महर्षि त्रिलोचन (Maharishi Trilochan)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि त्रिलोचन: भगवान शिव के प्रदीप्त स्वरूप और शैव दर्शन के महान आचार्य

महर्षि त्रिलोचन: भगवान शिव के योगावतार और ज्ञान के प्रदीप्त पुंज

एक शोधपरक आलेख: शैव परंपरा और 'त्रिनेत्र' विद्या का आध्यात्मिक विश्लेषण (The Shaivite Sage & Incarnation of Shiva)

भारतीय ऋषि परंपरा और शैव दर्शन में महर्षि त्रिलोचन (Maharishi Trilochan) का नाम अत्यंत श्रद्धा के साथ लिया जाता है। 'त्रिलोचन' का शाब्दिक अर्थ है 'तीन आँखों वाला'। जहाँ यह नाम साक्षात् भगवान शिव का पर्यायवाची है, वहीं पुराणों में शिव के उन विशिष्ट अवतारों या शिष्यों का भी वर्णन मिलता है जिन्होंने 'त्रिनेत्र' (ज्ञान चक्षु) की सिद्धि प्राप्त की थी। महर्षि त्रिलोचन को पाशुपत मत और शैव योग की उस प्राचीन कड़ी के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने मनुष्यों को संसार की नश्वरता और आत्मा की नित्यता का बोध कराया।

📌 महर्षि त्रिलोचन: एक दृष्टि में
मूल स्वरूप भगवान शिव के अंशावतार / शैव आचार्य
दर्शन शैव दर्शन, पाशुपत मत (Pashupata Yoga)
प्रतीक त्रिनेत्र (तीसरी आँख) - ज्ञान का प्रतीक
प्रमुख क्षेत्र वाराणसी एवं हिमालय क्षेत्र
ग्रंथ उल्लेख शिव पुराण, लिंग पुराण, कूर्म पुराण
विशेष सिद्धि भूत, भविष्य और वर्तमान का दर्शन (त्रिकालज्ञ)
⏳ काल निर्धारण एवं युग
युग
द्वापर युग (विभिन्न कल्पों में)भगवान शिव के 28 योगावतारों की श्रृंखला में इनका प्राकट्य विभिन्न समय पर माना जाता है।
सांप्रदायिक स्थान
आदि शैव परंपरालकुलीश परंपरा से पूर्व के प्रभावी शैव आचार्यों में से एक।

1. शिव के योगावतारों से संबंध

पुराणों के अनुसार, भगवान शिव प्रत्येक द्वापर युग में योग की शिक्षा देने के लिए अवतार लेते हैं। महर्षि त्रिलोचन को अक्सर इन **योगावतारों** के साथ जोड़ा जाता है।

कहा जाता है कि जब भगवान शिव ने 'शूलिन' या 'त्रिशूली' के रूप में अवतार लिया, तब उनके तेज से महर्षि त्रिलोचन का स्वरूप प्रकट हुआ। उन्होंने हिमालय की कंदराओं में हज़ारों वर्षों तक तपस्या की और 'पाशुपत योग' के उन गुप्त रहस्यों को सिद्ध किया, जो जीव को 'पशुत्व' (अज्ञान) के बंधनों से मुक्त कर 'पशुपति' (ईश्वर) के समीप ले जाते हैं।

2. दार्शनिक संदेश: 'तीसरी आँख' का वास्तविक अर्थ

महर्षि त्रिलोचन के जीवन और नाम का सबसे बड़ा उपदेश 'त्रिनेत्र' की महिमा है। उनके अनुसार, मनुष्य की दो आँखें केवल दृश्य जगत (Physical World) को देखती हैं, जो परिवर्तनशील और मिथ्या है।

"ज्ञानचक्षुस्तृतीयं वै सर्वभूतहिते रतः।" अर्थ: ज्ञान की तीसरी आँख वही है, जो समस्त प्राणियों के हित में लगी हो और सत्य का दर्शन कराए।
  • विवेक की जागृति: त्रिलोचन ऋषि ने सिखाया कि तीसरी आँख मांस-मज्जा की कोई आँख नहीं, बल्कि 'विवेक' (Discrimination) की जागृति है।
  • त्रिकाल दर्शन: उनके पास वह सिद्धि थी जिससे वे समय की सीमाओं को पार कर भूत और भविष्य को वर्तमान की भांति देख सकते थे।
  • वैराग्य: उन्होंने वाराणसी (काशी) में 'त्रिलोचन महादेव' के रूप में भी पूजा प्राप्त की है, जहाँ वे भक्तों के अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करते हैं।

3. निष्कर्ष

महर्षि त्रिलोचन का व्यक्तित्व हमें बाह्य दृष्टि के बजाय 'आंतरिक दृष्टि' विकसित करने की प्रेरणा देता है। वे शैव मार्ग के वह प्रकाश स्तंभ हैं जिन्होंने तर्कों और योगिक क्रियाओं के माध्यम से यह सिद्ध किया कि शिव तत्व कहीं बाहर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर जागृत होने वाली चेतना है। आज भी जो साधक 'आज्ञा चक्र' (Third Eye Center) पर ध्यान करते हैं, वे महर्षि त्रिलोचन की ऊर्जा का स्मरण कर अपनी आध्यात्मिक यात्रा को सफल बनाते हैं।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • शिव पुराण (शतरुद्र संहिता - अवतार वर्णन)।
  • लिंग पुराण (शैव योगावतार प्रसंग)।
  • स्कन्द पुराण (काशी खंड - त्रिलोचन महादेव महिमा)।
  • भारतीय दर्शन - डॉ. एस.एन. दासगुप्ता।

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