Shrimad Bhagwat Skandh 3 Adhyay 14: Diti Kashyap Samvad & Birth of Hiranyakashipu (Hindi Meaning)

Sooraj Krishna Shastri
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श्रीमद्भागवत महापुराण

स्कन्ध ३ : अध्याय १४ - दिति और कश्यप का संवाद

श्रीशुक उवाच
निशम्य कौषारविणोपवर्णितां हरेः कथां कारणसूकरात्मनः । पुनः स पप्रच्छ तमुद्यताञ्जलिः न चातितृप्तो विदुरो धृतव्रतः ॥ १ ॥
भावार्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं—विदुर जी ने मैत्रेय ऋषि के मुख से यज्ञवाराह भगवान की कथा सुनी, परंतु उन्हें तृप्ति नहीं हुई। इसलिए उन्होंने हाथ जोड़कर मुनिवर से पुनः प्रश्न किया।
विदुर उवाच
तेनैव तु मुनिश्रेष्ठ हरिणा यज्ञमूर्तिना । आदिदैत्यो हिरण्याक्षो हत इत्यनुशुश्रुम ॥ २ ॥ तस्य चोद्धरतः क्षौणीं स्वदंष्ट्राग्रेण लीलया । दैत्यराजस्य च ब्रह्मन् कस्माद् हेतोरभून्मृधः ॥ ३ ॥
भावार्थ: विदुर जी ने पूछा—हे मुनिश्रेष्ठ! हमने सुना है कि यज्ञमूर्ति भगवान श्रीहरि ने आदिदैत्य हिरण्याक्ष का वध किया था। हे ब्रह्मन्! जब भगवान अपनी दाढ़ के अग्रभाग से खेल-खेल में पृथ्वी को उठा रहे थे, तब उस दैत्यराज के साथ उनका युद्ध किस कारण हुआ?
मैत्रेय उवाच
साधु वीर त्वया पृष्टं अवतारकथां हरेः । यत्त्वं पृच्छसि मर्त्यानां मृत्युपाशविशातनीम् ॥ ४ ॥ ययोत्तानपदः पुत्रो मुनिना गीतयार्भकः । मृत्योः कृत्वैव मूर्ध्न्यङ्‌घ्रिं आरुरोह हरेः पदम् ॥ ५ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा—हे वीर विदुर! तुमने भगवान के अवतार की कथा के विषय में बड़ा सुंदर प्रश्न किया है। यह कथा तो मनुष्यों के मृत्युपाश को काटने वाली है। इसी कथा को नारद मुनि से सुनकर उत्तानपाद के पुत्र बालक ध्रुव मृत्यु के सिर पर पैर रखकर भगवान के परम पद पर आरूढ़ हो गए थे।
अथात्रापीतिहासोऽयं श्रुतो मे वर्णितः पुरा । ब्रह्मणा देवदेवेन देवानां अनुपृच्छताम् ॥ ६ ॥ दितिर्दाक्षायणी क्षत्तः मारीचं कश्यपं पतिम् । अपत्यकामा चकमे सन्ध्यायां हृच्छयार्दिता ॥ ७ ॥
भावार्थ: इस विषय में ब्रह्मा जी ने देवताओं के पूछने पर जो प्राचीन इतिहास सुनाया था, वही मैं तुम्हें सुनाता हूँ। दक्षकुमारी दिति ने कामवासना से पीड़ित होकर सन्ध्यावेला में अपने पति कश्यप जी से संतान की याचना की।
इष्ट्वाग्निजिह्वं पयसा पुरुषं यजुषां पतिम् । निम्लोचत्यर्क आसीनं अग्न्यगारे समाहितम् ॥ ८ ॥
भावार्थ: उस समय सूर्य अस्त हो रहे थे और कश्यप जी अग्निहोत्रशाला में 'यज्ञपति' भगवान विष्णु की आहुतियों द्वारा पूजा करके समाधिस्थ बैठे थे।
