 हंस प्रवृत्ति (Positive)

  • जो दूसरों का दुख देखकर दुखी होते हैं।
  • जो हमेशा दूसरों का भला सोचते हैं।
  • जो विवादों को सुलझाते हैं और माफ़ करना सिखाते हैं।
  • जो परिवार/ऑफिस में भाईचारा बढ़ाते हैं।

🦅 कौवा प्रवृत्ति (Negative)

  • जिन्हें दूसरों का सुख सहन नहीं होता।
  • जो लड़ाई-झगड़े और ईर्ष्या को बढ़ावा देते हैं।
  • जो छोटी बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं (चुगली)।
  • जो दूसरों को मुसीबत में देखकर खुश होते हैं।

💡 अनमोल शिक्षा

"अपने आस-पास छुपे बैठे 'कौवों' को पहचानो और उनसे दूर रहो।"

जो 'हंस' प्रवृत्ति के सज्जन लोग हैं, उनका साथ दो और सम्मान करो। इसी में सबका कल्याण और सुख छिपा है।

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