सम्राट पुरु (King Puru)

Sooraj Krishna Shastri
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सम्राट पुरु: पितृभक्ति के प्रतीक और पौरव वंश के महान संस्थापक

सम्राट पुरु: महान पौरव वंश के संस्थापक और पितृभक्ति के अद्वितीय आदर्श

पौराणिक और वंशावली आलेख (The Legacy of King Puru & The Paurava Dynasty)

महाभारत और पुराणों की वंशावली में सम्राट पुरु (King Puru) एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाम है। वे राजा ययाति और उनकी दूसरी पत्नी शर्मिष्ठा के सबसे छोटे पुत्र थे। यद्यपि वे आयु में सबसे छोटे थे, किन्तु अपनी आज्ञाकारिता और नैतिकता के कारण उन्होंने वह पद प्राप्त किया जो उनके बड़े भाइयों को न मिल सका। पुरु ही उस पौरव वंश के मूल पुरुष हैं, जिसकी शाखा में आगे चलकर हस्तिनापुर के प्रतापी राजाओं का जन्म हुआ।

📌 सम्राट पुरु: एक दृष्टि में
पिता महाराज ययाति (चंद्रवंशी)
माता शर्मिष्ठा (असुरराज वृषपर्वा की पुत्री)
वंश पौरव वंश (Paurava Dynasty)
भाई यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु
राजधानी प्रतिष्ठानपुर (बाद में हस्तिनापुर क्षेत्र का विस्तार)
प्रसिद्ध वंशज दुष्यंत, भरत, शांतनु, भीम, अर्जुन
⏳ काल निर्धारण एवं युग
युग
त्रेता युग का मध्य कालइक्ष्वाकु वंश के राजाओं के समकालीन, महाभारत से कई पीढ़ियों पूर्व।
वंशावली महत्व
चंद्रवंश की मुख्य शाखायदु वंश के समानांतर चलने वाला सबसे शक्तिशाली साम्राज्य।

1. महान त्याग: पिता को दी अपनी युवावस्था

राजा ययाति को गुरु शुक्राचार्य के शाप से असमय बुढ़ापा प्राप्त हुआ था। ययाति अभी अपनी इच्छाओं से तृप्त नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपने पुत्रों से उनकी युवावस्था मांगनी चाही।

  • भाइयों का इनकार: यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु ने अपने पिता के बुढ़ापे को स्वीकार करने से मना कर दिया क्योंकि वे यौवन के सुखों का त्याग नहीं करना चाहते थे।
  • पुरु का समर्पण: पुरु ने बिना किसी संकोच के कहा— "पिताजी, पुत्र का धर्म है कि वह पिता की सेवा करे। आप मेरी युवावस्था लें और मुझे अपना बुढ़ापा दे दें।"
  • पुरस्कार: हजारों वर्षों तक भोग भोगने के बाद जब ययाति को वैराग्य हुआ, तो उन्होंने पुरु को उनकी युवावस्था लौटा दी और प्रसन्न होकर उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी बनाया, जबकि बड़े भाइयों को सीमावर्ती क्षेत्रों का छोटा शासक बना दिया।

2. पौरव वंश: चंद्रवंश का विस्तार

पुरु के उत्तराधिकार ग्रहण करने के बाद चंद्रवंश की यह शाखा 'पौरव वंश' कहलाई। यह वंश भारतीय इतिहास का सबसे प्रतापी वंश सिद्ध हुआ।

  • दुष्यंत और भरत: पुरु की ही वंश परंपरा में राजा दुष्यंत हुए और उनके पुत्र सम्राट भरत हुए, जिनके नाम पर हमारे देश का नाम 'भारत' पड़ा।
  • कुरु: इसी वंश में आगे चलकर राजा कुरु हुए, जिन्होंने कुरुक्षेत्र को अपनी कर्मस्थली बनाया और जहाँ से 'कौरव' और 'पांडव' निकले।

3. वैदिक संदर्भ: पुरु कबीला

ऋग्वेद में भी **'पुरु'** (Puru) नाम के एक शक्तिशाली कबीले या जनजाति का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद के अनुसार, पुरु लोग सरस्वती नदी के तट पर निवास करते थे। 'दाशराज्ञ युद्ध' (दस राजाओं का युद्ध) में भी पुरुओं की महत्वपूर्ण भूमिका का वर्णन है। यह दर्शाता है कि पुरु केवल पौराणिक कथाओं के पात्र नहीं थे, बल्कि वे एक ऐतिहासिक और शक्तिशाली वैदिक संस्कृति के आधार स्तंभ थे।

4. निष्कर्ष

सम्राट पुरु का चरित्र हमें यह सिखाता है कि ज्येष्ठता केवल आयु से नहीं, बल्कि त्याग और सेवा भाव से तय होती है। उन्होंने अपनी पितृभक्ति से न केवल साम्राज्य पाया, बल्कि एक ऐसे वंश की नींव रखी जिसने हजारों वर्षों तक अखंड भारत पर शासन किया। पौरव वंश की कीर्ति आज भी महाभारत और अन्य धर्मग्रंथों के माध्यम से हमारे सांस्कृतिक मानस में जीवित है।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • महाभारत (आदि पर्व - सम्भव पर्व)।
  • श्रीमद्भागवत पुराण (नवम स्कन्ध)।
  • विष्णु पुराण (चतुर्थ अंश)।
  • ऋग्वेद (पुरु कबीले का संदर्भ)।

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