संस्कृत व्याकरण (व्याकरण शास्त्र) को वेदांगों में 'मुख' कहा गया है। यह विश्व की सबसे वैज्ञानिक और व्यवस्थित भाषा प्रणाली है। इसकी नींव महेश्वर सूत्रों और पाणिनि की अष्टाध्यायी पर टिकी है। जहाँ प्राचीन आचार्यों ने भाषा के नियम बनाए, वहीं मध्यकालीन विद्वानों ने 'प्रक्रिया ग्रंथों' (कौमुदी परंपरा) के माध्यम से इसे सरल बनाया और आधुनिक विद्वानों ने इसका ऐतिहासिक व तुलनात्मक अध्ययन किया।
प्रस्तुत शोधपरक सूची में हमने व्याकरण शास्त्र के इतिहास को चार चरणों में विभाजित किया है: **प्राचीन एवं पाणिनीय काल**, **बौद्ध-जैन एवं तंत्र व्याकरण**, **मध्यकालीन टीकाकार**, और **आधुनिक व्याकरण मनीषी**। यह सूची शब्दब्रह्म के उन उपासकों का वंदन है जिन्होंने संस्कृत भाषा को अमरत्व प्रदान किया।
| क्रम | आचार्य/वैयाकरण | प्रमुख योगदान/ग्रंथ |
|---|---|---|
| 1 | भगवान शिव (महेश्वर) | 'महेश्वर सूत्र' (संस्कृत वर्णमाला के जनक)। |
| 2 | बृहस्पति | इन्द्र को व्याकरण का प्रथम ज्ञान देने वाले (बार्हस्पत्य)। |
| 3 | इन्द्र | 'ऐन्द्र व्याकरण' (पाणिनि से पूर्व का प्रमुख संप्रदाय)। |
| 4 | भारद्वाज | ऋक्तंत्र और प्राचीन व्याकरण नियमों के प्रवर्तक। |
| 5 | आपिशलि | पाणिनि द्वारा उल्लिखित प्राचीन वैयाकरण। |
| 6 | शाकटायन (प्राचीन) | 'धातु से ही सभी शब्द बने हैं' (नैरुक्त मत)। |
| 7 | गार्ग्य | निघंटु और प्राचीन शब्द व्युत्पत्ति सिद्धांत। |
| 8 | गालव | पाणिनि पूर्व के वैयाकरण (स्वर विधि विशेषज्ञ)। |
| 9 | शाकल्य | ऋग्वेद पदपाठ और संधि नियमों के आदि आचार्य। |
| 10 | स्फोटायन | 'स्फोटवाद' (शब्द ब्रह्म) के आदि प्रवर्तक। |
| 11 | यास्क | 'निरुक्त' (वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति)। |
| 12 | महर्षि पाणिनि | 'अष्टाध्यायी' (व्याकरण शास्त्र के सर्वोच्च शिखर)। |
| 13 | कात्यायन (वररुचि) | 'वार्तिक' (अष्टाध्यायी के पूरक नियम)। |
| 14 | महर्षि पतंजलि | 'महाभाष्य' (व्याकरण दर्शन और इष्टि)। |
| 15 | व्याडि | 'संग्रह' ग्रंथ (लक्ष्य-लक्षण का विशाल ग्रंथ)। |
| 16 | कौत्स | निरुक्त और व्याकरण के प्राचीन आचार्य। |
| 17 | चाक्रवर्मण | पाणिनि द्वारा उल्लिखित आचार्य। |
| 18 | भारद्वाज (वार्तिककार) | कात्यायन से पूर्व के वार्तिक लेखक। |
| 19 | सौनाग | प्राचीन वार्तिककार। |
| 20 | कुणि | अष्टाध्यायी के प्राचीन वृत्तिकार। |
| 21 | माठर | प्राचीन वृत्ति लेखक। |
| 22 | सेनकर | पाणिनि पूर्व आचार्य। |
| 23 | कासकृत्स्न | 'कासकृत्स्न व्याकरण' (मीमांसा और व्याकरण)। |
| 24 | शौनक | ऋक्प्रातिशाख्य (वैदिक व्याकरण)। |
| 25 | पिंगल | छन्दःसूत्र (व्याकरण आधारित पद्य नियम)। |
| क्रम | विद्वान | प्रमुख ग्रंथ/संप्रदाय |
|---|---|---|
| 26 | शर्ववर्मा | 'कातन्त्र व्याकरण' (सरल संस्कृत शिक्षण)। |
| 27 | चन्द्रगोमी | 'चान्द्र व्याकरण' (बौद्ध वैयाकरण, अष्टाध्यायी का संशोधन)। |
| 28 | देवनन्दी (पूज्यपाद) | 'जैनेन्द्र व्याकरण' (दिगंबर जैन संप्रदाय)। |
| 29 | भर्तृहरि | 'वाक्यपदीय' (व्याकरण दर्शन) एवं महाभाष्य दीपिका। |
