नारायण भट्ट: भाट्ट-मीमांसा के पुनरुद्धारक, 'मानमेयोदय' के रचयिता और भारतीय प्रमाण-शास्त्र के शिखर
एक गहन दार्शनिक विश्लेषण (A Scholarly Treatise on Narayan Bhatt and Bhatta Mimamsa Logic)
- 1. प्रस्तावना: मीमांसा दर्शन का उत्तर-मध्यकालीन सूर्य
- 2. जीवन परिचय: केरल की विद्वत् परंपरा और 'मानमेयोदय' का काल
- 3. 'मानमेयोदय': भारतीय तर्कशास्त्र का विश्वकोश
- 4. प्रमाण-मीमांसा: ज्ञान के छह द्वार (तार्किक विश्लेषण)
- 5. अर्थापत्ति: विरोधाभास का समाधान (Unique Contribution)
- 6. अनुपलब्धि: अभाव को जानने का तर्क
- 7. स्वतः प्रामाण्यवाद: ज्ञान की स्वायत्तता
- 8. प्रभाव और निष्कर्ष
भारतीय दर्शन में 'मीमांसा' (Mimamsa) केवल कर्मकांड का शास्त्र नहीं है, बल्कि यह भाषा-विश्लेषण (Linguistics) और ज्ञानमीमांसा (Epistemology) का सबसे समृद्ध भंडार है। 16वीं-17वीं शताब्दी में जब न्याय-दर्शन (Navya-Nyaya) अपने चरम पर था, तब नारायण भट्ट ने मीमांसा दर्शन की तार्किक रक्षा की।
वे कुमारिल भट्ट की परंपरा (भाट्ट संप्रदाय) के अनुयायी थे। उन्होंने 'मानमेयोदय' (Manameyodaya) नामक ग्रंथ की रचना की, जो आज भी विश्वविद्यालयों और पारंपरिक गुरुकुलों में मीमांसा दर्शन को समझने का सबसे सरल और प्रामाणिक द्वार (Gateway) माना जाता है। उन्होंने नैयायिकों के 'ईश्वर-तर्क' और बौद्धों के 'शून्यवाद' का खंडन करते हुए 'वेद-प्रामाण्य' की स्थापना की।
| पूरा नाम | नारायण भट्ट (Narayan Bhatt) |
| काल | 16वीं शताब्दी का उत्तरार्ध – 17वीं का पूर्वार्ध |
| स्थान | केरल (संभवतः 'पय्यूर' या 'मेल्पत्तूर' परिवार से संबंधित) |
| संप्रदाय | भाट्ट मीमांसा (Follower of Kumarila Bhatta) |
| प्रमुख ग्रंथ | मानमेयोदय (Manameyodaya - भाग 1: मान/प्रमाण खंड) |
| संरक्षक राजा | मानवेद (कालीकट के जमोरिन राजा) |
| मुख्य योगदान | अर्थापत्ति और अनुपलब्धि प्रमाण का वैज्ञानिक विश्लेषण |
2. जीवन परिचय: केरल की विद्वत् परंपरा और 'मानमेयोदय' का काल
नारायण भट्ट का जन्म केरल के एक अत्यंत प्रतिष्ठित नम्बूदिरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। विद्वानों का मत है कि वे प्रसिद्ध कवि और व्याकरणविद नारायण भट्टतिरि (नारायणीयम के रचयिता) के समकालीन और सखा थे। कुछ विद्वान उन्हें एक ही मानते हैं, परंतु दार्शनिक शैली में अंतर होने के कारण उन्हें अलग माना जाना अधिक तर्कसंगत है।
वे कोझिकोड (Calicut) के राजा मानवेद (Manaveda) के सभा-पंडित थे। राजा मानवेद स्वयं एक विद्वान थे और उनके नाम पर ही इस ग्रंथ का नाम 'मान-मेय-उदय' (राजा मानवेद की उन्नति या 'मान' और 'मेय' का उदय) रखा गया।
3. 'मानमेयोदय': भारतीय तर्कशास्त्र का विश्वकोश
'मानमेयोदय' दो शब्दों से बना है:
1. मान (Mana): प्रमाण (Means of Knowledge) - तर्कशास्त्र।
2. मेय (Meya): प्रमेय (Objects of Knowledge) - तत्वमीमांसा।
नारायण भट्ट ने इसके पहले भाग (मान-परिच्छेद) की रचना की, जो तर्कशास्त्र पर केंद्रित है। इसमें उन्होंने कुमारिल भट्ट के 'श्लोकवार्तिक' के कठिन तर्कों को अत्यंत सरल और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया। यह ग्रंथ मीमांसा का 'प्रकरण-ग्रंथ' (Manual) है।
मानमेयोदयाख्यं तु प्रकरणम् अतीव हि॥" अर्थ: मैं (नारायण भट्ट) मीमांसा शास्त्र के समस्त सार को एकत्रित करके 'मानमेयोदय' नामक इस अत्यंत महत्वपूर्ण प्रकरण ग्रंथ की रचना कर रहा हूँ।
4. प्रमाण-मीमांसा: ज्ञान के छह द्वार (तार्किक विश्लेषण)
न्याय दर्शन केवल 4 प्रमाण मानता है (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द)। लेकिन नारायण भट्ट ने मीमांसा के 6 प्रमाणों की तार्किक आवश्यकता सिद्ध की। उन्होंने तर्क दिया कि जगत को पूरी तरह समझने के लिए 4 प्रमाण अपर्याप्त हैं।
