ययाति (King Yayati)

Sooraj Krishna Shastri
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सम्राट ययाति: भोग, त्याग और महान भारतीय वंशों के पूर्वज

चक्रवर्ती सम्राट ययाति: भोग, अभिशाप और वैराग्य की अमर गाथा

ऐतिहासिक और दार्शनिक आलेख (The Legend of King Yayati & His Five Lineages)

भारतीय इतिहास और पुराणों में सम्राट ययाति (King Yayati) का स्थान एक ऐसे राजा के रूप में है, जिनका पूरा जीवन मानवीय इच्छाओं के द्वंद्व का चित्रण करता है। वे चंद्रवंश के महान राजा नहुष के पुत्र थे। ययाति एक कुशल शासक और महान विजेता थे, जिन्होंने पूरे आर्यावर्त पर शासन किया। उनकी कथा का मुख्य केंद्र उनकी दो पत्नियाँ—देवयानी (गुरु शुक्राचार्य की पुत्री) और शर्मिष्ठा (असुरराज वृषपर्वा की पुत्री)—तथा शुक्राचार्य द्वारा दिया गया वृद्धावस्था का अभिशाप है।

📌 सम्राट ययाति: एक दृष्टि में
पिता राजा नहुष (Nahusha)
वंश चंद्रवंश (Lunar Dynasty)
पत्नियाँ देवयानी (शुक्राचार्य की पुत्री), शर्मिष्ठा (वृषपर्वा की पुत्री)
प्रमुख पुत्र यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु और पुरु
प्रसिद्ध उत्तराधिकारी पुरु (पौरव वंश - कौरव/पांडव), यदु (यादव वंश - श्रीकृष्ण)
विशेष पहचान पंचजनों (Five Tribes) के मूल पुरुष
⏳ काल निर्धारण एवं युग
युग
त्रेता युग का प्रारंभिक कालययाति भगवान राम से कई पीढ़ियों पूर्व और श्रीकृष्ण से बहुत पहले हुए थे।
ऐतिहासिक स्थिति
प्रारंभिक वैदिक/पौराणिक कालउन्हें प्राचीन 'पंचजनों' का जनक माना जाता है, जिनका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है।

1. शुकदेव का अभिशाप: असमय वृद्धावस्था

ययाति ने देवयानी से विवाह किया था, किन्तु उन्होंने गुप्त रूप से शर्मिष्ठा से भी प्रेम किया और उनसे तीन पुत्र प्राप्त किए। जब देवयानी को यह पता चला, तो उन्होंने अपने पिता गुरु शुक्राचार्य से शिकायत की। क्रोधित होकर शुक्राचार्य ने ययाति को श्राप दिया कि वे अपनी युवावस्था खो देंगे और तत्काल वृद्ध हो जाएंगे।

जब ययाति ने क्षमा मांगी, तो शुक्राचार्य ने कहा कि यदि कोई पुत्र स्वेच्छा से अपनी युवावस्था उन्हें दे दे, तो वे पुनः युवा हो सकते हैं।

2. पुत्रों का त्याग: पुरु का बलिदान

ययाति ने अपने पाँचों पुत्रों से अपनी वृद्धावस्था लेने और बदले में अपनी युवावस्था देने का आग्रह किया।

  • यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु: इन चारों बड़े पुत्रों ने अपनी युवावस्था देने से इनकार कर दिया।
  • पुरु (Puru): सबसे छोटे पुत्र पुरु ने सहर्ष अपने पिता के बुढ़ापे को स्वीकार किया और उन्हें अपनी जवानी दे दी।

ययाति ने पुरु की जवानी पाकर हजारों वर्षों तक भोग विलास किया, लेकिन अंततः उन्हें बोध हुआ कि विषय-वासना की कभी तृप्ति नहीं होती।

3. महान पांच वंश: यदु से पुरु तक

ययाति के पाँचों पुत्रों ने भारत के इतिहास में प्रसिद्ध राजवंशों की स्थापना की, जिन्हें ऋग्वेद में 'पंचजन' कहा गया है:

  • यदु: इनसे यादव वंश चला, जिसमें आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।
  • पुरु: ययाति ने पुरु को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया। इन्हीं से पौरव वंश चला, जिसमें भरत, शांतनु, और कौरव-पांडव हुए।
  • द्रुह्यु, तुर्वसु और अनु: इन्होंने भारत के विभिन्न सीमावर्ती क्षेत्रों (जैसे गांधार और दक्षिण भारत) में अपने साम्राज्यों का विस्तार किया।

4. दार्शनिक संदेश: इच्छाओं का अंत

हजारों वर्षों के भोग के बाद ययाति ने जो कहा, वह आज भी वैराग्य दर्शन का सबसे बड़ा सूत्र है। उन्होंने पुरु को उसकी युवावस्था लौटा दी और सन्यास ले लिया।

"न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्धते॥"
अर्थ: इच्छाएं भोग करने से कभी शांत नहीं होतीं, बल्कि जैसे अग्नि में घी डालने से वह और भड़कती है, वैसे ही भोग से वासना और बढ़ती है।

5. निष्कर्ष

सम्राट ययाति का जीवन हमें 'सीमा' का महत्व समझाता है। वे एक महान चक्रवर्ती राजा थे, लेकिन उनका वास्तविक बड़प्पन तब प्रकट हुआ जब उन्होंने अपनी गलतियों को स्वीकार किया और सत्य को पहचाना। उनका वंश आज भी भारतीय संस्कृति की धुरी है, चाहे वह यादव वंश हो या कुरुवंश। ययाति की गाथा केवल एक राजा की कहानी नहीं, बल्कि हर मनुष्य के भीतर चलने वाले 'भोग' और 'योग' के संघर्ष की कहानी है।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • महाभारत (आदि पर्व - ययाति उपाख्यान)।
  • श्रीमद्भागवत पुराण (नवम स्कन्ध - अध्याय 18-19)।
  • विष्णु पुराण (चतुर्थ अंश)।
  • ऋग्वेद (पंचजनों का वर्णन)।

सम्राट ययाति के जीवन और उनकी वैराग्य गाथा को और अधिक विस्तार से जानने के लिए आप यह पौराणिक प्रसंग देख सकते हैं:

[The Story of King Yayati | Mahabharata | Lessons on Desire and Sacrifice](https://www.youtube.com/watch?v=AOnvB6lK5vI)

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