आचार्य चंद्रकीर्ति: शून्यवाद के 'चंद्रमा', नालंदा के महागुरु और प्रासंगिक मत के प्रवर्तक | Acharya Chandrakirti

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य चंद्रकीर्ति: माध्यमिक दर्शन के सर्वोच्च व्याख्याता और महान तार्किक

आचार्य चंद्रकीर्ति: माध्यमिक दर्शन के 'चंद्रमा', नालंदा के महागुरु और प्रासंगिक मत के प्रवर्तक

बौद्ध दर्शन के इतिहास में यदि नागार्जुन को 'सूर्य' माना जाता है, तो आचार्य चंद्रकीर्ति (Chandrakirti) को उस सूर्य की रोशनी फैलाने वाला 'चंद्रमा' कहा जाता है। 7वीं शताब्दी के इस महान दार्शनिक ने नागार्जुन के शून्यवाद को इतनी स्पष्टता और तार्किकता के साथ प्रस्तुत किया कि आज भी तिब्बती बौद्ध धर्म में चंद्रकीर्ति का मत ही सर्वोच्च और अंतिम सत्य माना जाता है। वे नालंदा विश्वविद्यालय के कुलगुरु थे और उन्होंने अपने समकालीन तार्किकों (जैसे भावविवेक) की त्रुटियों को सुधारकर 'प्रासंगिक माध्यमिक' (Prasangika Madhyamaka) शाखा को स्थापित किया।

📌 आचार्य चंद्रकीर्ति: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम आचार्य चंद्रकीर्ति (Acharya Chandrakirti)
उपाधि महापंडित, नालंदा के कुलगुरु, शून्यवाद के व्याख्याता
काल 7वीं शताब्दी (लगभग 600–650 ईस्वी)
जन्म स्थान समंत, दक्षिण भारत (South India)
गुरु आचार्य कमलवुद्धि (बुद्धपालित के शिष्य)
दर्शन प्रासंगिक माध्यमिक (Prasangika Madhyamaka)
प्रमुख ग्रंथ प्रसन्नपदा, मध्यमकअवतार, चतुःशतक टीका

2. जीवन परिचय: दक्षिण भारत से नालंदा तक

आचार्य चंद्रकीर्ति का जन्म दक्षिण भारत के 'समंत' नामक राज्य में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे वेदों और शास्त्रों में पारंगत थे, लेकिन उनकी जिज्ञासा उन्हें बौद्ध धर्म की ओर ले गई। वे दक्षिण भारत से चलकर मगध (बिहार) आए और विश्वविख्यात नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया।

नालंदा में उन्होंने आचार्य कमलवुद्धि से शिक्षा प्राप्त की, जो स्वयं आचार्य बुद्धपालित के शिष्य थे। चंद्रकीर्ति ने नागार्जुन के ग्रंथों का इतना गहरा अध्ययन किया कि वे शीघ्र ही नालंदा के सबसे बड़े विद्वान बन गए और अंततः उन्हें नालंदा का महास्थविर (Abbot/कुलगुरु) चुना गया। उनका पूरा जीवन अध्यापन, लेखन और शास्त्रार्थ में व्यतीत हुआ।

3. प्रासंगिक मत: तर्क की नई शैली

चंद्रकीर्ति का सबसे बड़ा योगदान 'प्रासंगिक' (Prasangika) मत की स्थापना है। उस समय माध्यमिक दर्शन दो खेमों में बंट गया था:

  • स्वातंत्रिक (Svatantrika): इसका नेतृत्व भावविवेक (Bhavaviveka) कर रहे थे। उनका मानना था कि शून्यता को सिद्ध करने के लिए हमें अपने 'स्वतंत्र तर्कों' (Independent Logic) का उपयोग करना चाहिए।
  • प्रासंगिक (Prasangika): चंद्रकीर्ति ने बुद्धपालित का पक्ष लेते हुए भावविवेक का खंडन किया।
प्रसंग (Reductio ad absurdum) क्या है?

चंद्रकीर्ति का तर्क था: "एक माध्यमिक (शून्यवादी) का अपना कोई 'पक्ष' या 'सिद्धांत' नहीं होता। यदि हम अपना कोई तर्क देंगे, तो हम भी द्वैतवाद में फंस जाएंगे।"

अतः, सत्य को सिद्ध करने का एकमात्र तरीका है—विपक्षी के ही तर्कों का उपयोग करके उसे गलत साबित करना। इसे 'प्रसंग' कहते हैं। यानी, सामने वाले की बात मानकर उसे उसी की बात में फंसा देना और दिखाना कि उसका तर्क बेतुका (Absurd) है।

4. प्रसन्नपदा: 'स्पष्ट शब्दों' की व्याख्या

चंद्रकीर्ति की अमर कीर्ति का आधार उनका ग्रंथ 'प्रसन्नपदा' (Prasannapada) है। यह नागार्जुन की 'मूलमाध्यमककारिका' पर लिखी गई सबसे प्रामाणिक टीका है।

'प्रसन्नपदा' का अर्थ है—"स्पष्ट शब्दों वाली"। नागार्जुन की कारिकाएं अत्यंत संक्षिप्त और गूढ़ थीं। चंद्रकीर्ति ने उन्हें सरल संस्कृत में समझाया। इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि इसमें केवल शुष्क तर्क नहीं हैं, बल्कि यह साहित्यिक सौंदर्य से भी भरा है। यह ग्रंथ आज भी हमें मूल संस्कृत में उपलब्ध है और बौद्ध दर्शन को समझने की कुंजी है।

