महामहोपाध्याय वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर: आधुनिक भारत के 'न्याय-केसरी' और दार्शनिक ऋषि
जब भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार हो रहा था और पारंपरिक गुरुकुल परंपरा क्षीण हो रही थी, तब पुणे (महाराष्ट्र) में एक ऐसा विद्वान खड़ा था जो ज्ञान का हिमालय था। वे थे—महामहोपाध्याय वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर (Vasudev Shastri Abhyankar)। वे 19वीं और 20वीं सदी के संधि-काल में भारतीय दर्शन (विशेषकर न्याय, मीमांसा और अद्वैत वेदांत) के सबसे प्रामाणिक प्रवक्ता थे। उन्होंने लोकमान्य तिलक और डॉ. राधाकृष्णन जैसे दिग्गजों के साथ भी शास्त्रार्थ किया और पारंपरिक 'शास्त्रीय पांडित्य' को आधुनिक विश्वविद्यालयी शिक्षा (फर्ग्यूसन कॉलेज) में प्रतिष्ठित किया।
| पूरा नाम | वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर (Vasudev Shastri Abhyankar) |
| उपाधि | महामहोपाध्याय (सरकार द्वारा प्रदत्त), न्याय-केसरी |
| काल | 1863 – 1942 ईस्वी |
| कार्यक्षेत्र | पुणे, महाराष्ट्र (फर्ग्यूसन कॉलेज) |
| गुरु | राम शास्त्री आप्टे (न्याय), भास्कर शास्त्री ओक |
| विशेषज्ञता | न्याय, पूर्व-मीमांसा, अद्वैत वेदांत |
| प्रमुख ग्रंथ | अद्वैतमोद (Advaitamoda), धर्मतत्वनिर्णय, सूत्रभाष्य टीका |
2. जीवन परिचय: सतारा से पुणे तक
वासुदेव शास्त्री का जन्म 1863 में सतारा (महाराष्ट्र) के एक कुलीन कोकणस्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता भी एक वैदिक विद्वान थे। बचपन से ही उनकी बुद्धि अत्यंत कुशाग्र थी।
उस समय पुणे संस्कृत विद्या का केंद्र था। वासुदेव शास्त्री ने पुणे आकर प्रसिद्ध विद्वान राम शास्त्री आप्टे के चरणों में बैठकर 'न्याय शास्त्र' (Logic) का गहन अध्ययन किया। उन्होंने इतनी निष्ठा से विद्या ग्रहण की कि वे शीघ्र ही अपने गुरु के सबसे प्रिय शिष्य और उत्तराधिकारी बन गए। बाद में उन्होंने भास्कर शास्त्री ओक से वेदांत की शिक्षा ली।
3. अद्भुत पांडित्य: न्याय और वेदांत का संगम
वासुदेव शास्त्री की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल 'तोता-रटंत' पंडित नहीं थे। उनका ज्ञान विश्लेषणात्मक (Analytical) था।
वे 'नव्य-न्याय' की कठिन से कठिन गुत्थियों को चुटकियों में सुलझा देते थे। लोकमान्य तिलक जब अपना ग्रंथ 'गीतारहस्य' लिख रहे थे, तो वे कई बार दार्शनिक बिंदुओं पर चर्चा करने के लिए वासुदेव शास्त्री के पास आते थे। कहा जाता है कि वासुदेव शास्त्री तिलक के 'कर्मयोग' से पूरी तरह सहमत नहीं थे और अद्वैत वेदांत के 'संन्यास' पक्ष का समर्थन करते थे, फिर भी दोनों में गहरा सम्मान था।
4. फर्ग्यूसन कॉलेज: प्रोफेसर और 'शास्त्री'
यद्यपि उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा नहीं ली थी, फिर भी उनकी विद्वता को देखते हुए फर्ग्यूसन कॉलेज (पुणे) ने उन्हें संस्कृत का प्रोफेसर नियुक्त किया। यह एक दुर्लभ सम्मान था।
