भक्त का विषाद और कर्म का सिद्धान्त: निषादराज का प्रेम और लक्ष्मण गीता
जय श्रीराम प्रभु भक्तों!
श्रीरामचरितमानस का अयोध्या काण्ड केवल वनवास की कथा नहीं है, बल्कि यह मानव मनोविज्ञान, भक्त और भगवान के बीच के अगाध प्रेम तथा कर्म-सिद्धान्त का एक अत्यंत सूक्ष्म और दार्शनिक ग्रंथ है। जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ श्रृंगवेरपुर पहुँचते हैं और कुशा की शय्या पर शयन करते हैं, तब उस दृश्य को देखकर निषादराज गुह का हृदय विदीर्ण हो जाता है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि दुःख का मूल कारण क्या है, आसक्ति कैसे हमें बाँधती है, और ज्ञान किस प्रकार हमें शोक से मुक्त करता है।
१. निषादराज का विषाद: प्रेम का शोक
तुलसीदास जी लिखते हैं:
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी।
कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥
भयउ विषादु निषादहि भारी।
राम सिय महि सयन निहारी॥
कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥
भयउ विषादु निषादहि भारी।
राम सिय महि सयन निहारी॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
जब निषादराज गुह ने देखा कि जिन श्रीराम के चरणों की धूलि प्राप्त करने के लिए देवता भी लालायित रहते हैं, वे ही आज जनकनन्दिनी सीता जी के साथ धरती (महि) पर शयन कर रहे हैं, तब उनका हृदय करुणा से भर उठा। यह शोक संसार का साधारण शोक नहीं था; यह 'प्रेम का शोक' था। भक्त के लिए भगवान का कष्ट स्वयं उसका कष्ट बन जाता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कैकेयी को "दिनकर कुल बिटप कुठारी" (सूर्यवंश रूपी वृक्ष को काटने वाली कुल्हाड़ी) कहकर एक अद्भुत रूपक प्रस्तुत किया है। सूर्यवंश धर्म, मर्यादा और त्याग का फल-फूल से लदा विशाल वृक्ष है और कैकेयी की 'कुमति' उस वृक्ष पर चलने वाली कुल्हाड़ी बन जाती है। यहाँ दोष किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस 'मोह' का है जो विवेक को ढक देता है। जब बुद्धि पर अविद्या का आवरण पड़ जाता है, तब एक व्यक्ति का निर्णय (जैसे कैकेयी का) समस्त समाज को प्रभावित कर देता है।
२. लक्ष्मण गीता: कर्म सिद्धान्त का उद्घोष
निषादराज को विलाप करते देख, परम ज्ञानी और वैराग्य की मूर्ति लक्ष्मण जी उन्हें जीवन का सनातन सत्य (जिसे लक्ष्मण गीता कहा जाता है) सुनाते हैं:
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।
निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥
निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥
भावार्थ:
"हे भाई! संसार में कोई भी किसी को सुख या दुःख देने वाला नहीं है। प्रत्येक जीव अपने ही (पूर्वजन्म या इस जन्म के) शुभ और अशुभ कर्मों का फल भोगता है।"
यह केवल सांत्वना नहीं, अपितु कर्मसिद्धान्त का महा-उद्घोष है। बाहर दिखाई देने वाले कारण (जैसे कैकेयी या मंथरा) केवल 'निमित्त' (माध्यम) हैं; वास्तविक कारण हमारे अपने संस्कार, कर्म और प्रारब्ध हैं।
३. उपनिषदों में ईश्वर का स्वरूप और शोक-मुक्ति
इसी सत्य को श्वेताश्वतर उपनिषद् और भी गहन रूप में उद्घाटित करता है:
अणोरणीयान् महतो महीयान्
आत्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः॥
आत्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः॥
भावार्थ:
"परमात्मा अणु से भी सूक्ष्म हैं और विराट से भी महान। वे प्रत्येक जीव के हृदय-गुहा में स्थित हैं। जब मनुष्य का अंतःकरण कामना, अहंकार और विकारों से निर्मल हो जाता है (अक्रतुः), तब ईश्वर-कृपा से उसे आत्मस्वरूप का साक्षात्कार होता है और उसी क्षण उसके शोक, मोह तथा भय का अंत हो जाता है (वीतशोको)।"
निषादराज की दृष्टि बाह्य नहीं थी। उन्होंने वनवासी राम में केवल अयोध्या के राजकुमार को नहीं, अपितु हृदय-गुहा में विराजमान उसी परब्रह्म का दर्शन किया। इसीलिए उनका विषाद संसारजन्य नहीं, प्रेमजन्य था।
४. दुःख का मूल: अविद्या और आसक्ति
वास्तव में इस संसार के समस्त दुःखों का मूल कारण 'अविद्या' (अज्ञान) है। यही अविद्या जीव को नश्वर देह में आत्मबुद्धि करा देती है कि 'मैं यह शरीर हूँ'। यही "मैं" और "मेरा" का बंधन उत्पन्न करती है। इसी से राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं और उन्हीं से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मत्सर जन्म लेते हैं।
शास्त्रों में वर्णित दुःख के तीन प्रकार (त्रिताप):
