Leadership Shloka: 'Na Abhisheko Na Samskarah' Meaning in Hindi & English

Sooraj Krishna Shastri
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सुभाषितम् - नाभिषेको न संस्कारः

🌸 सुभाषितम् - सच्चा नेतृत्व 🌸

(आत्मबल और पराक्रम की महिमा)

नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
विक्रमार्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥

Nābhiṣeko na saṃskāraḥ siṃhasya kriyate vane |
Vikramārjitasattvasya svayameva mṛgendratā ||

📝 हिन्दी भावार्थ

जंगल में सिंह (शेर) का न तो कोई राज्याभिषेक (Tilak/Coronation) किया जाता है और न ही कोई संस्कार। अपने पराक्रम (वीरता) से अर्जित शक्ति के बल पर वह स्वयं ही पशुओं का राजा (मृगेन्द्र) बन जाता है।

तात्पर्य: महानता पैतृक संपत्ति या उपाधियों से नहीं, बल्कि स्वयं के गुणों और मेहनत से प्राप्त होती है।

🔍 शब्दार्थ (Word Analysis)

न + अभिषेकः: न तो राजतिलक/स्नान (No coronation).
सिंहस्य: शेर का (Of the lion).
वने: जंगल में (In the forest).
विक्रम + अर्जित + सत्त्वस्य: पराक्रम द्वारा अर्जित शक्ति वाले का.
स्वयम् + एव: अपने आप ही (By himself).
मृगेन्द्रता: पशुओं का राजा / स्वामित्व (Lordship).

📚 व्याकरणात्मक विश्लेषण

  • नाभिषेको (न + अभिषेकः): यहाँ 'दीर्घ सन्धि' है।
  • सिंहस्य: 'सिंह' शब्द, षष्ठी विभक्ति, एकवचन (सम्बन्ध कारक - शेर का)।
  • मृगेन्द्रता: 'मृग' (पशु) + 'इन्द्र' (राजा) + 'ता' (भाववाचक प्रत्यय)। गुण सन्धि।
  • विक्रमार्जितसत्त्वस्य: यह एक बहुव्रीहि/तत्पुरुष समास युक्त पद है।

🌍 आधुनिक सन्दर्भ (Context)

आज के समय में यह श्लोक 'Self-Made' (स्व-निर्मित) सफलता का मूल मंत्र है।

  • स्टार्टअप (Startup): एक उद्यमी विरासत का इंतजार नहीं करता। वह अपने आइडिया से शिखर तक पहुँचता है।
  • नेतृत्व (Leadership): असली लीडर वह नहीं जिसे कुर्सी मिली हो, बल्कि वह है जिसके काम को देखकर लोग उसे खुद अपना नेता मान लें। पद (Position) दिया जा सकता है, सम्मान (Respect) कमाना पड़ता है।

📖 संवादात्मक नीति कथा

"असली राजा कौन?"

शिष्य (आर्यन): गुरुजी, मुझे 'मॉनिटर' नहीं बनाया गया, जबकि मेरे अंक सबसे ज्यादा थे। क्या मेरी योग्यता का कोई मोल नहीं?
गुरुजी: बेटा, क्या तुमने कभी जंगल में चुनाव होते देखे हैं? शेर को राजा कौन नियुक्त करता है?
आर्यन: कोई नहीं, वह तो अपनी ताकत से राजा माना जाता है।
गुरुजी: बिल्कुल! शेर को 'बैज' (Badge) की जरूरत नहीं होती। उसका पराक्रम ही उसका परिचय है। यदि तुम सच में योग्य हो, तो तुम्हें पद की आवश्यकता नहीं है। तुम अपने व्यवहार से कक्षा के नेता बन जाओगे।
आर्यन: समझ गया गुरुजी! मुझे पद के पीछे भागने के बजाय अपने 'गुणों' (शेर जैसा पराक्रम) को बढ़ाना चाहिए।

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