दिति उवाच
एष मां त्वत्कृते विद्वन् काम आत्तशरासनः । दुनोति दीनां विक्रम्य रम्भामिव मतङ्गजः ॥ ९ ॥ तद्‍भवान् दह्यमानायां सपत्‍नीनां समृद्धिभिः । प्रजावतीनां भद्रं ते मय्यायुङ्क्तामनुग्रहम् ॥ १० ॥
भावार्थ: दिति बोली—हे विद्वन्! आपके लिए कामदेव अपना धनुष लेकर मुझ दीन अबला को वैसे ही सता रहा है, जैसे मतवाला हाथी केले के पेड़ को रौंद डालता है। अपनी सौतों की सन्तान और समृद्धि देखकर मैं ईर्ष्या से जल रही हूँ। आप मेरा कल्याण करें।
भर्तर्याप्तोरुमानानां लोकानाविशते यशः । पतिर्भवद्विधो यासां प्रजया ननु जायते ॥ ११ ॥ पुरा पिता नो भगवान् दक्षो दुहितृवत्सलः । कं वृणीत वरं वत्सा इत्यपृच्छत नः पृथक् ॥ १२ ॥
भावार्थ: जिन स्त्रियों को पति से सम्मान मिलता है और जिनके आप जैसे पति हों, उनका यश संसार में फैल जाता है। पूर्वकाल में हमारे पिता दक्ष प्रजापति ने हम पुत्रियों से अलग-अलग पूछा था कि 'तुम कैसा वर चाहती हो?'
स विदित्वात्मजानां नो भावं सन्तानभावनः । त्रयोदशाददात्तासां यास्ते शीलमनुव्रताः ॥ १३ ॥ अथ मे कुरु कल्याण कामं कञ्जविलोचन । आर्तोपसर्पणं भूमन् अमोघं हि महीयसि ॥ १४ ॥
भावार्थ: हमारे मनोभाव को जानकर उन्होंने हम तेरह बहनों का विवाह आपसे कर दिया। हे कमल नयन! आप मेरा मनोरथ पूर्ण कीजिये। महापुरुषों के पास आकर अपनी पीड़ा निवेदित करना कभी व्यर्थ नहीं जाता।
इति तां वीर मारीचः कृपणां बहुभाषिणीम् । प्रत्याहानुनयन् वाचा प्रवृद्धानङ्गकश्मलाम् ॥ १५ ॥
भावार्थ: हे विदुर! कामवेग से व्याकुल और बहुत कुछ कहने वाली उस दीन दिति को कश्यप जी ने समझाते हुए कहा।
कश्यप उवाच
एष तेऽहं विधास्यामि प्रियं भीरु यदिच्छसि । तस्याः कामं न कः कुर्यात् सिद्धिस्त्रैवर्गिकी यतः ॥ १६ ॥ सर्वाश्रमानुपादाय स्वाश्रमेण कलत्रवान् । व्यसनार्णवमत्येति जलयानैर्यथार्णवम् ॥ १७ ॥
भावार्थ: कश्यप जी बोले—हे भीरु! तुम जो चाहती हो, मैं वह प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। पत्नी की कामना कौन पूरा नहीं करेगा? जैसे जहाज से समुद्र पार किया जाता है, वैसे ही गृहस्थ पुरुष पत्नी के सहारे ही विपत्तियों को पार कर जाता है।
यामाहुरात्मनो ह्यर्धं श्रेयस्कामस्य मानिनि । यस्यां स्वधुरमध्यस्य पुमांश्चरति विज्वरः ॥ १८ ॥ यामाश्रित्येन्द्रियारातीन् दुर्जयानितराश्रमैः । वयं जयेम हेलाभिः दस्यून् दुर्गपतिर्यथा ॥ १९ ॥
भावार्थ: हे मानिनि! पत्नी को शरीर का आधा अंग कहा गया है। पत्नी पर घर का भार सौंपकर पुरुष निश्चिंत विचरता है। जैसे किले का स्वामी लुटेरों को आसानी से हरा देता है, वैसे ही हम गृहस्थ पत्नी के आश्रय में रहकर दुर्जय इंद्रियों को जीत लेते हैं।
