महर्षि सुमंत (Maharishi Sumanta)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि सुमन्त: अथर्ववेद के प्रथम आचार्य और व्यास के महान शिष्य

महर्षि सुमन्त: अथर्ववेद के प्रथम व्याख्याता और व्यास के प्रमुख शिष्य

(Vedic Scholar & Disciple of Vyasa)

"पैलो ऋग्वेदवाहकः वैशम्पायन एव च।
जैमिनिः सामवेदज्ञः सुमन्तुश्चाथर्वविद् मुनिः॥"
अर्थ: महर्षि पैल ऋग्वेद के, वैशम्पायन यजुर्वेद के, जैमिनि सामवेद के और सुमन्त मुनि अथर्ववेद के ज्ञाता और प्रचारक हुए।

भारतीय वैदिक इतिहास में महर्षि सुमन्त (Maharishi Sumanta) का नाम उन चार महान ऋषियों में आता है, जिन्होंने महर्षि वेदव्यास से ज्ञान प्राप्त कर वेदों को सुरक्षित रखा। जब भगवान वेदव्यास ने वेदों का विभाजन चार भागों में किया, तब उन्होंने सबसे कठिन और गूढ़ 'अथर्ववेद' (Atharvaveda) का सम्पूर्ण भार महर्षि सुमन्त को सौंपा। वे न केवल एक मंत्रद्रष्टा ऋषि थे, बल्कि उन्होंने अथर्ववेद की अनेक शाखाओं को जन्म देकर ज्ञान की धारा को जन-जन तक पहुँचाया।

📌 महर्षि सुमन्त: एक दृष्टि में
गुरु भगवान कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास
समर्पित वेद अथर्ववेद (Atharvaveda)
वंश / कुल जैमिनि कुल (कुछ ग्रंथों के अनुसार जैमिनि के पुत्र)
प्रमुख शिष्य कबन्ध ऋषि
विशेषता अथर्ववेद के आदि आचार्य
ग्रंथ योगदान अथर्ववेद की शाखाओं का संकलन, सुमन्त स्मृति
⏳ काल निर्धारण एवं गुरु-परंपरा
युग
द्वापर युग का अंतमहाभारत काल के समकालीन और कलयुग के प्रारंभ के साक्षी।
वैदिक विभाजन काल
व्यास कालजब एक ही वेद को चार अलग-अलग संहिताओं में विभाजित किया गया।

1. अथर्ववेद का उत्तरदायित्व: सुमन्त ऋषि की भूमिका

पुराणों के अनुसार, भगवान व्यास ने जब देखा कि कलयुग में मनुष्यों की बुद्धि और आयु कम हो जाएगी, तो उन्होंने वेदों का विभाजन किया। उन्होंने अपने चार शिष्यों को चार वेदों की शिक्षा दी।

  • अथर्ववेद का भार: महर्षि सुमन्त को अथर्ववेद का अधिष्ठाता बनाया गया। अथर्ववेद में शांति, पुष्टि, अभिचार (सुरक्षा) और औषधि विज्ञान के मंत्र संकलित हैं।
  • ज्ञान का विस्तार: सुमन्त मुनि ने अथर्ववेद को अपने शिष्यों को पढ़ाया, जिन्होंने आगे चलकर इसकी कई शाखाएं (जैसे शौनक, पैप्पलाद आदि) विकसित कीं।
  • ब्रह्मत्व: अथर्ववेद को 'ब्रह्मवेद' भी कहा जाता है और इसका ज्ञाता 'ब्रह्मा' कहलाता है। सुमन्त मुनि इसी उच्च श्रेणी के विद्वान थे।

2. वंश और उत्तराधिकारी: ज्ञान की निरंतरता

महर्षि सुमन्त की वंशावली के विषय में पुराणों में मतभेद मिलते हैं, लेकिन अधिकांश ग्रंथों के अनुसार वे महर्षि जैमिनि (सामवेद के आचार्य) के पुत्र थे। इस प्रकार उनके परिवार में ही वेदों का गहरा ज्ञान प्रवाहित था।

सुमन्त ऋषि ने अपना ज्ञान अपने पुत्र कबन्ध को दिया। कबन्ध ने आगे चलकर इस ज्ञान को दो भागों में बांटा और अपने शिष्यों—'पथ्य' और 'वेददर्श' को प्रदान किया। इस प्रकार महर्षि सुमन्त द्वारा प्रज्ज्वलित ज्ञान की ज्योति सदियों तक भारत के गुरुकुलों में जलती रही।

साहित्यिक योगदान: सुमन्त स्मृति

वैदिक संहिताओं के अलावा, महर्षि सुमन्त के नाम से 'सुमन्त स्मृति' भी प्रसिद्ध है। यद्यपि आज इसके कुछ ही अंश उपलब्ध हैं, लेकिन प्राचीन स्मृतिकारों (जैसे हेमाद्रि और निर्णयसिंधु) ने इनके वचनों को अत्यंत प्रमाणिक मानकर उद्धृत किया है। इसमें मुख्य रूप से सामाजिक मर्यादाओं और व्यक्तिगत शुचिता के नियम बताए गए हैं।

3. निष्कर्ष

महर्षि सुमन्त का जीवन हमें "ज्ञान के प्रति पूर्ण समर्पण" की शिक्षा देता है। जहाँ एक ओर वेदों का विभाजन एक कठिन कार्य था, वहीं अथर्ववेद जैसे जटिल विषय को व्यवस्थित करना सुमन्त ऋषि की मेधा का ही प्रमाण है। आज जब हम अथर्ववेद के औषधीय और आध्यात्मिक मंत्रों का पाठ करते हैं, तो हमें उन महान ऋषि सुमन्त का स्मरण अवश्य करना चाहिए जिन्होंने कलयुग के मनुष्यों के कल्याण के लिए इस धरोहर को सुरक्षित रखा।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • श्रीमद्भागवत महापुराण (द्वादश स्कन्ध - वेद शाखा विभाजन प्रसंग)।
  • विष्णु पुराण (तृतीय अंश)।
  • वायु पुराण (वेद व्यास शिष्य परंपरा)।
  • अथर्ववेद संहिता - भूमिका।

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