महर्षि मतंग: शबरी के गुरु, संगीत के आदि आचार्य और तपस्या के सर्वोच्च शिखर
पौराणिक और ऐतिहासिक आलेख (The Preceptor of Sabari & Master of Vedic Musicology)
भारतीय सनातन परंपरा में महर्षि मतंग (Maharishi Matanga) एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने सिद्ध किया कि महानता जन्म से नहीं, बल्कि कर्म और तपस्या से प्राप्त होती है। वे रामायण काल के एक अत्यंत प्रभावशाली ऋषि थे, जिनका आश्रम पंपा सरोवर के निकट **ऋष्यमूक पर्वत** पर स्थित था। मतंग ऋषि का जीवन ज्ञान, संगीत और करुणा का संगम है। उन्हें न केवल एक मंत्रद्रष्टा ऋषि के रूप में जाना जाता है, बल्कि संगीत के सात स्वरों (सप्तस्वर) के वैज्ञानिक विश्लेषण का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।
| प्रमुख शिष्य | माता शबरी (Sabari) |
| निवास स्थान | मतंग वन, ऋष्यमूक पर्वत (पंपा सरोवर के निकट) |
| मुख्य ग्रंथ | बृहद्देशी (Brihaddeshi - संगीत शास्त्र) |
| विशेष पहचान | रामायण काल के महान तेजस्वी ऋषि |
| पौराणिक घटना | वानरराज बाली को दिया गया शाप |
1. शबरी और मतंग: गुरु-शिष्य परंपरा का आदर्श
रामायण का सबसे भावुक प्रसंग माता शबरी और मतंग ऋषि के संबंधों पर आधारित है। शबरी, जो एक भीलनी थीं, मतंग ऋषि की सेवा में समर्पित थीं। जब मतंग ऋषि का अंत समय निकट आया, तो उन्होंने शबरी को आशीर्वाद दिया कि एक दिन स्वयं भगवान राम उनके आश्रम आएंगे।
मतंग ऋषि ने शबरी को धैर्य और भक्ति का मार्ग दिखाया। उनके आदेश पर ही शबरी वर्षों तक भगवान राम की प्रतीक्षा करती रहीं और प्रतिदिन उनके मार्ग में फूल बिछाती रहीं। यह मतंग ऋषि की ही दिव्य दृष्टि थी जिसने एक सामान्य वनवासी को भक्ति के सर्वोच्च शिखर 'महासती' के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया।
2. बाली का शाप: ऋष्यमूक पर्वत का रहस्य
रामायण के किष्किंधा कांड के अनुसार, वानरराज बाली और दुंदुभी नामक असुर के बीच भीषण युद्ध हुआ था। बाली ने दुंदुभी का वध कर उसके शव को हवा में उछाल दिया, जिसके रक्त की बूंदें मतंग ऋषि के आश्रम में गिर गईं।
- शाप का कारण: आश्रम की पवित्रता भंग होने से क्रोधित होकर मतंग ऋषि ने बाली को शाप दिया कि यदि वह कभी भी ऋष्यमूक पर्वत की सीमा में प्रवेश करेगा, तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाएगी।
- सुग्रीव की शरण: इसी शाप के कारण सुग्रीव ने बाली के भय से ऋष्यमूक पर्वत पर शरण ली थी, क्योंकि उन्हें पता था कि बाली वहां कभी नहीं आ सकता।
3. संगीत शास्त्र: 'बृहद्देशी' और रागों का ज्ञान
अध्यात्म के साथ-साथ मतंग मुनि का योगदान शास्त्रीय संगीत में अतुलनीय है। उनके द्वारा रचित ग्रंथ 'बृहद्देशी' भारतीय संगीत के इतिहास में एक मील का पत्थर है।
- राग शब्द की उत्पत्ति: माना जाता है कि 'राग' शब्द की पहली तकनीकी व्याख्या मतंग मुनि ने ही दी थी।
- स्वर साधना: उन्होंने सामवेद के गायन और लोक संगीत (देशी संगीत) के बीच सामंजस्य स्थापित किया, इसीलिए उनके ग्रंथ का नाम 'बृहद्देशी' पड़ा।
4. महाभारत संदर्भ: वर्ण परिवर्तन की तपस्या
महाभारत के अनुशासन पर्व में मतंग ऋषि का एक और प्रसंग मिलता है। कथा के अनुसार, मतंग का जन्म एक चांडाल परिवार में हुआ था, किन्तु उन्होंने अपनी इंद्रिय-जय और कठोर तपस्या से 'ब्राह्मणत्व' प्राप्त करने का प्रयास किया। इंद्र के बार-बार मना करने के बावजूद उन्होंने इतनी कठिन तपस्या की कि वे आकाशचारी और सभी जीवों के वंदनीय बन गए। यह कथा हमें सिखाती है कि वैदिक काल में योग्यता का आधार 'जन्म' नहीं बल्कि 'पुरुषार्थ' था।
5. निष्कर्ष
महर्षि मतंग का जीवन हमें यह शिक्षा देता है कि भक्ति और ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती। जहाँ एक ओर वे बाली जैसे शक्तिशाली राजा को शाप देने का सामर्थ्य रखते थे, वहीं दूसरी ओर शबरी जैसी सरल शिष्या के प्रति उनकी अपार करुणा थी। वे न केवल रामायण के एक महत्वपूर्ण सूत्रधार हैं, बल्कि भारतीय कला और संगीत के शाश्वत गुरु भी हैं। मतंग वन की पावन स्मृति आज भी दक्षिण भारत के हम्पी (प्राचीन किष्किंधा) क्षेत्र में सुरक्षित है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- वाल्मीकि रामायण (अरण्य काण्ड और किष्किंधा काण्ड)।
- बृहद्देशी - मतंग मुनि कृत (संगीत शास्त्र)।
- महाभारत (अनुशासन पर्व - मतंग उपाख्यान)।
- पुराण कोश - ऋषियों की वंशावली।
महर्षि मतंग और माता शबरी के पावन संबंधों को और गहराई से समझने के लिए आप यह वीडियो देख सकते हैं:
[Shabri and Sage Matanga | Ramayana Story | The Power of Guru's Word](https://www.youtube.com/watch?v=Xf3E5Wn0QoY)