न वयं प्रभवस्तां त्वां अनुकर्तुं गृहेश्वरि । अप्यायुषा वा कार्त्स्न्येन ये चान्ये गुणगृध्नवः ॥ २० ॥ अथापि काममेतं ते प्रजात्यै करवाण्यलम् । यथा मां नातिरोचन्ति मुहूर्तं प्रतिपालय ॥ २१ ॥
भावार्थ: हे गृहेश्वरि! हम जीवन भर तुम्हारी सेवा करके भी तुम्हारे उपकार का बदला नहीं चुका सकते। फिर भी मैं तुम्हारी सन्तान प्राप्ति की इच्छा पूरी करूँगा, परन्तु तुम थोड़ी देर प्रतीक्षा करो, ताकि लोग मेरी निंदा न करें।
एषा घोरतमा वेला घोराणां घोरदर्शना । चरन्ति यस्यां भूतानि भूतेशानुचराणि ह ॥ २२ ॥ एतस्यां साध्वि सन्ध्यायां भगवान् भूतभावनः । परीतो भूतपर्षद्‌भिः वृषेणाटति भूतराट् ॥ २३ ॥
भावार्थ: यह सन्ध्या का समय बड़ा ही भयानक है। इसमें घोर रूप वाले भूत-प्रेत विचरण करते हैं। हे साध्वि! इस समय भूतों के स्वामी भगवान भोलेनाथ अपने गणों से घिरकर बैल पर सवार होकर भ्रमण करते हैं।
श्मशानचक्रानिलधूलिधूम्र विकीर्णविद्योतजटाकलापः । भस्मावगुण्ठामलरुक्मदेहो देवस्त्रिभिः पश्यति देवरस्ते ॥ २४ ॥
भावार्थ: श्मशान की धूल से उनका शरीर धूसरित रहता है, जटाएँ बिखरी रहती हैं। भस्म से ढके होने पर भी उनका शरीर सुंदर लगता है। वे तुम्हारे देवर (भगवान शिव) अपनी तीनों आँखों से सब कुछ देखते हैं।
न यस्य लोके स्वजनः परो वा नात्यादृतो नोत कश्चिद्विगर्ह्यः । वयं व्रतैर्यत् चरणापविद्धां आशास्महेऽजां बत भुक्तभोगाम् ॥ २५ ॥
भावार्थ: संसार में न कोई उनका अपना है, न पराया। जिस माया को उन्होंने अपने चरणों से ठुकरा दिया है, उसी माया को हम लोग अनेक व्रतों द्वारा पाने की आशा करते हैं।
यस्यानवद्याचरितं मनीषिणो गृणन्त्यविद्यापटलं बिभित्सवः । निरस्तसाम्यातिशयोऽपि यत्स्वयं पिशाचचर्यामचरद्‍गतिः सताम् ॥ २६ ॥
भावार्थ: ज्ञानीजन उनके निर्मल चरित्र का गान करते हैं। यद्यपि वे अद्वितीय और महान हैं, फिर भी सत्पुरुषों के एकमात्र आश्रय होकर भी वे पिशाचों जैसा आचरण करते हैं।
हसन्ति यस्याचरितं हि दुर्भगाः स्वात्मन् रतस्याविदुषः समीहितम् । यैर्वस्त्रमाल्याभरणानुलेपनैः श्वभोजनं स्वात्मतयोपलालितम् ॥ २७ ॥
भावार्थ: जो अभागे लोग शरीर को ही आत्मा मानकर उसे सजाते हैं, वे भगवान शिव के आचरण को न समझकर उन पर हँसते हैं।
ब्रह्मादयो यत्कृतसेतुपाला यत्कारणं विश्वमिदं च माया । आज्ञाकरी यस्य पिशाचचर्या अहो विभूम्नश्चरितं विडम्बनम् ॥ २८ ॥
