महर्षि कंबल (Maharishi Kambala)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि कंबल: संगीत के महान आचार्य और नागराज ऋषि

महर्षि कंबल: संगीत शास्त्र के मर्मज्ञ, नागराज ऋषि और दिव्य संगीतकार

एक विस्तृत पौराणिक और आध्यात्मिक आलेख (The Naga Sage & Master of Saptasvaras)

भारतीय ऋषि परंपरा में कुछ ऐसे दिव्य व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने शस्त्र और शास्त्र के साथ-साथ ललित कलाओं में भी सिद्धि प्राप्त की। इनमें महर्षि कंबल (Maharishi Kambala) का नाम अत्यंत विशिष्ट है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, कंबल और उनके भाई अश्वतर दोनों नाग जाति के ऋषि (Naga Rishis) थे। वे पाताल लोक के वासी होने के बावजूद अपनी तपस्या और संगीत के प्रति अगाध प्रेम के कारण देवलोक और ऋषि समाज में पूजनीय हुए। उन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत के 'सप्त स्वरों' (Saptasvaras) का प्रथम मानवीकृत आचार्य माना जाता है।

📌 महर्षि कंबल: एक दृष्टि में
कुल / जाति नाग वंश (Naga Lineage)
पिता महर्षि कश्यप (कुछ मतों में शेषनाग के अंश)
सहोदर भाई महर्षि अश्वतर (Ashvatara)
इष्ट देवी माँ सरस्वती (Goddess Saraswati)
विशेष सिद्धि संगीत के सात स्वर और गंधर्व विद्या
मुख्य ग्रंथ उल्लेख मार्कण्डेय पुराण, मत्स्य पुराण, महाभारत
⏳ काल निर्धारण एवं युग
सृष्टि काल
सत्य युग / त्रेता युगये प्राचीन ऋषि हैं जिनका अस्तित्व ऋषियों और देवताओं के बीच संगीत के आदान-प्रदान के समय से है।
धार्मिक स्थिति
दिव्य संगीतकार (Celestial Musicians)इन्हें गंधर्वों के समान दिव्य गायन की शक्ति प्राप्त थी।

1. सरस्वती साधना: संगीत के सात स्वरों की प्राप्ति

मार्कण्डेय पुराण में एक अत्यंत सुंदर प्रसंग आता है। महर्षि कंबल और अश्वतर ने भगवान शिव के गले में शेषनाग के साथ निवास करते हुए संगीत की सूक्ष्मताओं को समझा था, किन्तु वे स्वरों के पूर्ण ज्ञान के लिए व्याकुल थे।

उन्होंने हिमालय के पावन शिखर पर जाकर माता सरस्वती की घोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माँ सरस्वती प्रकट हुईं और उन्होंने वरदान स्वरूप दोनों भाइयों की जिव्हा (जीभ) पर निवास किया।

  • सात स्वर: माता की कृपा से उन्हें षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद (स, रे, ग, म, प, ध, नि) का पूर्ण बोध हुआ।
  • ताल और लय: स्वरों के साथ-साथ उन्हें लय और ताल की उन बारीकियों का ज्ञान हुआ जो केवल देवताओं के लिए सुलभ थीं।

2. संगीत शास्त्र में महर्षि कंबल का योगदान

महर्षि कंबल को संगीत के 'कंबल-अश्वतर' मत (School of Music) का प्रवर्तक माना जाता है। प्राचीन संगीत ग्रंथों में उनके मत का उल्लेख बड़े आदर से मिलता है।

"कम्बलाश्वतरौ चोभौ नागराजौ महातपौ।
स्वरशास्त्रप्रणेतारौ गान्धर्वज्ञानपारगौ॥"
अर्थ: कंबल और अश्वतर दोनों नागराज महान तपस्वी थे, जिन्होंने स्वरशास्त्र की रचना की और गंधर्व ज्ञान में पारंगत हुए।
  • श्रुति और मूर्छना: संगीत में श्रुतियों के विभाजन और मूर्छनाओं के प्रयोग पर महर्षि कंबल के नियम आज भी शोध का विषय हैं।
  • भगवान शिव की सेवा: कहा जाता है कि जब भी भगवान शिव तांडव करते हैं या एकांत में समाधिस्थ होते हैं, तो महर्षि कंबल और अश्वतर अपने संगीत से महादेव का मनोरंजन और स्तुति करते हैं।
  • नाग और संगीत का संबंध: भारतीय संस्कृति में नागों का संगीत (विशेषकर बीन/स्वर) के प्रति जो आकर्षण दिखाया गया है, उसका आधार महर्षि कंबल जैसे संगीतज्ञ ऋषि ही हैं।

3. निष्कर्ष

महर्षि कंबल का जीवन हमें यह सिखाता है कि कला और आध्यात्मिकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ईश्वर तक पहुँचने का एक 'नाद ब्रह्म' (Sound as God) मार्ग है। नागराज होते हुए भी अपनी साधना से ऋषि पद प्राप्त करना उनके महान व्यक्तित्व का परिचायक है। आज भी जो साधक संगीत की गहराइयों को समझना चाहते हैं, वे महर्षि कंबल की परंपरा का अनजाने में ही अनुसरण कर रहे होते हैं।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • मार्कण्डेय पुराण (संगीत और सरस्वती वरदान खंड)।
  • मत्स्य पुराण (नाग वंशावली)।
  • महाभारत (सभा पर्व - ऋषियों की सूची)।
  • संगीत रत्नाकर - आचार्य शारंगदेव।

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