महर्षि नचिकेता: मृत्यु से संवाद करने वाले प्रखर जिज्ञासु
शोधपरक और दार्शनिक आलेख (The Seeker of Immortality & Katha Upanishad)
भारतीय उपनिषदिक परंपरा में नचिकेता (Nachiketa) का नाम सत्य की खोज और प्रखर वैराग्य के लिए सबसे ऊपर लिया जाता है। उनका प्रसंग मुख्यतः कठोपनिषद (Katha Upanishad) में आता है। नचिकेता एक छोटे बालक थे, किन्तु उनके भीतर का विवेक किसी वृद्ध तपस्वी जैसा था। उन्होंने न केवल मृत्यु के देवता यमराज को शास्त्रार्थ के लिए विवश किया, बल्कि उनसे वह रहस्य जाना जिसे जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता।
| पिता | महर्षि वाजश्रवस (Uddalaka/Vajashravas) |
| मुख्य ग्रंथ | कठोपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद की शाखा) |
| गुरु | यमराज (मृत्यु के देवता) |
| वरदानों की संख्या | तीन (3) |
| विशेष दर्शन | आत्मा की अमरता और श्रेय-प्रेय विवेक |
1. यमराज के द्वार पर: तीन रात्रि की प्रतीक्षा
कथा के अनुसार, नचिकेता के पिता वाजश्रवस ने 'विश्वजित' यज्ञ किया और ब्राह्मणों को बूढ़ी व अनुपयोगी गायें दान देने लगे। नचिकेता को यह अधर्म लगा। उन्होंने पिता से पूछा— "पिताजी! आप मुझे किसे दान करेंगे?" क्रोध में पिता ने कह दिया— "मैं तुझे मृत्यु (यमराज) को देता हूँ।" पिता के वचनों को सत्य करने के लिए नचिकेता साक्षात् यमलोक पहुँच गए।
यमराज वहां नहीं थे। नचिकेता ने यमराज के द्वार पर बिना अन्न-जल के तीन रात्रियों तक प्रतीक्षा की। जब यमराज लौटे, तो एक ब्राह्मण बालक को भूखा-प्यासा देखकर द्रवित हो उठे और उन्होंने प्रायश्चित के रूप में नचिकेता को तीन वर मांगने को कहा।
2. तीन वरदान: आत्मज्ञान की याचना
नचिकेता ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए निम्नलिखित तीन वर मांगे:
- प्रथम वर: पिता की शांति। (जब वे घर लौटें, तो उनके पिता का क्रोध शांत हो जाए)।
- द्वितीय वर: स्वर्ग की अग्नि का ज्ञान। (ऐसी विद्या जिससे मनुष्य स्वर्ग प्राप्त कर सके, जिसे 'नचिकेता अग्नि' कहा गया)।
- तृतीय वर: मृत्यु का रहस्य। नचिकेता ने पूछा— "मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है? कोई कहते हैं वह रहती है, कोई कहते हैं नहीं।"
यमराज ने नचिकेता को सांसारिक प्रलोभन (धन, लंबी आयु, अप्सराएं) दिए ताकि वे तीसरा वर छोड़ दें, किन्तु नचिकेता अडिग रहे। अंततः यमराज ने उन्हें 'आत्मज्ञान' का उपदेश दिया।
3. रथ का रूपक: जीवन जीने की कला
यमराज ने नचिकेता को शरीर और आत्मा का सम्बन्ध समझाने के लिए 'रथ' का प्रसिद्ध रूपक दिया:
- आत्मा: रथ का स्वामी (यात्री)।
- शरीर: रथ।
- बुद्धि: सारथी।
- मन: लगाम।
- इंद्रियाँ: घोड़े।
- विषय: मार्ग।
जिसकी बुद्धि (सारथी) जागरूक होती है और जो मन (लगाम) को वश में रखता है, वही परम पद को प्राप्त करता है।
4. निष्कर्ष
नचिकेता का चरित्र हमें सिखाता है कि सत्य की खोज के लिए आयु मायने नहीं रखती, बल्कि जिज्ञासा और वैराग्य महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने यमराज से यह महान सत्य जाना कि 'आत्मा' न जन्म लेती है और न मरती है (न जायते म्रियते वा कदाचिन्)। आज भी नचिकेता हर उस साधक के लिए प्रेरणा हैं जो संसार के 'प्रेय' (सुख) को छोड़कर 'श्रेय' (कल्याण) के मार्ग पर चलना चाहता है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- कठोपनिषद (यजुर्वेद की कठ शाखा)।
- तैत्तिरीय ब्राह्मण (3.1.8)।
- महाभारत (अनुशासन पर्व)।
- भारतीय दर्शन का इतिहास - डॉ. राधाकृष्णन।
