आचार्य भारतीतीर्थ मुनि: अद्वैत और तर्कशास्त्र के शिखर, 'न्यायमाला' के रचयिता और विद्यारण्य के सखा | Acharya Bharatitirtha

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य भारतीतीर्थ मुनि: भारतीय तर्कशास्त्र (न्याय) और वेदांत के महासूर्य

आचार्य भारतीतीर्थ मुनि: भारतीय तर्कशास्त्र (न्याय) और वेदांत के महासूर्य

भारतीय दर्शन के इतिहास में 'भरत' नाम से यदि किसी दार्शनिक और तार्किक (Logician) को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, तो वे 14वीं शताब्दी के महान आचार्य भारतीतीर्थ मुनि (Bharatitirtha Muni) हैं। वे विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक विद्यारण्य स्वामी (माधवाचार्य) के गुरुभाई और सहकर्मी थे। उन्होंने तर्कशास्त्र (Logic) का उपयोग वेदों और उपनिषदों के सही अर्थ निर्णय में किया। उनकी कृतियाँ 'न्यायमाला' (तर्कों की माला) नाम से प्रसिद्ध हैं। वे केवल भक्त नहीं, बल्कि एक प्रखर बुद्धिवादी (Intellectual) संत थे।

📌 आचार्य भारतीतीर्थ मुनि: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
नाम आचार्य भारतीतीर्थ मुनि (Acharya Bharatitirtha Muni)
उपाधि जगद्गुरु (श्रृंगेरी पीठ), महातार्किक
काल 14वीं शताब्दी (लगभग 1328–1380 ईस्वी)
समकालीन विद्यारण्य स्वामी (माधवाचार्य), सायण
प्रमुख ग्रंथ वैयासिक न्यायमाला, जैमिनीय न्यायमाला विस्तर, पंचदशी, विवरण-प्रमेय-संग्रह
दर्शन अद्वैत वेदांत (Advaita) और पूर्व-मीमांसा
विशेष योगदान वेदांत और मीमांसा को 'न्याय' (तर्क) की शैली में प्रस्तुत करना

2. जीवन परिचय: विद्यारण्य और श्रृंगेरी पीठ

आचार्य भारतीतीर्थ का जन्म 14वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में हुआ था। वे आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित श्रृंगेरी शारदा पीठ के 11वें जगद्गुरु बने। उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनकी मित्रता और सहकार्य विद्यारण्य स्वामी (जिन्होंने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की) के साथ था।

कहा जाता है कि भारतीतीर्थ और विद्यारण्य एक ही सिक्के के दो पहलू थे। जहाँ विद्यारण्य ने राजनीति और धर्म की रक्षा की, वहीं भारतीतीर्थ ने शास्त्रों के गूढ़ रहस्यों को सुलझाने का कार्य किया। उन्होंने अपना पूरा जीवन 'तर्क' और 'अनुभूति' के बीच सेतु बनाने में व्यतीत किया।

3. वैयासिक न्यायमाला: वेदांत का तर्कशास्त्र

भारतीतीर्थ मुनि की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने 'न्याय' (Logic/Reasoning) को दर्शन का आधार बनाया। उनकी कृति 'वैयासिक न्यायमाला' (Vaiyasika Nyayamala) ब्रह्मसूत्रों पर आधारित एक अद्वितीय ग्रंथ है।

न्याय (अधिकरण) पद्धति

उन्होंने प्रत्येक दार्शनिक समस्या को सुलझाने के लिए एक वैज्ञानिक पद्धति अपनाई जिसे 'अधिकरण' कहते हैं। इसमें 5 चरण होते हैं:

  1. विषय: समस्या क्या है? (Topic)
  2. विशय (संशय): संदेह क्या है? (Doubt)
  3. पूर्वपक्ष: विरोधी का तर्क क्या है? (Opponent's View)
  4. उत्तरपक्ष (सिद्धांत): सही तर्क क्या है? (Final Conclusion)
  5. संगति: इसका पिछले विषय से क्या संबंध है? (Connection)
इस पद्धति से उन्होंने वेदांत के सबसे जटिल प्रश्नों को सुलझाया।