कॉलेज में वे धोती, कुर्ता और पुणेरी पगड़ी पहनकर कक्षा में जाते थे। उनके पढ़ाने का तरीका इतना रोचक था कि आधुनिक छात्र भी मंत्रमुग्ध हो जाते थे। वे छात्रों को सिखाते थे कि "पाश्चात्य दर्शन (Western Philosophy) अच्छा है, लेकिन भारतीय दर्शन की गहराई (Depth) उससे कहीं अधिक है।" 1921 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 'महामहोपाध्याय' की उपाधि से सम्मानित किया, जो उस समय विद्वानों का सर्वोच्च सम्मान था।
5. प्रमुख कृतियाँ: अद्वैतमोद और धर्मतत्वनिर्णय
वासुदेव शास्त्री ने संस्कृत साहित्य को कई मौलिक ग्रंथ और टीकाएँ दीं:
- अद्वैतमोद (Advaitamoda): यह उनका सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसमें उन्होंने रामानुज, मध्व और निम्बार्क जैसे द्वैतवादी आचार्यों के तर्कों का खंडन करके 'शंकराचार्य' के अद्वैत मत को पुनः स्थापित किया। इसकी भाषा और तर्क शैली प्राचीन नैयायिकों जैसी है।
- धर्मतत्वनिर्णय: इसमें उन्होंने 'धर्म' क्या है, इस पर विस्तृत मीमांसा की। उन्होंने बाल-विवाह और अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों पर भी शास्त्र-सम्मत विचार रखे, जो उस समय के रूढ़िवादी समाज के लिए क्रांतिकारी थे।
- टीका साहित्य: उन्होंने 'सिद्धांतबिन्दु', 'मीमांसान्यायप्रकाश' और 'सर्वदर्शनसंग्रह' पर विद्वतापूर्ण टीकाएँ लिखीं जो आज भी शोध छात्रों के लिए आधार ग्रंथ हैं।
6. दार्शनिक विचार: तर्क और आस्था
वासुदेव शास्त्री मूलतः 'समन्वयवादी' थे। उनका मानना था कि:
- तर्क (Logic) साधन है, साध्य नहीं: न्याय शास्त्र का उपयोग बुद्धि को तीक्ष्ण करने के लिए होना चाहिए, लेकिन अंतिम सत्य 'अनुभूति' (Experience) से ही मिलता है।
- वेदांत सर्वोच्च है: वे मानते थे कि न्याय और मीमांसा अंततः वेदांत (अद्वैत) की ओर ही ले जाते हैं।
- समाज सुधार: वे शास्त्रों की आड़ में अधर्म (कुरीतियों) को छिपाने के विरोधी थे। उनका कहना था कि "शास्त्र समय के साथ व्याख्या की मांग करते हैं।"
7. निष्कर्ष: एक युग का अंत
1942 में जब महामहोपाध्याय वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर का निधन हुआ, तो विद्वानों ने कहा—"आज पुणे का सूर्य अस्त हो गया।" उनके पुत्र काशीनाथ वासुदेव अभ्यंकर (K.V. Abhyankar) ने भी उनकी विरासत को आगे बढ़ाया और व्याकरण के महान विद्वान बने (उन्होंने महाभाष्य का संपादन किया)।
वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर उस पीढ़ी के अंतिम प्रतिनिधि थे जो सुबह उठकर संध्या-वंदन करती थी, दोपहर में छात्रों को पाणिनी और कणाद पढ़ाती थी, और शाम को नए जमाने के सुधारकों से तर्क करती थी। वे आधुनिक भारत में प्राचीन प्रज्ञा के जीवित विग्रह थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- अद्वैतमोद - म.म. वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर (आनंदाश्रम मुद्रणालय)।
- धर्मतत्वनिर्णय - वासुदेव शास्त्री अभ्यंकर।
- Studies in Indian Philosophy - (Edited works mentioning Abhyankar Shastri).
- पुणे की विद्वत परंपरा - एक ऐतिहासिक सर्वेक्षण।
