महर्षि कौरव्य (Maharishi Kauravya)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि कौरव्य: शिव के 24वें योगावतार और महान पाशुपत आचार्य | Maharishi Kauravya

महर्षि कौरव्य: भगवान शिव के 24वें योगावतार और शैव ज्ञान के प्रदीप्त पुंज

एक विशेष पौराणिक आलेख: कौरव्य ऋषि का जीवन और उनके दार्शनिक सिद्धांत (The 24th Avatar of Shiva & Sage Kauravya)

भारतीय संस्कृति में ऋषियों का स्थान देवताओं के समान माना गया है। शैव परंपरा के अनुसार, भगवान शिव ने धर्म की रक्षा और योग विद्या के प्रसार के लिए प्रत्येक द्वापर युग में अवतार लिए। इन्हीं **28 योगावतारों** में से 24वें अवतार का नाम महर्षि कौरव्य (Maharishi Kauravya) है। वे एक ऐसे सिद्ध पुरुष थे जिन्होंने तपस्या और ज्ञान के माध्यम से 'पाशुपत योग' को नई दिशा दी। उनका उल्लेख वायु पुराण, लिंग पुराण और कूर्म पुराण में ससम्मान किया गया है।

📌 महर्षि कौरव्य: एक दृष्टि में
अवतार क्रम भगवान शिव के 24वें योगावतार
कुल / वंश शैव ऋषि परंपरा (योगाचार्यों की वंशावली)
प्रमुख क्षेत्र हिमालय की कंदराएं एवं वाराणसी
दर्शन शैव दर्शन (Shaiva Siddhanta)
मुख्य ग्रंथ उल्लेख लिंग पुराण, वायु पुराण, कूर्म पुराण
⏳ काल निर्धारण एवं युग (Kal Nirdharan)
युग (Era)
24वाँ द्वापर (24th Dvapara Yuga)यह वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर का समय है।
धार्मिक स्थिति
नित्य सिद्ध योगीकौरव्य ऋषि को काल की सीमाओं से परे 'अमर योगी' के रूप में भी जाना जाता है।

1. पौराणिक इतिहास और वंशावली

महर्षि कौरव्य का नाम सुनते ही अक्सर नागराज कौरव्य (उलूफी के पिता) का स्मरण आता है, किन्तु योगावतार कौरव्य उनसे भिन्न हैं। योगावतार कौरव्य भगवान शिव के साक्षात् स्वरूप थे। उन्होंने अपने जीवन में 'मौन' और 'ध्यान' को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

पुराणों के अनुसार, जब 24वें द्वापर युग में धर्म का ह्रास होने लगा, तब भगवान शिव ने कौरव्य के रूप में अवतार लेकर मुनियों को 'योग मार्ग' का सच्चा अर्थ समझाया। उन्होंने सिखाया कि शिवत्व की प्राप्ति बाहरी अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और इन्द्रिय संयम से होती है।

2. महर्षि कौरव्य के चार प्रमुख शिष्य

शिव के प्रत्येक योगावतार की भांति, महर्षि कौरव्य के भी चार प्रमुख शिष्य हुए, जिन्होंने उनके ज्ञान को चारों दिशाओं में फैलाया:

  • संख्यापद (Samkhyapada): इन्होंने सांख्य और योग के मेल पर बल दिया।
  • भार्गव (Bhargava): भृगु वंश के ये ऋषि कौरव्य के प्रिय शिष्यों में से एक थे।
  • गिरीश (Girisha): इन्होंने हिमालय क्षेत्रों में रहकर शैव मत का प्रचार किया।
  • सविता (Savita): इन्होंने प्रकाश और चेतना के विज्ञान को समाज के सामने रखा।

इन चारों ऋषियों ने महर्षि कौरव्य के सानिध्य में वह परम ज्ञान प्राप्त किया, जिससे वे स्वयं भी सिद्ध पुरुष कहलाए।

3. निष्कर्ष

महर्षि कौरव्य का चरित्र हमें यह सिखाता है कि सत्य की खोज में एकांत और तपस्या का कितना महत्व है। वे उन 28 आचार्यों की कड़ी हैं जिन्होंने अनादि काल से योग की ज्योत को जलाए रखा है। आज भी जो साधक पाशुपत व्रत का पालन करते हैं, वे महर्षि कौरव्य की ऊर्जा से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। उनकी स्मृति मात्र से मन में शांति और भक्ति का संचार होता है।


सन्दर्भ ग्रंथ (References)

  • शिव पुराण (शतरुद्र संहिता)।
  • वायु पुराण (अध्याय 23)।
  • लिंग पुराण (योगावतार वर्णन)।
  • भारतीय ऋषि-मुनि परंपरा - आचार्य परशुराम चतुर्वेदी।

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