महर्षि ऋष्यशृंग: अद्भुत बाल-तपस्वी और रामायण के 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' के महापुरोहित
एक पौराणिक आलेख: महर्षि ऋष्यशृंग का जन्म, अनावृष्टि का निवारण और श्री राम अवतार में भूमिका (The Sage with the Deer Horn)
भारतीय ऋषि परंपरा में महर्षि ऋष्यशृंग (Maharishi Rishyasringa) एक ऐसे विलक्षण ऋषि हैं, जिनका जीवन नैष्ठिक ब्रह्मचर्य और पवित्रता की पराकाष्ठा है। 'ऋष्यशृंग' का अर्थ है—"हिरण के सींग वाला"। महर्षि विभाण्डक के पुत्र होने के कारण उन्हें 'विभाण्डक-पुत्र' भी कहा जाता है। वे रामायण और महाभारत दोनों ही महाकाव्यों के प्रमुख पात्र हैं। उनका सबसे बड़ा योगदान अयोध्या के महाराज दशरथ के लिए वह यज्ञ संपन्न करना था, जिससे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का प्राकट्य हुआ।
| पिता | महर्षि विभाण्डक (कश्यप वंश) |
| पत्नी | शांता (राजा दशरथ की पुत्री, राजा रोमपाद की दत्तक पुत्री) |
| विशेष पहचान | मस्तक पर मृग (हिरण) का सींग |
| मुख्य सिद्धि | वर्षा कराने की शक्ति और यज्ञ विद्या |
| ग्रंथ उल्लेख | वाल्मीकि रामायण, महाभारत (वन पर्व) |
1. जन्म और विलक्षण पालन-पोषण
पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि विभाण्डक एक बार नदी में स्नान कर रहे थे, तभी उनकी दृष्टि एक अप्सरा पर पड़ी। उनके वीर्य का पतन जल में हुआ, जिसे एक प्यासी हिरणी ने पी लिया। उस हिरणी के गर्भ से एक बालक का जन्म हुआ, जिसके माथे पर एक छोटा सा सींग था। इसी कारण बालक का नाम ऋष्यशृंग पड़ा।
महर्षि विभाण्डक ने अपने पुत्र को वन के अत्यंत निर्जन क्षेत्र में पाल-पोसकर बड़ा किया। उन्होंने उसे स्त्रियों और बाहरी संसार से पूरी तरह दूर रखा। ऋष्यशृंग के लिए उनका पिता ही उनका संसार था, और उन्होंने कभी भी किसी अन्य मनुष्य, विशेषकर स्त्री को नहीं देखा था। इस कारण उनका अंतःकरण अत्यंत शुद्ध और तपोमय हो गया था।
2. अंग देश की अनावृष्टि और ऋष्यशृंग का आगमन
उस समय अंग देश (आधुनिक बिहार/बंगाल क्षेत्र) के राजा रोमपाद (Lomapada) के राज्य में भीषण अकाल पड़ा। कई वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। ज्योतिषियों ने बताया कि यदि कोई पूर्ण ब्रह्मचारी ऋषि, जिसने कभी स्त्री का मुख न देखा हो, राज्य में कदम रखेगा, तभी वर्षा होगी।
राजा ने चतुर वारांगनाओं (गणिकाओं) को विभाण्डक के आश्रम भेजा। उन स्त्रियों ने अपनी कला से ऋष्यशृंग को आकर्षित किया और उन्हें नाव के माध्यम से अंग देश ले आईं। जैसे ही ऋष्यशृंग ने अंग देश की धरती पर पैर रखा, आकाश से मूसलाधार वर्षा होने लगी और प्रजा को कष्टों से मुक्ति मिली।
3. देवी शांता के साथ विवाह
ऋष्यशृंग के चमत्कार से प्रसन्न होकर राजा रोमपाद ने अपनी दत्तक पुत्री शांता (Princess Shanta) का विवाह उनसे कर दिया। शांता वास्तव में अयोध्या के राजा दशरथ की पुत्री थीं, जिन्हें उन्होंने अपने मित्र रोमपाद को गोद दे दिया था। ऋष्यशृंग और शांता का विवाह ज्ञान और मर्यादा का संगम माना जाता है।
4. राजा दशरथ का पुत्रकामेष्टि यज्ञ
अयोध्या के राजा दशरथ संतानहीन थे। उनके मंत्री सुमंत ने उन्हें सलाह दी कि महर्षि ऋष्यशृंग ही वह एकमात्र ऋषि हैं जो संतान प्राप्ति के लिए 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' (Putrakameshti Yajna) संपन्न करा सकते हैं।
ऋष्यशृंग के आचार्यत्व में यज्ञ संपन्न हुआ। यज्ञ कुण्ड से एक दिव्य पुरुष (प्रजापति) प्रकट हुए और उन्होंने खीर (पायस) का पात्र दशरथ को दिया। इसे तीनों रानियों—कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा—ने ग्रहण किया, जिससे भगवान श्री राम और उनके भाइयों का जन्म हुआ।
5. निष्कर्ष
महर्षि ऋष्यशृंग का चरित्र हमें सिखाता है कि शुद्ध मन और निष्काम तपस्या में कितनी शक्ति होती है। वे एक ऐसे ऋषि थे जिन्होंने अपनी पवित्रता से अकाल को समाप्त किया और भगवान के अवतार का माध्यम बने। आज भी श्रृंगेरी (कर्नाटक) और अन्य स्थानों पर उनके नाम से जुड़े मंदिर और आश्रम उनकी महिमा का गुणगान करते हैं।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- वाल्मीकि रामायण (बाल काण्ड - सर्ग 8 से 16)।
- महाभारत (वन पर्व - ऋष्यशृंग उपाख्यान)।
- श्रीमद्भागवत पुराण (नवम स्कन्ध)।
- अध्यात्म रामायण।
