महर्षि च्यवन: कायाकल्प के प्रथम ऋषि और च्यवनप्राश के जनक
पौराणिक और आयुर्वेदिक आलेख (Sage of Rejuvenation & Origin of Chyawanprash)
भारतीय इतिहास में महर्षि च्यवन (Maharishi Chyavana) का नाम वृद्धावस्था से पुनः युवावस्था प्राप्त करने (Rejuvenation) के लिए प्रसिद्ध है। वे महर्षि भृगु और पुलोमा के पुत्र थे। उनका जन्म समय से पूर्व (premature) हुआ था, इसलिए उनका नाम 'च्यवन' (च्युत/गिरा हुआ) पड़ा। वे ऋग्वेद के कई मंत्रों के दृष्टा हैं और आयुर्वेद के सबसे प्रसिद्ध रसायन 'च्यवनप्राश' की उत्पत्ति की कथा उन्हीं से जुड़ी है।
| पिता | महर्षि भृगु (Bhrigu) |
| माता | पुलोमा (Puloma) |
| पत्नी | सुकन्या (राजा शर्याति की पुत्री) |
| सम्बन्धित वेद | ऋग्वेद (कुछ सूक्तों के दृष्टा) |
| मुख्य योगदान | च्यवनप्राश की उत्पत्ति, अश्विनी कुमारों को देवत्व दिलाना |
| वंशावली | भृगु → च्यवन → और्व (या दधीचि) |
1. सुकन्या और वाल्मीक (दीमक): एक अद्भुत विवाह
महर्षि च्यवन ने एक स्थान पर बैठकर इतनी कठोर तपस्या की कि उनके शरीर पर दीमकों ने अपना घर (बांबी/Anthill) बना लिया। वे पूरी तरह मिट्टी से ढक गए, केवल उनकी दो आँखें चमक रही थीं।
- सुकन्या की भूल: राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या वन-विहार कर रही थी। उसने बांबी में दो चमकती मणियाँ समझकर कांटा चुभा दिया, जिससे ऋषि की आँखें फूट गईं।
- प्रायश्चित विवाह: राजा को जब अपने अपराध का बोध हुआ, तो उन्होंने ऋषि के क्रोध को शांत करने के लिए अपनी युवा पुत्री सुकन्या का विवाह वृद्ध और नेत्रहीन च्यवन से कर दिया। सुकन्या ने इसे नियति मानकर पति की सेवा स्वीकार की।
2. कायाकल्प: अश्विनी कुमारों का चमत्कार
एक दिन देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमार (Ashwini Kumaras) आश्रम आए और सुकन्या की पति-सेवा से प्रसन्न हुए। उन्होंने सुकन्या को वरदान दिया कि वे उसके पति को पुनः युवा और सुंदर बना देंगे।
- औषधि निर्माण: अश्विनी कुमारों ने एक विशेष दिव्य औषधि तैयार की और च्यवन ऋषि को एक कुंड में स्नान कराया।
- परिणाम: स्नान के बाद च्यवन ऋषि एक नवयुवक के रूप में बाहर निकले, उनकी दृष्टि भी लौट आई। जिस औषधि (रसायन) का प्रयोग किया गया, उसे ही बाद में 'च्यवनप्राश' (Chyavana-Prasha) कहा गया।
3. इंद्र से संघर्ष: अश्विनी कुमारों को सोमपान
च्यवन ऋषि ने प्रसन्न होकर अश्विनी कुमारों को यज्ञ में 'सोमपान' (Soma Offering) का अधिकार दिलाने का वचन दिया, जो तब तक उन्हें प्राप्त नहीं था (क्योंकि वे वैद्यों के रूप में अशुद्ध माने जाते थे)।
- इंद्र का विरोध: जब राजा शर्याति के यज्ञ में च्यवन ने अश्विनी कुमारों को सोम दिया, तो इंद्र ने क्रोधित होकर उन पर वज्र उठाया।
- मद राक्षस: च्यवन ऋषि ने अपने तपोबल से इंद्र की भुजा को जड़ (Paralyzed) कर दिया और हवन कुंड से 'मद' नामक एक भयानक असुर उत्पन्न किया। भयभीत होकर इंद्र ने क्षमा मांगी और अश्विनी कुमारों को देवताओं की पंक्ति में स्थान दिया।
4. निष्कर्ष
महर्षि च्यवन का जीवन हमें सिखाता है कि आयु और शरीर नश्वर हैं, किन्तु ज्ञान और तप अमर हैं। उन्होंने न केवल आयुर्वेद को उसका सबसे अनमोल उपहार दिया, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि एक ब्राह्मण का तेज देवराज इंद्र के वज्र से भी अधिक शक्तिशाली हो सकता है। आज जब हम च्यवनप्राश का सेवन करते हैं, तो हम अनजाने में उसी महान ऋषि की विरासत से जुड़ते हैं।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- शतपथ ब्राह्मण (काण्ड 4)।
- महाभारत (वन पर्व - तीर्थयात्रा प्रसंग)।
- श्रीमद्भागवत पुराण (नवम स्कन्ध)।
- ऋग्वेद (मंडल 1 और 10)।
महर्षि च्यवन और सुकन्या की कथा को विस्तार से समझने के लिए यह वीडियो देखें:
[Chyavan Rishi and Sukanya | Origins of Chyavanprash | Mahabharata](https://www.youtube.com/watch?v=fiHZMknokz0)यह वीडियो महाभारत के वन पर्व में वर्णित च्यवन ऋषि की कथा और च्यवनप्राश की उत्पत्ति का सुंदर चित्रण करता है।