भावार्थ: ब्रह्मा आदि देवता भी जिनके बनाए नियमों का पालन करते हैं, यह विश्व और माया जिनके अधीन है, उनकी यह पिशाच-वृत्ति केवल एक लीला है।
मैत्रेय उवाच
सैवं संविदिते भर्त्रा मन्मथोन् मथितेन्द्रिया । जग्राह वासो ब्रह्मर्षेः वृषलीव गतत्रपा ॥ २९ ॥ स विदित्वाथ भार्यायाः तं निर्बन्धं विकर्मणि । नत्वा दिष्टाय रहसि तयाथोपविवेश हि ॥ ३० ॥
भावार्थ: पति के समझाने पर भी, कामातुर होने के कारण दिति की लज्जा जाती रही और उसने कश्यप जी का वस्त्र पकड़ लिया। कश्यप जी ने इसे प्रारब्ध मानकर नमस्कार किया और एकांत में उसकी इच्छा पूरी की।
अथोपस्पृश्य सलिलं प्राणानायम्य वाग्यतः । ध्यायन् जजाप विरजं ब्रह्म ज्योतिः सनातनम् ॥ ३१ ॥ दितिस्तु व्रीडिता तेन कर्मावद्येन भारत । उपसङ्गम्य विप्रर्षिं अधोमुख्यभ्यभाषत ॥ ३२ ॥
भावार्थ: तदनंतर कश्यप जी स्नान-प्राणायाम कर ब्रह्मज्योति का जप करने लगे। दिति भी अपने कर्म से लज्जित हुई और सिर नीचे करके कश्यप जी के पास जाकर बोली।
दिति उवाच
न मे गर्भमिमं ब्रह्मन् भूतानां ऋषभोऽवधीत् । रुद्रः पतिर्हि भूतानां यस्याकरवमंहसम् ॥ ३३ ॥ नमो रुद्राय महते देवायोग्राय मीढुषे । शिवाय न्यस्तदण्डाय धृतदण्डाय मन्यवे ॥ ३४ ॥
भावार्थ: दिति ने कहा—हे ब्रह्मन्! भूतों के स्वामी भगवान रुद्र मेरे इस गर्भ को नष्ट न करें। मैं उन उग्र और वरदाता रुद्र को नमस्कार करती हूँ।
स नः प्रसीदतां भामो भगवानुर्वनुग्रहः । व्याधस्याप्यनुकम्प्यानां स्त्रीणां देवः सतीपतिः ॥ ३५ ॥
भावार्थ: सतीपति भगवान शंकर मुझ पर प्रसन्न हों। वे अबला स्त्रियों पर कृपा ही करते हैं।
स्वसर्गस्याशिषं लोक्यां आशासानां प्रवेपतीम् । निवृत्तसन्ध्यानियमो भार्यामाह प्रजापतिः ॥ ३६ ॥
भावार्थ: अपनी सन्तान की कुशलता चाहती हुई काँपती हुई दिति से सन्ध्या-वंदन से निवृत्त होकर प्रजापति कश्यप ने कहा।
कश्यप उवाच
अप्रायत्यादात्मनस्ते दोषान्मौहूर्तिकादुत । मन्निदेशातिचारेण देवानां चातिहेलनात् ॥ ३७ ॥ भविष्यतस्तवाभद्रौ अभद्रे जाठराधमौ । लोकान्सपालांस्त्रींश्चण्डि मुहुराक्रन्दयिष्यतः ॥ ३८ ॥
भावार्थ: हे अदूरदर्शिनी! तुम्हारे मन की अपवित्रता, इस कुसमय, मेरी आज्ञा के उल्लंघन और देवताओं के अनादर के कारण तुम्हारे गर्भ से दो अधम और अमंगलकारी पुत्र होंगे।
प्राणिनां हन्यमानानां दीनानां अकृतागसाम् । स्त्रीणां निगृह्यमाणानां कोपितेषु महात्मसु ॥ ३९ ॥ तदा विश्वेश्वरः क्रुद्धो भगवान् लोकभावनः । हनिष्यत्यवतीर्यासौ यथाद्रीन् शतपर्वधृक् ॥ ४० ॥
भावार्थ: जब वे अत्याचार करेंगे, तब जगत के स्वामी भगवान विष्णु कुपित होकर अवतार लेंगे और उनका वध वैसे ही करेंगे जैसे इंद्र ने पर्वतों के पंख काटे थे।
