राजर्षि जनक: विदेहराज, ब्रह्मज्ञानी और कर्मयोग के महान आदर्श
आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विश्लेषण (The Philosopher King & Father of Janaki)
भारतीय वाङ्मय में महाराज जनक (King Janaka) का नाम एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में अंकित है जो एक साथ राजा भी थे और ऋषि भी, इसीलिए उन्हें 'राजर्षि' कहा गया। वे मिथिला के राजा थे और उनका कुल 'निमि' वंश कहलाता था। जनक को 'विदेह' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है—वह जिसे अपने 'देह' (शरीर) का भान न हो और जो सदैव आत्म-चेतना में स्थित रहे। वे न केवल रामायण के एक महत्वपूर्ण पात्र हैं, बल्कि उपनिषदों के गंभीर दार्शनिक संवादों के केंद्र भी हैं।
| पूरा नाम | सीरध्वज जनक (Seeradhwaja Janaka) |
| वंश | निमि वंश (मिथिला के जनक राजवंश) |
| पत्नी | सुनयना |
| पुत्रियाँ | सीता (जानकी) और उर्मिला |
| गुरु / दार्शनिक मार्गदर्शक | महर्षि याज्ञवल्क्य, अष्टावक्र |
| मुख्य ग्रंथ संदर्भ | रामायण, अष्टावक्र गीता, बृहदारण्यक उपनिषद |
1. ब्रह्मज्ञान: अष्टावक्र और याज्ञवल्क्य का सान्निध्य
राजा जनक के दरबार में भारत के श्रेष्ठतम विद्वान और ऋषि एकत्र होते थे। वे ज्ञान के इतने बड़े पिपासु थे कि स्वयं राजा होते हुए भी ऋषियों के चरणों में बैठकर शिक्षा लेते थे।
- अष्टावक्र गीता: जब बालक अष्टावक्र जनक के दरबार में पहुँचे, तो उन्होंने राजा को वह ज्ञान दिया जिससे राजा को तुरंत आत्म-साक्षात्कार हुआ। 'अष्टावक्र गीता' आज भी अद्वैत वेदांत का सबसे गंभीर ग्रंथ माना जाता है।
- याज्ञवल्क्य संवाद: बृहदारण्यक उपनिषद में महर्षि याज्ञवल्क्य और जनक के बीच आत्मा और ब्रह्म पर गूढ़ चर्चाएं मिलती हैं। जनक ने याज्ञवल्क्य को हज़ारों स्वर्ण-जड़ित गाएं दान में दी थीं।
2. सीता का प्राकट्य: हल चलाते राजा
रामायण की कथा के अनुसार, जब मिथिला में अकाल पड़ा, तो ऋषियों की सलाह पर महाराज जनक ने स्वयं स्वर्ण का हल चलाया।
हल चलाते समय भूमि से एक सुंदर कन्या प्रकट हुई, जिसका नाम 'सीता' (हल के अग्रभाग से बनी रेखा) रखा गया। जनक ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। इससे सिद्ध होता है कि जनक एक ऐसे शासक थे जो अपनी प्रजा के कल्याण के लिए कठिन से कठिन शारीरिक श्रम करने में भी गौरव अनुभव करते थे।
3. कर्मयोग: राजमहल में सन्यास
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने जनक का उदाहरण देते हुए 'निष्काम कर्मयोग' को समझाया है। जनक हमें सिखाते हैं कि संसार को छोड़ने का नाम सन्यास नहीं है, बल्कि संसार में रहते हुए भी उससे अनासक्त (Unattached) रहना ही वास्तविक योग है।
"राजा जनक के महल में आग लगने पर भी उन्होंने कहा था—'यदि पूरी मिथिला जल जाए, तो भी मेरा (आत्मा का) कुछ नहीं जलता।' यह उनकी विदेह अवस्था की पराकाष्ठा थी।"
4. निष्कर्ष
राजर्षि जनक का व्यक्तित्व पूर्णता का प्रतीक है। वे एक न्यायप्रिय शासक, स्नेही पिता और सर्वोच्च श्रेणी के ज्ञानी थे। उन्होंने सिद्ध किया कि ऐश्वर्य और अध्यात्म एक साथ रह सकते हैं। आज के युग में जनक का आदर्श हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने सांसारिक कर्तव्यों को निभाते हुए भी आत्म-ज्ञान की ऊंचाइयों को छू सकते हैं। मिथिला की भूमि आज भी उनकी वैचारिक और आध्यात्मिक विरासत से गौरवान्वित है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- वाल्मीकि रामायण (बाल काण्ड)।
- बृहदारण्यक उपनिषद (जनक-याज्ञवल्क्य संवाद)।
- अष्टावक्र गीता (राजा जनक का बोध)।
- श्रीमद्भगवद्गीता (तृतीय अध्याय)।
