महर्षि पंचशिख: सांख्य दर्शन के महान आचार्य और सांख्य-सूत्रों के व्याख्याता
एक विस्तृत शोधपरक और दार्शनिक आलेख (Samkhya Philosophy & The Tradition of Kapila)
भारतीय दर्शन के षड्दर्शनों में सांख्य दर्शन सबसे प्राचीन और तार्किक माना जाता है। इस परंपरा में महर्षि पंचशिख (Maharishi Panchashikha) का स्थान अत्यंत गौरवशाली है। वे सांख्य के प्रवर्तक महर्षि कपिल के शिष्य 'आसुरि' के शिष्य थे। महाभारत और सांख्यकारिका के अनुसार, पंचशिख ने ही सांख्य दर्शन को वह स्वरूप प्रदान किया जिससे वह जनसामान्य और राजाओं के बीच लोकप्रिय हुआ। उन्हें सांख्य का 'प्रथम व्यवस्थित आचार्य' भी कहा जाता है।
| परंपरागत स्थान | सांख्य दर्शन के तृतीय आचार्य |
| गुरु | महर्षि आसुरि (Asuri) |
| परम गुरु | आदि विद्वान् महर्षि कपिल |
| मुख्य ग्रंथ | पंचशिख-सूत्र (अब केवल उद्धरणों में उपलब्ध) |
| प्रमुख प्रसंग | राजा जनक को ब्रह्मविद्या का उपदेश |
| दार्शनिक पहचान | प्रकृति-पुरुष विवेक के प्रणेता |
1. गुरु-शिष्य परंपरा: कपिल से पंचशिख तक
सांख्य दर्शन की वंशावली भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे स्पष्ट कड़ियों में से एक है। सांख्यकारिका में ईश्वरकृष्ण लिखते हैं:
आसुरिरपि पञ्चशिखाय तेन च बहुधा कृतं तन्त्रम्॥" अर्थ: मुनि कपिल ने कृपापूर्वक यह परम पवित्र ज्ञान आसुरि को दिया, आसुरि ने इसे पंचशिख को दिया और पंचशिख ने इस शास्त्र (तन्त्र) का विस्तार किया।
महर्षि कपिल ने सांख्य को जन्म दिया, आसुरि ने उसे सुरक्षित रखा, लेकिन पंचशिख ने उसे 'बहुधा कृतं तन्त्रम्' अर्थात अत्यंत विस्तार और वैज्ञानिक ढंग से समाज के सामने रखा।
2. राजा जनक और पंचशिख: शांति पर्व का संवाद
महाभारत के शांति पर्व (अध्याय 218-219) में पंचशिख और मिथिला के राजा जनक के संवाद का अद्भुत वर्णन है। उस समय राजा जनक अनेक गुरुओं के अलग-अलग उपदेशों से भ्रमित हो गए थे।
- मोह का नाश: पंचशिख ने जनक को समझाया कि यह शरीर और इन्द्रियाँ 'आत्मा' नहीं हैं। यह सब 'प्रकृति' का विकार है।
- ब्रह्मचर्य और तप: पंचशिख के उपदेशों से प्रभावित होकर जनक ने सांख्य मार्ग को अपनाया और 'विदेह' (देह से मुक्त) की अवस्था प्राप्त की।
- उपाधि: पंचशिख को उनके पांच शिखाओं (Crests/Tufts) या पांच ज्ञान के अंगों के कारण 'पंचशिख' कहा जाता था।
3. दार्शनिक योगदान: सांख्य के सिद्धांत
यद्यपि पंचशिख के मूल सूत्र आज पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं हैं, किन्तु व्यास के **'योगसूत्र-भाष्य'** में उनके कई सूत्रों को उद्धृत किया गया है। उनके दर्शन की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
- पुरुष की नित्यता: उन्होंने सिद्ध किया कि भोक्ता (Purusha) शाश्वत है और दृश्य (Prakriti) परिवर्तनशील है।
- दुःख निवृत्ति: सांख्य का लक्ष्य त्रिविध दुखों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) का आत्यंतिक विनाश है।
- चित्त और आत्मा: उन्होंने स्पष्ट किया कि चित्त (Mind) जड़ है और वह केवल आत्मा के प्रकाश से चैतन्य दिखाई देता है।
4. निष्कर्ष
महर्षि पंचशिख भारतीय दर्शन के वह सेतु हैं जिन्होंने कपिल मुनि के अत्यंत सूक्ष्म सिद्धांतों को व्यावहारिक धरातल पर उतारा। सांख्य और योग के समन्वय में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने न केवल संन्यासियों को बल्कि गृहस्थ राजाओं (जैसे जनक) को भी मोक्ष का मार्ग दिखाया। आज भी सांख्य दर्शन का कोई भी अध्ययन पंचशिख के योगदान के बिना अधूरा है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- महाभारत (शांति पर्व - मोक्षधर्म पर्व)।
- सांख्यकारिका - ईश्वरकृष्ण (कारिका 70)।
- योगसूत्र व्यास-भाष्य (महर्षि पंचशिख के सूत्रों के उदाहरण हेतु)।
- भारतीय दर्शन का इतिहास - डॉ. राधाकृष्णन।
