महर्षि गृत्समद: ऋग्वेद के द्वितीय मंडल के दृष्टा और भृगु-शौनक वंश के गौरव
ऐतिहासिक और वैदिक विश्लेषण (Rigvedic Seer, Devotee of Ganesha & Innovator of Hymns)
भारतीय वैदिक परंपरा में महर्षि गृत्समद (Maharishi Gritsamada) का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। ऋग्वेद की दस संहिताओं (मंडलों) में से **द्वितीय मंडल** के सभी मन्त्रों का साक्षात्कार उन्होंने ही किया था। वे केवल एक दार्शनिक नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि के योगवेत्ता भी थे। गृत्समद का व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि वैदिक काल में वर्ण का निर्धारण गुणों और कर्मों के आधार पर होता था, क्योंकि उन्होंने जन्म से क्षत्रिय होने के बावजूद अपने तप से ब्राह्मणत्व प्राप्त किया।
| पिता | शुनहोत्र (अंगिरा कुल) / गोद लेने वाले पिता: शुनक (भृगु कुल) |
| कुल / वंश | भार्गव-शौनक (Bhargava-Saunaka) |
| प्रमुख योगदान | ऋग्वेद के द्वितीय मंडल के मन्त्रद्रष्टा |
| इष्ट देवता | भगवान इंद्र और भगवान गणेश (विनायक) |
| प्रसिद्ध सूक्त | इंद्र सूक्त (स जनास इंद्रः) |
1. विलक्षण जन्म और कुल परिवर्तन (क्षत्रिय से ब्राह्मण)
महर्षि गृत्समद की वंशावली बड़ी रोचक है। वे मूलतः अंगिरा कुल के राजा **शुनहोत्र** के पुत्र थे, जो कि एक क्षत्रिय राजवंश था।
- दस्यु संकट: एक बार असुरों ने राजा शुनहोत्र के राज्य पर आक्रमण किया। तपस्या में लीन गृत्समद को असुरों ने इंद्र समझ लिया (क्योंकि उनका तेज इंद्र जैसा था)।
- भृगु कुल में प्रवेश: अपनी रक्षा और आध्यात्मिक उन्नति के लिए वे भृगु वंशी ऋषि **शुनक** की शरण में गए। शुनक ने उन्हें अपना पुत्र स्वीकार किया। इस प्रकार वे क्षत्रिय से ब्राह्मण बने और 'शौनक' कहलाए।
2. ऋग्वेद में योगदान: द्वितीय मंडल के मंत्र
ऋग्वेद का द्वितीय मंडल पूर्णतः गृत्समद और उनके वंशजों को समर्पित है। इसमें 43 सूक्त हैं।
- इंद्र की स्तुति: उनके द्वारा दृष्ट 'इंद्र सूक्त' (ऋग्वेद 2.12) अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है, जिसकी प्रत्येक ऋचा के अंत में "स जनास इंद्रः" (हे लोगों! वही इंद्र है) आता है।
- ब्रह्मणस्पति: उन्होंने ही 'ब्रह्मणस्पति' (ज्ञान के देवता) की महिमा के मंत्रों का साक्षात्कार किया, जिन्हें बाद में गणेश के स्वरूप से जोड़ा गया।
3. गणेश भक्ति और गणेश अथर्वशीर्ष
पौराणिक परंपराओं (जैसे मुद्गल पुराण और गणेश पुराण) के अनुसार, गृत्समद भगवान गणेश के परम भक्त थे।
- गाणपत्य संप्रदाय: उन्हें गाणपत्य संप्रदाय के आदि आचार्यों में गिना जाता है।
- मंत्र शक्ति: माना जाता है कि प्रसिद्ध 'गणेश अथर्वशीर्ष' का मूल दर्शन और गणेश की 'ब्रह्मणस्पति' के रूप में वैदिक स्तुति गृत्समद की साधना का ही परिणाम है। उन्होंने गाणपत्य योग की सूक्ष्म विधियों का प्रचार किया।
4. निष्कर्ष
महर्षि गृत्समद का जीवन ज्ञान और शक्ति के समन्वय का प्रतीक है। उन्होंने न केवल वेदों की ऋचाओं को सहेजा, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि व्यक्ति अपने पुरुषार्थ से अपनी नियति बदल सकता है। उनके द्वारा रचित इंद्र और गणेश की स्तुतियाँ आज भी सनातन धर्म के अनुष्ठानों की आधारशिला हैं। वे 'भृगु-शौनक' परंपरा के वह प्रकाश स्तंभ हैं जिन्होंने भारतीय मनीषा को एक नई दिशा दी।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- ऋग्वेद संहिता (द्वितीय मंडल)।
- निरुक्त (यास्क मुनि) - ऋषि परिचय खंड।
- मुद्गल पुराण (गणेश-गृत्समद कथा)।
- वैदिक वंशावली - शोध संस्थान, ऋषिकेश।
