गोपी-प्रेम और विरह वेदना: महाभाव की अलौकिक आध्यात्मिक यात्रा
सनातन धर्म के भक्ति-दर्शन में 'गोपी-प्रेम' को सर्वोच्च शिखर माना गया है। गोपियों का प्रेम संसार के किसी भी लौकिक प्रेम से सर्वथा भिन्न है; यह विशुद्ध महाभाव है। जब भगवान् का स्वरूप, नाम, लीला और गुण किसी साधक के हृदय को ऐसा बाँध लेते हैं कि फिर संसार में कहीं मन नहीं लगता, तब वह साधक विरहाग्नि में जलता है। गोपियों की यह विरह-वेदना केवल लौकिक वियोग नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा की परमात्मा से मिलन की अत्यंत उत्कट तड़प है। आइए, सूरदास जी के पदों और श्रीमद्भागवत के गोपी-गीत के आलोक में इस दिव्य प्रेम की गहराइयों का दर्शन करें।
१. बहेलिए का दृष्टांत: श्रीकृष्ण से गोपियों की प्रेमपूर्ण शिकायत
गोपियाँ श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर अपनी विरह-वेदनापूर्ण शिकायत व्यक्त करती हैं। भक्त-कवि सूरदास जी ने इस भाव को अत्यंत मार्मिक शब्दों में पिरोया है:
प्रीति करि दीन्ही गरैं छुरी ।
जैसैं बधिक चुगाइ कपट-कन, पाछैं करत बुरी ॥
मुरली मधुर चेप काँपा करि , मोर चंद्र फँदवारि ।
बंक बिलोकनि लगी, लोभ बस, सकी न पंख पसारि ॥
तरफत गए मधुबन कौं , बहुरि न कीन्ही सार ।
सूरदास प्रभु संग कल्पतरु, उलटि न बैठी डार ॥
जैसैं बधिक चुगाइ कपट-कन, पाछैं करत बुरी ॥
मुरली मधुर चेप काँपा करि , मोर चंद्र फँदवारि ।
बंक बिलोकनि लगी, लोभ बस, सकी न पंख पसारि ॥
तरफत गए मधुबन कौं , बहुरि न कीन्ही सार ।
सूरदास प्रभु संग कल्पतरु, उलटि न बैठी डार ॥
भावार्थ एवं आध्यात्मिक रहस्य:
गोपियाँ कहती हैं कि श्रीकृष्ण ने पहले तो हमसे प्रेम किया, परन्तु अब उस प्रेम के बदले हमारे गले पर छुरी फेर दी है। जैसे कोई बहेलिया (शिकारी) पक्षियों को दाना डालकर अपने जाल में फँसाता है और फिर उनका वध कर देता है, वैसे ही कृष्ण ने प्रेम का प्रलोभन देकर हमें अपने वश में कर लिया और अब छोड़कर चले गए।
श्रीकृष्ण की मधुर बाँसुरी की ध्वनि उस बहेलिए के दाने के समान थी। उनके सिर का मोरपंख और मुख का चन्द्रमा-जैसा सौन्दर्य जाल का कार्य कर रहे थे। उनकी टेढ़ी-मेढ़ी चितवन ने हमें ऐसा मोहित कर लिया कि हम उस आकर्षण से निकल ही नहीं सकीं, जैसे जाल में फँसा पक्षी अपने पंख नहीं फैला सकता। अब वे हमें तड़पता छोड़कर मथुरा (मधुबन) चले गए। सूरदास जी लिखते हैं कि हम तो ऐसे कल्पवृक्षरूप श्रीकृष्ण की डाल पर बैठ गई थीं, जो सब मनोरथ पूर्ण करने वाले थे, परन्तु अब वही डाल उलट गई है, अर्थात् जिससे सुख और आश्रय की आशा थी, वही वियोग और दुःख का कारण बन गई।
यह विलाप उस साधक की अवस्था का चित्रण है जिसे एक बार भगवान् के प्रेम का रस मिल जाता है। जब प्रभु प्रत्यक्ष अनुभव से ओझल हो जाते हैं, तब साधक इसी प्रकार विरहाग्नि में तड़पता है।
२. विरह में भी महाभाव: अपनी नहीं, प्रियतम के चरणों की चिंता
सच्चे प्रेम का स्वरूप यह है कि प्रेमी स्वयं का दुःख भूलकर प्रिय के सुख-दुःख की चिंता करता है। श्रीमद्भागवत के 'गोपी गीत' का यह श्लोक इसी महाभाव का साक्षात् प्रमाण है:
यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित्
कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित्
कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥
भावार्थ:
"हे प्रियतम! आपके चरण-कमल अत्यंत सुकोमल हैं। उन कोमल चरणों को भी हम अपने कठोर वक्षस्थल पर बड़ी सावधानी और डर के साथ, बहुत धीरे-धीरे रखती हैं कि कहीं आपको चोट न लग जाए। उन्हीं सुकुमार चरणों से आप इस समय इस कँटीले और पथरीले जंगल में भटक रहे होंगे! क्या पत्थरों और काँटों के चुभने से आपके वे चरण व्यथित नहीं होते? हम केवल आपके ही सहारे जी रही हैं, आपकी यह चिंता हमारे मन को भ्रमित और व्याकुल कर रही है।"
प्रेम का अद्वैत दर्शन: गोपियों की विशेषता यह है कि वे यह नहीं कहतीं कि "आप हमें छोड़कर चले गए, इसलिए हम दुखी हैं।" उनकी चिंता केवल कृष्ण के चरणों की है। जहाँ अपने हृदय की वेदना भी गौण हो जाए और प्रियतम के चरणों की सम्भावित पीड़ा ही जीवन की सबसे बड़ी चिन्ता बन जाए, वहीं प्रेम 'महाभाव' का रूप धारण करता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो, गोपियों का वक्षस्थल कठोर नहीं है, कठोर है वह संसार और वह अहंकार। शुद्ध प्रेम में भक्त स्वयं को भगवान की अपेक्षा तुच्छ अनुभव करता है। उसे लगता है कि मेरे भीतर जो कुछ है, वह सब भगवान के सामने रूक्ष और कठोर है। यह प्रेम का अद्वैत है, जहाँ भक्त की चेतना अपने सुख-दुःख से ऊपर उठ जाती है और केवल भगवान का मंगल ही साध्य रह जाता है।
३. काम और प्रेम का वास्तविक भेद
गोपियों का यह प्रेम साधारण लौकिक प्रेम से भिन्न क्यों है? इसे श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी जी ने 'चैतन्य चरितामृत' में अत्यंत स्पष्ट रूप से पारिभाषित किया है:
आत्मेन्द्रिय-प्रीति-वाञ्छा तारे बलि काम ।
कृष्णेन्द्रिय-प्रीति-इच्छा धरे प्रेम नाम ॥
कृष्णेन्द्रिय-प्रीति-इच्छा धरे प्रेम नाम ॥
भावार्थ:
अपनी इन्द्रियों की तृप्ति की इच्छा 'काम' है, और केवल भगवान् के सुख की इच्छा का नाम 'प्रेम' है।
जहाँ 'मैं' और 'मेरा सुख' केन्द्र में हो, वहाँ काम है; और जहाँ भगवान का सुख ही जीवन का लक्ष्य बन जाए, वहाँ प्रेम है। काम में व्यक्ति अपने सुख की तलाश करता है, प्रेम में वह अपने प्रिय के सुख में ही अपना सुख खोज लेता है। गोपियों ने कभी कृष्ण से अपने सुख की याचना नहीं की; उनका एक ही विचार था— "कृष्ण प्रसन्न रहें, चाहे हमें कितना ही कष्ट क्यों न सहना पड़े।"
प्रेम का विकास क्रम:
सच्चा प्रेम कभी नष्ट नहीं होता— "सर्वथा ध्वंसरहितं सत्यपि ध्वंसकारणे।" प्रेम क्रमशः स्नेह - मान - प्रणय - राग - अनुराग - भाव - महाभाव तक विकसित होता है। इसी महाभाव में प्रेमी का अपना सुख-दुःख गौण हो जाता है।
४. जीवात्मा की परमात्मा के प्रति आर्त पुकार
जब मन संसार के आश्रयों की असारता को पहचान लेता है, तब वह केवल परमाश्रय भगवान् की ओर ही निहारता है। सूरदास जी के इस पद में एक साधक की इसी अनाथ अवस्था का चित्रण है:
नाथ अनाथिन की सुधि लीजै ।
गोपी, ग्वाल, गाइ, गोसुत सब, दीन मलीन दिनहिं दिन छीजैं ॥
नैननि जलधारा बाढ़ी अति, बूड़त ब्रज किन कर गहि लीजै ॥
इतनी बिनती सुनहु हमारी, बारक हूँ पतिया लिखि दीजै ॥
चरन कमल दरसन नव नवका, करुनासिंधु जगत जस लीजै ।
सूरदास प्रभु आस मिलन की, एक बार आवन ब्रज लीजै ॥
गोपी, ग्वाल, गाइ, गोसुत सब, दीन मलीन दिनहिं दिन छीजैं ॥