दिति उवाच
वधं भगवता साक्षान् सुनाभोदारबाहुना । आशासे पुत्रयोर्मह्यं मा क्रुद्धाद्‍ब्राह्मणाद् विभो ॥ ४१ ॥ न ब्रह्मदण्डदग्धस्य न भूतभयदस्य च । नारकाश्चानुगृह्णन्ति यां यां योनिमसौ गतः ॥ ४२ ॥
भावार्थ: दिति ने कहा—हे प्रभो! मैं चाहती हूँ कि मेरे पुत्रों का वध साक्षात् भगवान के सुदर्शन चक्र से हो, किन्तु ब्राह्मण के शाप से न हो।
कश्यप उवाच
कृतशोकानुतापेन सद्यः प्रत्यवमर्शनात् । भगवत्युरुमानाच्च भवे मय्यपि चादरात् ॥ ४३ ॥ पुत्रस्यैव च पुत्राणां भवितैकः सतां मतः । गास्यन्ति यद्यशः शुद्धं भगवद्यशसा समम् ॥ ४४ ॥
भावार्थ: कश्यप जी ने कहा—चूँकि तुम्हें अपने कर्म पर पछतावा हुआ है, इसलिए तुम्हारे पुत्र (हिरण्यकशिपु) के पुत्रों में से एक पुत्र (प्रह्लाद) साधु-संतों का शिरोमणि होगा।
योगैर्हेमेव दुर्वर्णं भावयिष्यन्ति साधवः । निर्वैरादिभिरात्मानं यच्छीलमनुवर्तितुम् ॥ ४५ ॥ यत्प्रसादादिदं विश्वं प्रसीदति यदात्मकम् । स स्वदृग्भगवान् यस्य तोष्यतेऽनन्यया दृशा ॥ ४६ ॥
भावार्थ: साधुजन उसके चरित्र का अनुकरण करके अपने मन को शुद्ध करेंगे। वह तुम्हारा पौत्र अनन्य भक्ति से भगवान को प्रसन्न कर लेगा।
स वै महाभागवतो महात्मा महानुभावो महतां महिष्ठः । प्रवृद्धभक्त्या ह्यनुभाविताशये निवेश्य वैकुण्ठमिमं विहास्यति ॥ ४७ ॥
भावार्थ: वह निसंदेह महाभागवत, महात्मा और बड़े-बड़े महानुभावों में श्रेष्ठ होगा। वह अपनी बढ़ी हुई भक्ति से भगवान को अपने हृदय में धारण करेगा और अंत में वैकुण्ठ प्राप्त करेगा।
अलम्पटः शीलधरो गुणाकरो हृष्टः परर्ध्या व्यथितो दुःखितेषु । अभूतशत्रुर्जगतः शोकहर्ता नैदाघिकं तापमिवोडुराजः ॥ ४८ ॥
भावार्थ: वह विषय-भोगों से विरक्त, सुशील और गुणों की खान होगा। उसका कोई शत्रु नहीं होगा। जैसे चंद्रमा गर्मी को हर लेता है, वैसे ही वह जगत का शोक हर लेगा।
अन्तर्बहिश्चामलमब्जनेत्रं स्वपूरुषेच्छानुगृहीतरूपम् । पौत्रस्तव श्रीललनाललामं द्रष्टा स्फुरत्कुण्डलमण्डिताननम् ॥ ४९ ॥
भावार्थ: वह कमल नयन भगवान को अपने भीतर और बाहर सर्वत्र देखेगा।
मैत्रेय उवाच
श्रुत्वा भागवतं पौत्रं अमोदत दितिर्भृशम् । पुत्रयोश्च वधं कृष्णाद् विदित्वाऽऽसीन् महामनाः ॥ ५० ॥
भावार्थ: अपना पौत्र 'भगवद्भक्त' होगा, यह सुनकर दिति को बहुत आनंद हुआ। साथ ही यह जानकर कि उनके पुत्रों का वध साक्षात् भगवान श्रीहरि के हाथों होगा, उनका मन शांत और प्रसन्न हो गया।

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