- आध्यात्मिक दुःख: यह दो प्रकार का है— दैहिक (रोग, पीड़ा, विकलांगता) और मानसिक (कामना, भय, ईर्ष्या, लोभ)।
- आधिभौतिक दुःख: जो दूसरे जीवों (शत्रु, साँप, हिंसक पशु) से प्राप्त हो।
- आधिदैविक दुःख: जो देवताओं या प्रकृति से मिले (भूकंप, बाढ़, अतिवृष्टि)।
वस्तु दुःख नहीं देती, उसके प्रति हमारी 'आसक्ति' दुःख देती है। इच्छा पूरी हो जाए तो लोभ बढ़ता है, न हो तो क्रोध उत्पन्न होता है। यही मन की अशान्ति का मूल है। इसलिए एक ही घटना अलग-अलग व्यक्तियों पर भिन्न प्रभाव डालती है— पाँच वर्ष का बालक खिलौना न मिलने पर रो पड़ता है, विद्यार्थी परीक्षा परिणाम से व्याकुल हो जाता है, और व्यापारी धनहानि से। घटना नहीं बदलती, मन की परिपक्वता (Maturity) बदलती है।
५. भगवद्गीता का संदेश: समभाव और अनासक्ति
भगवान श्रीकृष्ण गीता (2.14) में कहते हैं:
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
"हे कुन्तीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देने वाले इन्द्रियों के विषय क्षणिक हैं। वे आते और चले जाते हैं। तू विचलित हुए बिना उन्हें सहन करना सीख (तितिक्षस्व)।"
सुख-दुःख मन की अवस्थाएँ हैं। यही संसार है— किसी के लिए सौ रुपये का नुकसान असहनीय है और कोई करोड़ों की हानि में भी धैर्य नहीं खोता।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
(गीता 2.56)
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
(गीता 2.56)
"जो मनुष्य दुःखों से परेशान नहीं होता, सुखों की चाह नहीं रखता और जो आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त है, वह स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाला) मुनि कहलाता है।"
कोई एक छोटे-से त्याग में भी व्याकुल हो जाता है और भगवान श्रीराम सम्पूर्ण राज्य, वैभव और प्रतिष्ठा को तिनके के समान छोड़ देते हैं। अंतर वस्तुओं में नहीं, चित्त की स्थिति में है। भगवान श्रीकृष्ण ने 16,108 रानियों के मध्य रहकर भी स्वयं को कभी बंधा हुआ नहीं माना, क्योंकि उनका जीवन 'अनासक्ति' का आदर्श है। बाह्य परिस्थितियाँ मनुष्य को नहीं बाँधतीं, उन्हें बाँधने वाला उसका अपना मन है।
६. कर्म का अटल विधान और प्रायश्चित
महर्षि वेदव्यास जी कहते हैं:
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि。
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥
"किया हुआ शुभ या अशुभ कर्म बिना फल दिए करोड़ों कल्पों के बाद भी समाप्त नहीं होता। प्रारब्ध का भोग करना ही पड़ता है।"
किन्तु संत, शास्त्र और भगवान यह भी बताते हैं कि निष्काम भक्ति, आत्मसमर्पण, सत्संग, नाम-स्मरण और सच्चे पश्चात्ताप से संचित कर्मों का प्रभाव क्षीण होता है तथा जीव मोक्ष का अधिकारी बनता है।
निष्कर्ष एवं प्रार्थना
अतः जीवन का उद्देश्य केवल दुःख से बचना नहीं, बल्कि उस 'अज्ञान' का नाश करना है जिससे दुःख उत्पन्न होता है। जिस दिन मनुष्य अपने जीवन को महापुरुषों की वाणी और भगवान के चरणों से जोड़ देता है, उसी दिन उसके भीतर ज्ञान का सूर्य उदित होने लगता है। तब निषादराज का विषाद भी 'भक्ति' बन जाता है, कैकेयी की कुमति ईश्वर की 'लीला' का निमित्त बन जाती है, और वनवास लोकमंगल का साधन बन जाता है।
तात्पर्य यह है कि: अज्ञान बंधन है, ज्ञान मुक्ति है, आसक्ति दुःख है, भक्ति आनंद है, और भगवान के चरणों में समर्पित जीवन ही वास्तविक शांति का मार्ग है।
अंत में हम अपने प्रभु श्रीकृष्ण (श्रीमद्भागवत 10.31.9) से गोपियों के भाव में यही प्रार्थना करते हैं:
व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते
वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम् ।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां
स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम् ॥
वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम् ।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां
स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम् ॥
प्रार्थना:
"हे मेरे प्यारे! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति (अवतार) ब्रज वनवासियों के सम्पूर्ण दुख-ताप को नष्ट करने वाली और विश्व का पूर्ण मंगल करने के लिए है। हमारा हृदय तुम्हारे प्रति लालसा से भर रहा है; कृपया हमें कुछ ऐसी औषधि (कृपा कटाक्ष) प्रदान करो जो तुम्हारे भक्तजनों के हृदय-रोग (भव-रोग) को सदा-सदा के लिए मिटा दे।"

