Satsangati ka Mahatva: 'कीटोऽपि सुमनःसङ्गात्' (Kito'pi Sumanah Sanghat) Shloka Meaning

Sooraj Krishna Shastri
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सुभाषितम् - कीटोऽपि सुमनःसङ्गात्

🌸 सुभाषितम् - सत्सङ्गतिः 🌸

(हितोपदेशः - मित्रलाभः)

कीटोऽपि सुमनःसङ्गादारोहति सतां शिरः।
अश्मापि याति देवत्वं महद्भिः सुप्रतिष्ठितः॥

Kīṭo'pi sumanaḥsaṅgādārohati satāṃ śiraḥ |
Aśmāpi yāti devatvaṃ mahadbhiḥ supratiṣṭhitaḥ ||

📝 हिन्दी अनुवाद

भावार्थ: पुष्पों (फूलों) की संगति के कारण कीड़ा भी सज्जनों और देवताओं के मस्तक पर चढ़ जाता है। इसी प्रकार, महान पुरुषों द्वारा विधि-विधान से स्थापित किए जाने पर एक साधारण पत्थर भी 'देवता' (भगवान की मूर्ति) बन जाता है।

🔍 शब्दार्थ एवं व्युत्पत्ति (Word Analysis)

कीटः + अपि (कीटोऽपि):
तुच्छ कीड़ा भी (Even a worm).
सुमनः + सङ्गात्:
पुष्पों की संगति से (Due to association with flowers).
आरोहति:
चढ़ जाता है (Ascends/Climbs).
सतां शिरः:
सज्जनों/देवताओं के सिर पर (On the head of the noble).
अश्मा + अपि:
पत्थर भी (Even a stone).
सुप्रतिष्ठितः:
अच्छी तरह स्थापित/प्रतिष्ठित (Well consecrated).

📚 व्याकरणात्मक विश्लेषण (Grammar)

  • कीटोऽपि (कीटः + अपि): यहाँ 'विसर्ग सन्धि' (उत्व) का प्रयोग हुआ है।
  • सुमनःसङ्गात्: यहाँ 'पञ्चमी विभक्ति' (अपादान/हेतु) है, जिसका अर्थ है 'संगति के कारण'।
  • महद्भिः: 'महत्' शब्द, तृतीया विभक्ति, बहुवचन (महान लोगों के द्वारा)।
  • अलंकार: यहाँ 'दृष्टान्त अलंकार' है, जहाँ कीड़े और पत्थर के उदाहरण से 'सत्संगति' का महत्व समझाया गया है।

🌍 आधुनिक सन्दर्भ (Modern Context)

आज के युग में इस श्लोक का महत्व और भी बढ़ गया है। इसे हम Networking और Mentorship के रूप में देख सकते हैं।

  • वातावरण का प्रभाव: जैसे कीड़ा फूल के साथ मंदिर में प्रवेश पा जाता है, वैसे ही एक सामान्य व्यक्ति यदि गुणी, विद्वान और सफल लोगों के बीच रहता है, तो उसका भी सामाजिक स्तर ऊंचा उठता है।
  • करियर निर्माण: एक साधारण पत्थर तब तक पत्थर है जब तक उसे तराशा नहीं जाता। उसी प्रकार, एक छात्र 'पत्थर' समान है, लेकिन जब उसे श्रेष्ठ गुरु (महान व्यक्ति) का मार्गदर्शन मिलता है, तो वह समाज में पूजनीय (सफल) बन जाता है।

📖 संवादात्मक नीति कथा (Interactive Fable)

"संगति का रंग"

पोता (अंश): दादाजी! मेरे दोस्त कहते हैं कि स्कूल के बाद हम वीडियो गेम खेलेंगे, लेकिन माँ कहती हैं कि मुझे पढ़ने वाले बच्चों के साथ रहना चाहिए। इससे क्या फर्क पड़ता है? मैं तो 'मैं' ही रहूँगा ना?
दादाजी: (मुस्कुराते हुए) बेटा, क्या तुमने कभी मिट्टी के कीड़े को देखा है?
अंश: छी! हाँ दादाजी, वो तो मिट्टी में रेंगता है, गंदा होता है।
दादाजी: बिलकुल। लोग उसे पैर से कुचल देते हैं या झाड़ू से बाहर फेंक देते हैं। लेकिन, एक दिन मैंने उसी कीड़े को भगवान शिव के मस्तक पर देखा।
अंश: (हैरानी से) क्या? भगवान के सिर पर? ऐसा कैसे हो सकता है?
दादाजी: क्योंकि वह कीड़ा एक सुंदर 'गुलाब के फूल' के अंदर छिपा बैठा था। जब पुजारी ने वह फूल भगवान को चढ़ाया, तो फूल के साथ-साथ वह तुच्छ कीड़ा भी भगवान के सिर तक पहुँच गया। अगर वह अकेला आता, तो बाहर फेंक दिया जाता।
अंश: ओहो! तो फूल की वजह से उसकी भी इज्जत बढ़ गई?
दादाजी: सही समझे! इसी को 'सत्संगति' कहते हैं। तुम अकेले क्या हो, यह तो महत्वपूर्ण है, लेकिन तुम 'किसके साथ' हो, यह तय करता है कि तुम कहाँ तक पहुँचोगे। अच्छे दोस्तों के साथ रहोगे, तो उनके गुण तुम में भी आएँगे और तुम ऊंचाइयों को छूओगे।
अंश: अब समझा दादाजी! मैं भी 'फूलों' (अच्छे दोस्तों) के साथ ही रहूँगा।

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