महर्षि कर्दम: प्रजापति, कठोर तपस्वी और सांख्य दर्शन के प्रणेता भगवान कपिल के पिता
एक विस्तृत पौराणिक और आध्यात्मिक गाथा (The Story of Sage Kardama & Devahuti)
श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध में महर्षि कर्दम (Maharishi Kardama) का चरित्र विस्तार से वर्णित है। वे भगवान ब्रह्मा के छाया रूप से उत्पन्न मानस पुत्र और प्रजापतियों में से एक हैं। महर्षि कर्दम का जीवन हमें सिखाता है कि किस प्रकार एक व्यक्ति कठोर तपस्या के बाद भी धर्मपूर्वक गृहस्थ जीवन व्यतीत कर सकता है और अंततः मोक्ष प्राप्त कर सकता है। वे साक्षात् भगवान विष्णु के अवतार, कपिल देव के पिता थे।
| पिता | भगवान ब्रह्मा (मानस पुत्र) |
| पत्नी | देवहूति (स्वयंभू मनु की पुत्री) |
| पुत्र | भगवान कपिल (सांख्य शास्त्र के प्रवर्तक) |
| पुत्रियां | नौ कन्याएं (अनसूया, अरुन्धती आदि) |
| तपस्थली | बिन्दु सरोवर (सिद्धपुर, गुजरात) |
| मुख्य ग्रंथ | श्रीमद्भागवत पुराण (तृतीय स्कन्ध) |
1. बिन्दु सरोवर पर कठोर तपस्या
ब्रह्मा जी की आज्ञा पाकर सृष्टि विस्तार के उद्देश्य से महर्षि कर्दम ने सरस्वती नदी के तट पर स्थित बिन्दु सरोवर पर दस हज़ार वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर प्रकट हुए। भगवान के नेत्रों से करुणा के आंसू गिरे, जिससे वह सरोवर 'बिन्दु सरोवर' कहलाया।
प्रत्यक्षं दर्शयामास प्रसन्नो गरुडध्वजः॥" अर्थ: दस हज़ार वर्ष बीतने पर वैकुण्ठपति भगवान विष्णु प्रसन्न होकर कर्दम के सम्मुख प्रकट हुए।
भगवान ने उन्हें वरदान दिया कि राजा स्वयंभू मनु अपनी पुत्री देवहूति को लेकर उनके पास आएंगे और वे उनकी पत्नी बनेंगी। भगवान ने यह भी वचन दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे।
2. देवहूति के साथ विवाह और गृहस्थ धर्म
निश्चित समय पर स्वयंभू मनु और रानी शतरूपा अपनी पुत्री देवहूति के साथ कर्दम ऋषि के आश्रम पहुँचे। देवहूति ने महर्षि के तपस्वी जीवन को सहर्ष स्वीकार किया।
विवाह के पश्चात देवहूति ने कई वर्षों तक पति की सेवा की, जिससे वे अत्यंत दुर्बल हो गईं। कर्दम ऋषि ने अपनी योग शक्ति से एक दिव्य विमान (विमान-गृह) की रचना की, जो इच्छानुसार कहीं भी उड़ सकता था। उन्होंने देवहूति को दिव्य रूप प्रदान किया और वर्षों तक विभिन्न लोकों का भ्रमण किया।
3. नौ कन्याएं और पुत्र कपिल (भगवान का अवतार)
महर्षि कर्दम और देवहूति के नौ कन्याएं हुईं, जिनका विवाह महान ऋषियों से हुआ (जैसे अत्रि के साथ अनसूया, वशिष्ठ के साथ अरुन्धती)। अंततः, भगवान विष्णु ने उनके दसवें पुत्र के रूप में जन्म लिया, जिनका नाम कपिल रखा गया।
- सांख्य दर्शन: कपिल मुनि ने ही 'सांख्य दर्शन' का प्रतिपादन किया और अपनी माता देवहूति को आत्मज्ञान का उपदेश दिया।
- संन्यास: पुत्र के बड़ा होने पर महर्षि कर्दम ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार गृहस्थ त्याग दिया और संन्यास लेकर परमात्मा में विलीन हो गए।
4. निष्कर्ष
महर्षि कर्दम का चरित्र पुरुषार्थ और भक्ति का अनूठा उदाहरण है। उन्होंने सिद्ध किया कि योग मार्ग और गृहस्थ मार्ग में कोई विरोध नहीं है, यदि दोनों धर्मपूर्वक किए जाएं। बिन्दु सरोवर आज भी गुजरात के सिद्धपुर में स्थित है, जहाँ लोग महर्षि कर्दम और माता देवहूति का स्मरण करते हैं।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- श्रीमद्भागवत महापुराण (तृतीय स्कन्ध, अध्याय 21-24)।
- विष्णु पुराण (प्रजापति वंशावली)।
- ब्रह्म पुराण।