4. जैमिनीय न्यायमाला: कर्मकांड की मीमांसा

केवल वेदांत ही नहीं, भारतीतीर्थ ने 'पूर्व-मीमांसा' (Ritualistic Philosophy) पर भी 'जैमिनीय न्यायमाला विस्तर' नामक ग्रंथ लिखा। यह ग्रंथ इतना महत्वपूर्ण है कि आज भी मीमांसा दर्शन के छात्रों के लिए यह 'बाइबल' के समान है। इसमें उन्होंने वेदों के कर्मकांड भाग (यज्ञ, विधि, निषेध) की तार्किक व्याख्या की।

5. पंचदशी: अद्वैत का विश्वकोश

भारतीतीर्थ मुनि का सबसे लोकप्रिय ग्रंथ 'पंचदशी' (Panchadasi) है। यह अद्वैत वेदांत का सबसे सरल और प्रामाणिक प्रकरण ग्रंथ माना जाता है। इसमें 15 अध्याय (पंचदश) हैं।

  • सह-लेखन: विद्वानों का मत है कि इसके पहले 10 अध्याय (विवेक-पंचक और दीप-पंचक) भारतीतीर्थ ने लिखे और अंतिम 5 अध्याय (आनंद-पंचक) विद्यारण्य ने लिखे।
  • दर्शन: इसमें उन्होंने 'माया' और 'ब्रह्म' के संबंध को समझाने के लिए 'चित्रदीप' (Canvas and Picture) का सुंदर दृष्टांत दिया। जैसे कैनवास पर चित्र होता है, वैसे ही ब्रह्म पर जगत का चित्र है।

6. दृग्-दृश्य-विवेक: चेतना का विज्ञान

'दृग्-दृश्य-विवेक' (Seer-Seen Discrimination) एक छोटा लेकिन अत्यंत गहरा ग्रंथ है, जिसका श्रेय भारतीतीर्थ को जाता है। इसमें उन्होंने चेतना (Consciousness) के मनोविज्ञान को समझाया है:
"रूपं दृश्यं लोचनं दृक, तद् दृश्यं दृक्तु मानसम्..."
(नेत्र 'द्रष्टा' है और रूप 'दृश्य' है। फिर मन 'द्रष्टा' है और नेत्र 'दृश्य' है। अंत में साक्षी आत्मा 'द्रष्टा' है और मन 'दृश्य' है। आत्मा को कोई नहीं देख सकता, वह स्वयं प्रकाश है।)

7. निष्कर्ष: भारतीतीर्थ की अमर विरासत

आचार्य भारतीतीर्थ मुनि ने सिद्ध किया कि 'भरत' नाम केवल कला (भरतमुनि) या वैराग्य (जड़भरत) का ही नहीं, बल्कि तीक्ष्ण बुद्धि और तर्क (Logic) का भी प्रतीक है। उन्होंने शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन को 'भक्ति' या 'आस्था' तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे कठोर तर्कों की कसौटी पर कसकर 'अकाट्य' बना दिया।

आज जब हम वेदांत पढ़ते हैं और उसमें तार्किक स्पष्टता पाते हैं, तो हम आचार्य भारतीतीर्थ मुनि के ऋणी होते हैं। वे भारतीय दर्शन के आकाश में एक ऐसे नक्षत्र हैं जो ज्ञान और तर्क दोनों से प्रकाशमान हैं।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • वैयासिक न्यायमाला - भारतीतीर्थ मुनि।
  • पंचदशी - (रामकृष्ण मिशन प्रकाशन)।
  • विवरण-प्रमेय-संग्रह - (अद्वैत सिद्धि के तर्क)।
  • Sringeri Sharada Peetham History.
विशेष नोट: यदि आपका आशय न्याय-दर्शन के आचार्य 'उद्योतकर' (जिन्हें भारद्वाज भी कहा जाता है) से था, तो वे न्याय-वार्तिक के रचयिता हैं। परंतु नाम की समानता (भरत-मुनि) के आधार पर भारतीतीर्थ मुनि ही 'दर्शन और तर्कशास्त्र' के लिए सर्वाधिक उपयुक्त और प्रसिद्ध 'भरत' नामधारी विद्वान हैं।

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