संस्कृत साहित्य और काव्यशास्त्र: एक ऐतिहासिक एवं शोधपरक अनुशीलन
संस्कृत साहित्य न केवल भारत की, अपितु विश्व की प्राचीनतम और समृद्धतम ज्ञान परंपराओं में से एक है। जहाँ एक ओर महाकवि कालिदास, भारवि और माघ जैसे कवियों ने अपनी सृजनात्मक प्रतिभा से महाकाव्यों और नाटकों का सृजन किया, वहीं दूसरी ओर भरतमुनि, मम्मट और विश्वनाथ जैसे आचार्यों ने 'काव्यशास्त्र' (Poetics) के माध्यम से सौंदर्य और रस के सिद्धांतों को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। यह सूची इन्हीं 100 कालजयी विद्वानों के योगदान को रेखांकित करती है।
इस शोधपरक सूची को कालक्रम के अनुसार चार प्रमुख युगों में विभाजित किया गया है: **आदिकाल और महाकाव्य काल**, **शास्त्रीय साहित्य का स्वर्ण युग**, **काव्यशास्त्र (अलंकार शास्त्र) का विकास काल**, और **आधुनिक संस्कृत साहित्य**। यह वर्गीकरण पाठकों को लौकिक संस्कृत के विकास और विभिन्न संप्रदायों (जैसे रस, अलंकार, ध्वनि, वक्रोक्ति) के उदय को समझने में सहायता करेगा।

| क्रम | विद्वान/कवि | प्रमुख रचना/योगदान |
| 1 | महर्षि वाल्मीकि | 'रामायण' (आदिकाव्य), लौकिक छंद के जनक। |
| 2 | महर्षि वेदव्यास | 'महाभारत' (इतिहास काव्य) एवं पुराण संहिता। |
| 3 | भरतमुनि | 'नाट्यशास्त्र' (काव्यशास्त्र एवं रस सिद्धांत के प्रवर्तक)। |
| 4 | पाणिनि | 'जाम्बवती विजयम्' (काव्य), अष्टाध्यायी (व्याकरण)। |
| 5 | कत्यायन (वररुचि) | 'स्वर्गारोहण' काव्य एवं वार्तिक। |
| 6 | पतंजलि | 'महानंद काव्य' एवं महाभाष्य। |
| 7 | पिंगल | 'छन्दःशास्त्र' (काव्य में लय और छंद का विज्ञान)। |
| 8 | गुणाढ्य | 'वृहत्कथा' (पैशाची प्राकृत, कथा साहित्य का आधार)। |
| 9 | भास | 'स्वप्नवासवदत्तम्' सहित 13 प्रसिद्ध नाटक। |
| 10 | अश्वघोष | 'बुद्धचरित' एवं 'सौंदरनंद' (बौद्ध महाकाव्य)। |
| क्रम | विद्वान/कवि | प्रमुख रचना/योगदान |
| 11 | महाकवि कालिदास | अभिज्ञानशाकुंतलम्, रघुवंशम्, मेघदूतम् (उपमा अलंकार)। |
| 12 | शूद्रक | 'मृच्छकटिकम्' (यथार्थवादी सामाजिक नाटक)। |
| 13 | विशाखदत्त | 'मुद्राराक्षस' (राजनैतिक नाटक)। |
| 14 | भारवि | 'किरातार्जुनीयम्' (अर्थगौरव के लिए प्रसिद्ध)। |
| 15 | भट्टि | 'भट्टिकाव्य' (रावणवध) - व्याकरण आधारित महाकाव्य। |
| 16 | कुमारदास | 'जानकीहरण' महाकाव्य। |
| 17 | विष्णुशर्मा | 'पंचतंत्र' (नीति कथा साहित्य)। |
| 18 | दण्डी | 'दशकुमारचरितम्' (गद्य) एवं काव्यादर्श (काव्यशास्त्र)। |
| 19 | सुबंधु | 'वासवदत्ता' (श्लेष प्रधान गद्य काव्य)। |
| 20 | बाणभट्ट | 'कादम्बरी' (विश्व का प्रथम उपन्यास) एवं हर्षचरित। |
| 21 | मयूरभट्ट | 'सूर्यशतकम्' (बाणभट्ट के समकालीन)। |
| 22 | माघ | 'शिशुपालवधम्' (उपमा, अर्थगौरव, पदलालित्य का संगम)। |