| 30 | वामन | 'काशिका वृत्ति' (अष्टाध्यायी की सर्वश्रेष्ठ टीका)। |
| 31 | जयादित्य | 'काशिका वृत्ति' (वामन के सहयोगी)। |
| 32 | जिनेन्द्रबुद्धि | 'काशिका विवरण पंजिका' (न्यास)। |
| 33 | शाकटायन (पाल्यकीर्ति) | 'शाकटायन व्याकरण' (अमोघवर्ष के समय)। |
| 34 | हेमचन्द्र सूरी | 'सिद्धहेमशब्दानुशासन' (प्राकृत और संस्कृत व्याकरण)। |
| 35 | भोजराज | 'सरस्वतीकंठाभरण' (व्याकरण ग्रंथ)। |
| 36 | क्रमदीश्वर | 'संक्षिप्तसार व्याकरण' (जौमार संप्रदाय)। |
| 37 | अनुभूतिस्वरूपाचार्य | 'सारस्वत व्याकरण' (मध्यकाल में अत्यंत लोकप्रिय)। |
| 38 | बोपदेव | 'मुग्धबोध व्याकरण' (बंगाल में प्रचलित)। |
| 39 | कैयट | 'प्रदीप' (महाभाष्य की सबसे प्रामाणिक टीका)। |
| 40 | हरदत्त मिश्र | 'पदमंजरी' (काशिका की टीका)। |
| 41 | क्षीरस्वामी | 'क्षीरतरंगिणी' (धातुपाठ की व्याख्या)। |
| 42 | हेलाराज | वाक्यपदीय की टीका। |
| 43 | पुण्यराज | वाक्यपदीय टीकाकार। |
| 44 | मैत्रेय रक्षित | 'तन्त्रप्रदीप' (न्यास की टीका)। |
| 45 | शरणदेव | 'दुर्घटवृत्ति' (कठिन शब्दों की सिद्धि)। |
| 46 | वर्धन | 'गणरत्नमहोदधि' (गणपाठ)। |
| 47 | हलायुध | 'कविरहस्य' (धातु रूप)। |
| 48 | पुरुषोत्तमदेव | 'भाषावृत्ति' (लघुपाणिनीय प्रयोग)। |
| 49 | सीरदेव | 'परिभाषावृत्ति' (व्याकरण परिभाषाएँ)। |
| 50 | पद्मनाभदत्त | 'सुपद्म व्याकरण' (मैथिल परंपरा)। |
| क्रम | आचार्य | प्रमुख ग्रंथ/योगदान |
|---|---|---|
| 51 | धर्मकीर्ति | 'रूपावतार' (प्रक्रिया पद्धति के जनक)। |
| 52 | रामचन्द्र | 'प्रक्रियाकौमुदी' (सिद्धांतकौमुदी की पूर्वपीठिका)। |
| 53 | विट्ठल आचार्य | 'प्रसाद' (प्रक्रियाकौमुदी की टीका)। |
| 54 | भट्टोजि दीक्षित | 'वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी' (व्याकरण का सर्वाधिक प्रचलित ग्रंथ)। |
| 55 | वरदराज | 'लघुसिद्धान्तकौमुदी' (संस्कृत छात्रों का प्रथम ग्रंथ)। |
| 56 | कौण्डभट्ट | 'वैयाकरणभूषणसार' (व्याकरण दर्शन)। |
| 57 | नागेश भट्ट | 'लघुशब्देन्दुशेखर', 'परिभाषेन्दुशेखर' (नव्य व्याकरण के युगपुरूष)। |
| 58 | ज्ञानेन्द्र सरस्वती | 'तत्त्वबोधिनी' (सिद्धांतकौमुदी की टीका)। |
| 59 | वासुदेव दीक्षित | 'बालमनोरमा' (सिद्धांतकौमुदी की सरल टीका)। |
| 60 | हरि दीक्षित | 'शब्दरत्न' (प्रौढ़मनोरमा की व्याख्या)। |
| 61 | रंगोजि भट्ट | भट्टोजि दीक्षित के भ्राता एवं टीकाकार। |
| 62 | अप्पय दीक्षित | व्याकरण और मीमांसा के समन्वयकर्ता। |
| 63 | नारायण भट्ट | 'प्रक्रियासर्वस्व' (केरल व्याकरण परंपरा)। |
| 64 | नीलकंठ वाजपेयी | परिभाषावृत्ति टीकाकार। |
| 65 | वैद्यनाथ पायगुंडे | नागेश भट्ट के शिष्य (गदा टीका)। |
| 66 | भैरव मिश्र | 'भैरवी' टीका (लघुशब्देन्दुशेखर)। |
| 67 | राघवन्द्रान्दाचार्य | 'विषमी' टीका। |
| 68 | सदाशिव भट्ट | नागेश परंपरा के विद्वान। |
| 69 | कृष्णमित्र | 'रत्नार्णव' टीका। |
| 70 | शेष श्रीकृष्ण | प्रक्रिया परंपरा के आचार्य। |
| 71 | रामशरण तर्करत्न | व्याकरण में न्याय शैली का प्रयोग। |
| 72 | जयकृष्ण मौनी | विभक्त्यर्थ निर्णय। |