- 1. प्रत्यक्ष (Perception): इन्द्रियों से होने वाला ज्ञान।
- 2. अनुमान (Inference): व्याप्ति (धुआँ-आग संबंध) के आधार पर ज्ञान।
- 3. शब्द (Verbal Testimony): वेदों का अपौरुषेय ज्ञान।
- 4. उपमान (Comparison): सादृश्य (Similarity) के आधार पर ज्ञान (नीलगाय गाय जैसी होती है)।
- 5. अर्थापत्ति (Postulation): विरोधाभास को मिटाने के लिए कल्पना।
- 6. अनुपलब्धि (Non-perception): अभाव (Absence) को जानने का साधन।
5. अर्थापत्ति: विरोधाभास का समाधान (Unique Contribution)
नारायण भट्ट की तर्कशक्ति का सबसे उत्कृष्ट प्रदर्शन 'अर्थापत्ति' (Arthapatti) की व्याख्या में मिलता है। नैयायिक इसे 'अनुमान' (Inference) में शामिल करना चाहते थे, लेकिन नारायण भट्ट ने इसे स्वतंत्र प्रमाण सिद्ध किया।
पीन-देवदत्त का तर्क (The Logic of Fat Devadatta)
समस्या: हम देखते हैं कि देवदत्त बहुत मोटा (पीन) है। लेकिन हम यह भी निश्चित रूप से जानते हैं कि वह "दिन में भोजन नहीं करता"।
विरोध: 'मोटापा' और 'भोजन न करना' - इन दो तथ्यों में विरोध (Conflict) है। बिना भोजन के मोटापा संभव नहीं।
समाधान (अर्थापत्ति): इस विरोध को शांत करने के लिए हम एक नई बात की कल्पना (Postulation) करते हैं—"वह रात में भोजन करता है।"
6. अनुपलब्धि: अभाव को जानने का तर्क
नारायण भट्ट ने प्रश्न उठाया: "हम यह कैसे जानते हैं कि 'फर्श पर घड़ा नहीं है'?"
\27A4 क्या आँखों ने 'नहीं' को देखा? नहीं, आँखें केवल 'है' (Positive) को देख सकती हैं।
\27A4 क्या हमने अनुमान लगाया? नहीं, क्योंकि यहाँ कोई धुआँ जैसा चिह्न नहीं है।
नारायण भट्ट ने सिद्ध किया कि 'अभाव' (Absence) को जानने के लिए एक अलग प्रमाण की आवश्यकता है, जिसे 'अनुपलब्धि' (Non-apprehension) कहते हैं।
तर्क: "यदि यहाँ घड़ा होता, तो दिखाई देता (दृश्यमान होता)। चूँकि वह दिखाई नहीं दे रहा है (योग्यानुपलब्धि), अतः वह नहीं है।"
7. स्वतः प्रामाण्यवाद: ज्ञान की स्वायत्तता
नारायण भट्ट और मीमांसा का सबसे क्रांतिकारी सिद्धांत है—'स्वतः प्रामाण्यवाद' (Theory of Intrinsic Validity)।
न्याय मत: ज्ञान सही है या गलत, यह बाद में परीक्षा (गुणादि) से पता चलता है (परतः प्रामाण्य)।
नारायण भट्ट का मत: ज्ञान अपने जन्म के साथ ही 'सत्य' (Valid) होता है। हमें उस पर शक करने के लिए 'दोष' (Defect) ढूँढना पड़ता है।
\27A4 "हम पानी देखकर उसे पानी ही मानते हैं (स्वतः प्रमाण)। यदि बाद में पता चले कि वह मृगमरीचिका है, तो वह ज्ञान रद्द (Invalid) होता है।"
यह सिद्धांत विज्ञान के 'Falsifiability' (कार्ल पॉपर) सिद्धांत के करीब है—ज्ञान तब तक सत्य है जब तक उसे गलत सिद्ध न कर दिया जाए।
8. प्रभाव और निष्कर्ष
नारायण भट्ट का 'मानमेयोदय' मीमांसा दर्शन का दीपक है। उन्होंने तर्कशास्त्र को वेदों की रक्षा का हथियार बनाया। उन्होंने सिद्ध किया कि तर्क (Logic) केवल नैयायिकों की जागीर नहीं है।
आज जब हम 'Presumption' (अर्थापत्ति) या 'Absence' (अभाव) की दार्शनिक चर्चा करते हैं, तो हम अनजाने में नारायण भट्ट के तर्कों का ही उपयोग कर रहे होते हैं। उनका दर्शन हमें सिखाता है कि जो 'दिखाई नहीं देता' (जैसे अभाव), उसे जानने के लिए भी एक विशेष दृष्टि की आवश्यकता होती है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- मानमेयोदय (Manameyodaya) - (English Translation by C. Kunhan Raja & S.S. Suryanarayana Sastri, Adyar Library).
- Bhatta Mimamsa Logic and Metaphysics.
- History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta (Vol 1 - Mimamsa Section).
- श्लोकवार्तिक - कुमारिल भट्ट (जिस पर मानमेयोदय आधारित है)।