| 23 | भवभूति | 'उत्तररामचरितम्' (करुण रस के सर्वश्रेष्ठ कवि)। |
| 24 | अमरुक | 'अमरुकशतकम्' (शृंगार रस मुक्तक)। |
| 25 | भर्तृहरि | 'नीतिशतक', 'शृंगारशतक', 'वैराग्यशतक'। |
| क्रम | आचार्य/विद्वान | सिद्धांत/ग्रंथ (Theory/Work) |
| 26 | भामह | 'काव्यालंकार' (अलंकार संप्रदाय के प्रवर्तक)। |
| 27 | वामन | 'काव्यालंकारसूत्रवृत्ति' (रीति संप्रदाय, "रीतिरात्मा काव्यस्य")। |
| 28 | उद्भट | 'काव्यालंकारसारसंग्रह' (अलंकारवादी आचार्य)। |
| 29 | रुद्रट | काव्यालंकार (काव्य के भेद और शब्दालंकार)। |
| 30 | आनंदवर्धन | 'ध्वन्यालोक' (ध्वनि संप्रदाय, काव्य की आत्मा 'ध्वनि')। |
| 31 | राजशेखर | 'काव्यमीमांसा' एवं 'कर्पूरमंजरी' (सट्टक)। |
| 32 | अभिनवगुप्त | 'ध्वन्यालोक लोचन' एवं 'अभिनवभारती' (रस सूत्र व्याख्या)। |
| 33 | कुंतक | 'वक्रोक्तिजीवितम्' (वक्रोक्ति संप्रदाय के प्रवर्तक)। |
| 34 | धनंजय | 'दशरूपक' (नाट्यशास्त्र का विवेचन)। |
| 35 | महिमभट्ट | 'व्यक्तिविवेक' (अनुमितिवाद के समर्थक)। |
| 36 | भोजराज | 'सरस्वतीकंठाभरण' एवं 'शृंगारप्रकाश'। |
| 37 | क्षेमेन्द्र | 'औचित्यविचारचर्चा' (औचित्य संप्रदाय के प्रवर्तक)। |
| 38 | मम्मट | 'काव्यप्रकाश' (काव्यशास्त्र का समन्वयात्मक मानक ग्रंथ)। |
| 39 | रुय्यक | 'अलंकारसर्वस्व' (अलंकारों का सूक्ष्म विवेचन)। |
| 40 | हेमचंद्र | 'काव्यानुशासन' (जैन आचार्य एवं व्याकरणविद)। |
| 41 | श्रीहर्ष | 'नैषधीयचरितम्' (पंच महाकाव्यों में अंतिम)। |
| 42 | जयदेव | 'गीतगोविंदम्' (गीति काव्य परंपरा)। |
| 43 | जयदेव (पीयूषवर्ष) | 'चंद्रालोक' (अलंकार शास्त्र)। |
| 44 | विश्वनाथ | 'साहित्यदर्पण' ("वाक्यं रसात्मकं काव्यम्")। |
| 45 | पंडितराज जगन्नाथ | 'रसगंगाधर' (काव्यशास्त्र के अंतिम महान आचार्य)। |
निष्कर्ष: संस्कृत साहित्य की कालजयी यात्रा
उपरोक्त 100 विद्वानों की सूची यह सिद्ध करती है कि संस्कृत केवल कर्मकांड की भाषा नहीं, अपितु यह मानवीय भावनाओं, सौंदर्य और दर्शन की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति है। वाल्मीकि की करुणा से लेकर कालिदास के शृंगार तक, और मम्मट के शास्त्र से लेकर आधुनिक युग में सत्यव्रत शास्त्री के चिंतन तक, यह धारा अविरल बह रही है।
जहाँ प्राचीन आचार्यों ने 'रस' और 'ध्वनि' जैसे सिद्धांतों की स्थापना कर विश्व साहित्य को आलोचना (Criticism) की नई दृष्टि दी, वहीं आधुनिक कवियों ने संस्कृत को समसामयिक विषयों से जोड़कर इसे जीवंत रखा। इस सूची में शामिल प्रत्येक नाम ने भारतीय ज्ञान परंपरा के उस विशाल भवन में एक ईंट जोड़ी है, जो आज भी संपूर्ण विश्व को प्रकाशित कर रहा है। **भगवत दर्शन** का यह प्रयास शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक विनम्र अनुष्ठान है।