| 73 | मदाध्वरि | व्याकरण दीपिका। |
| 74 | अन्नंभट्ट | व्याकरण मिताक्षरा (पाणिनीय सूत्रों पर)। |
| 75 | विश्वेश्वर पाण्डेय | व्याकरण सिद्धांत सुधानिधि। |
| क्रम | विद्वान | प्रमुख योगदान |
|---|---|---|
| 76 | फ्रेडरिक कीलहॉर्न | महाभाष्य का वैज्ञानिक संपादन। |
| 77 | पं. गुरुपद हालदार | व्याकरण दर्शन का इतिहास। |
| 78 | श्रीपाद दामोदर सातवलेकर | वैदिक व्याकरण का सरल प्रस्तुतीकरण। |
| 79 | चारुदेव शास्त्री | 'व्याकरण चन्द्रोदय' एवं 'शब्दअपशब्दविवेक'। |
| 80 | पं. युधिष्ठिर मीमांसक | 'संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास' (3 भाग)। |
| 81 | के.वी. अभ्यंकर | 'Dictionary of Sanskrit Grammar' (मानक संदर्भ)। |
| 82 | स्वामी दयानंद सरस्वती | 'वेदांगप्रकाश' (अष्टाध्यायी का पुनरुद्धार)। |
| 83 | पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु | अष्टाध्यायी भाष्य (हिंदी में विस्तृत व्याख्या)। |
| 84 | कपिल देव द्विवेदी | 'रचनानुवादकौमुदी' (अनुवाद के माध्यम से व्याकरण)। |
| 85 | सत्यव्रत शास्त्री | व्याकरण और काव्य का समन्वय। |
| 86 | राम नाथ वेदालंकार | अष्टाध्यायी के गूढ़ सूत्रों पर शोध। |
| 87 | रघुवीर वेदालंकार | व्याकरण महाभाष्य का हिंदी अनुवाद। |
| 88 | भीमसेन शास्त्री | 'लघुसिद्धान्तकौमुदी' की भैमी व्याख्या (सर्वश्रेष्ठ हिंदी टीका)। |
| 89 | पुष्पा दीक्षित | 'अष्टाध्यायी सहज बोध' (पाणिनि को सिखाने की नवीन विधि)। |
| 90 | एस.डी. जोशी | महाभाष्य का अंग्रेजी अनुवाद और शोध। |
| 91 | जॉर्ज कार्डोना | 'Panini: His Work and its Traditions' (वैश्विक शोध)। |
| 92 | विश्वनाथ झा | व्याकरण दर्शन पर शोध। |
| 93 | दीप्ति त्रिपाठी | व्याकरण और भाषाविज्ञान का तुलनात्मक अध्ययन। |
| 94 | राममूर्ति शर्मा | वाक्यपदीय पर आधुनिक विमर्श। |
| 95 | अशोक आकलुजकर | भर्तृहरि और व्याकरण दर्शन पर वैश्विक कार्य। |
| 96 | जानकी प्रसाद द्विवेद | कातंत्र व्याकरण शोध। |
| 97 | रेवाप्रसाद द्विवेदी | कालिदास की नन्दिनी टीका (व्याकरण सम्मत)। |
| 98 | भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी | 'धातुार्थनिर्देश' (धातुओं का वैज्ञानिक अर्थ)। |
| 99 | गोविंद चंद्र पांडे | व्याकरण और संस्कृति संबंध। |
| 100 | वशिष्ठ त्रिपाठी | नव्य व्याकरण और न्याय का समन्वय। |
व्याकरण केवल भाषा को शुद्ध करने का साधन नहीं, अपितु यह मोक्ष का द्वार (अपवर्गस्य सोपानम्) है। भगवान शिव के डमरू से निकले 14 सूत्रों से लेकर पुष्पा दीक्षित की आधुनिक शिक्षण पद्धति तक—यह यात्रा भारत की बौद्धिक संपदा का प्रमाण है।
उपरोक्त 100 विद्वानों की सूची यह दर्शाती है कि किस प्रकार एक सूत्र (Rule) को समझाने के लिए सहस्त्रों वर्षों तक चिंतन चलता रहा। पाणिनि ने जो बीज बोया, उसे पतंजलि ने वृक्ष बनाया और भट्टोजि दीक्षित व नागेश ने उसे फलदार बनाया। **भगवत दर्शन** का यह संकलन उन सभी साधकों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है जिन्होंने संस्कृत को विश्व की सबसे परिष्कृत भाषा बनाए रखा।