नैननि जलधारा बाढ़ी अति, बूड़त ब्रज किन कर गहि लीजै ॥
इतनी बिनती सुनहु हमारी, बारक हूँ पतिया लिखि दीजै ॥
चरन कमल दरसन नव नवका, करुनासिंधु जगत जस लीजै ।
सूरदास प्रभु आस मिलन की, एक बार आवन ब्रज लीजै ॥
यह केवल ब्रजवासियों के लौकिक वियोग का वर्णन नहीं है, अपितु जीवात्मा का आध्यात्मिक घोष है। भगवान् के बिना जीवन का प्रत्येक क्षण शुष्क और निरर्थक प्रतीत होने लगता है। इस पद में भक्त की विनम्रता और दीनता झलकती है। वह भगवान् से अधिकारपूर्वक कुछ नहीं माँगता, केवल इतना चाहता है कि प्रभु उसकी सुधि लें। यहाँ माँग भी प्रेम की है और प्रतीक्षा भी प्रेम की है।
५. गोपी गीत: भगवत्कथा और अखण्ड स्मरण का महात्म्य
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, ज्ञान, योग या वैराग्य से भी बढ़कर यदि भगवान को कोई चीज़ आकर्षित करती है, तो वह है भक्त का अनन्य, निस्वार्थ और शुद्ध प्रेम:
न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः ।
न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान् ॥
न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान् ॥
भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि हे उद्धव! मुझे न तो मेरे पुत्र ब्रह्मा, न भगवान शंकर, न मेरे भाई बलराम, न लक्ष्मी जी और न ही मेरी अपनी आत्मा उतनी प्रिय है, जितने प्रिय मुझे तुम (मेरे भक्त) हो।
जब भगवान् साक्षात् उपस्थित न हों, तब उनके दर्शन की प्यास को केवल उनकी कथाओं से ही बुझाया जा सकता है। गोपी गीत का यह प्रसिद्ध श्लोक इसी कथा-अमृत की महिमा गाता है:
तव कथामृतं तप्तजीवनं
कविभिरीडितं कल्मषापहम् ।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं
भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥
कविभिरीडितं कल्मषापहम् ।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं
भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥
भावार्थ:
"हे कृष्ण! आपके द्वारा सुनाई गई या आपकी लीलाओं की अमृतमयी कथाएँ, संसार की ताप-त्रयी (दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों) से संतप्त लोगों के लिए वास्तविक जीवन हैं। यह सभी पापों का नाश करने वाली और सुनने में परम मंगलकारी है। जो लोग इस धरती पर आपकी इस कथा का गान करते हैं, वे वास्तव में इस संसार में सबसे बड़े दानी और परोपकारी हैं।"
भागवत की दृष्टि में जहाँ अखण्ड स्मरण है, वहाँ वास्तविक वियोग नहीं है। बाह्य रूप से विरह दिखाई देता है, किन्तु आन्तरिक रूप से वही विरह परम मिलन का स्वरूप बन जाता है— "स्मरन्त्योऽङ्ग विमुह्यन्ति विरहौत्कण्ठ्यविह्वलाः॥"
निष्कर्ष एवं प्रार्थना
यहाँ भक्ति का चरम स्वर है। ब्रज कोई भौगोलिक क्षेत्र मात्र नहीं, बल्कि प्रेममय हृदय है। भक्त की प्रार्थना है कि प्रभु एक बार उसके हृदय-मंदिर में प्रकट हो जाएँ। भगवान् का आगमन ही उसके जीवन का उत्सव और अस्तित्व की पूर्णता है।
अंत में, हम अपने परम कृपालु प्रभु के चरणों में यही प्रार्थना करते हैं:
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥
प्रार्थना:
"जिनकी कृपा गूँगे को वाचाल (बोलने में समर्थ) बना देती है और लँगड़े को पहाड़ पार करा देती है, उन परमानन्द-स्वरूप भगवान् माधव (श्रीकृष्ण) की मैं वंदना करता हूँ।"