5. मध्यमक-अवतार: शून्यता में प्रवेश

यह चंद्रकीर्ति का एक स्वतंत्र ग्रंथ है, जिसे 'मध्यमकअवतार' (Introduction to the Middle Way) कहते हैं। यह ग्रंथ विशेष रूप से तिब्बती बौद्ध धर्म में बहुत पूजनीय है।

इसमें उन्होंने एक 'बोधिसत्व' (मुक्ति का साधक) की यात्रा का वर्णन किया है। वे बताते हैं कि कैसे एक साधक दस भूमियों (Stages of Bodhisattva) को पार करते हुए शून्यता के ज्ञान तक पहुँचता है।

  • करुणा और प्रज्ञा: चंद्रकीर्ति लिखते हैं कि शून्यता का ज्ञान बिना 'महाकरुणा' (Great Compassion) के खतरनाक हो सकता है। पक्षी को उड़ने के लिए दो पंखों की जरूरत होती है—एक 'ज्ञान' (Wisdom) का और दूसरा 'उपाय' (Method/Compassion) का।
  • अहंकार का नाश: वे सिखाते हैं कि जब तक 'मैं' और 'मेरा' का भाव है, तब तक मुक्ति असंभव है। शून्यता का अर्थ ही है—अहंकार का पूर्ण विसर्जन।

6. दो सत्य: संवृति और परमार्थ

चंद्रकीर्ति ने 'द्विसत्य' (Two Truths) के सिद्धांत को बहुत गहराई से समझाया:

  1. संवृति सत्य (Conventional Truth): यह वह दुनिया है जिसे हम अपनी इंद्रियों से देखते हैं। यह व्यावहारिक रूप से सत्य है। जैसे—पानी प्यास बुझाता है, आग जलाती है। चंद्रकीर्ति कहते हैं कि व्यवहार में हमें इन नियमों का पालन करना चाहिए, इन्हें नकारना नहीं चाहिए।
  2. परमार्थ सत्य (Ultimate Truth): यह चीजों की वास्तविक प्रकृति है—शून्यता। परमार्थ की दृष्टि से न कोई पानी है, न आग, न जन्म, न मृत्यु। सब कुछ स्वभाव से शून्य है।

चंद्रकीर्ति की महानता यह है कि उन्होंने दोनों सत्यों के बीच संतुलन बनाया। उन्होंने कहा—"परमार्थ को पाने के लिए संवृति (व्यवहार) सीढ़ी है। बिना सीढ़ी के छत पर नहीं चढ़ा जा सकता।"

7. चमत्कारिक प्रसंग: चित्र की गाय से दूध

चंद्रकीर्ति केवल एक तार्किक नहीं थे, बल्कि एक उच्च कोटि के सिद्ध भी थे। उनके जीवन से जुड़ी कई किंवदंतियाँ नालंदा में प्रचलित थीं।

चित्र की गाय का दूध

एक बार नालंदा में भिक्षुओं के लिए दूध की कमी हो गई। चंद्रकीर्ति ने दीवार पर बनी एक गाय के चित्र (Painting) की ओर देखा और उसे वास्तविक मानकर दुहना शुरू कर दिया। चमत्कारिक रूप से उस चित्र की गाय से दूध की धारा बह निकली और पूरे संघ ने वह दूध पिया।

इस घटना का दार्शनिक अर्थ यह था कि—"जब सब कुछ शून्य (Empty) है, तो 'चित्र' और 'वास्तविकता' में कोई तात्विक भेद नहीं है। एक सिद्ध योगी के लिए सब कुछ संभव है।"

एक अन्य घटना में, जब नालंदा पर तुर्कों या लुटेरों का आक्रमण हुआ, तो चंद्रकीर्ति ने एक पत्थर के शेर की मूर्ति को जीवित कर दिया, जिसने आक्रमणकारियों को भगा दिया।

8. निष्कर्ष: चंद्रकीर्ति की वैश्विक विरासत

आचार्य चंद्रकीर्ति का प्रभाव भारत में तो रहा ही, लेकिन तिब्बत में वे 'दूसरे बुद्ध' के समान पूजे जाते हैं। 14वीं शताब्दी में तिब्बत के महान सुधारक जे चोंखापा (Je Tsongkhapa) ने अपने पूरे दर्शन का आधार चंद्रकीर्ति के ग्रंथों को ही बनाया। आज दलाई लामा और सभी प्रमुख तिब्बती लामा चंद्रकीर्ति के मत का ही अनुसरण करते हैं।

चंद्रकीर्ति ने हमें सिखाया कि तर्क का अंतिम उद्देश्य तर्क को ही शांत कर देना है। जब बुद्धि सभी तर्कों को काट देती है, तब जो 'मौन' शेष रहता है, वही सत्य है। वे नालंदा के गौरव थे और उनका 'प्रासंगिक' मत आज भी दर्शनशास्त्र की दुनिया में सबसे तीक्ष्ण और अजेय माना जाता है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • प्रसन्नपदा - आचार्य चंद्रकीर्ति (संस्कृत एवं हिंदी अनुवाद)।
  • Madhyamakavatara (Introduction to the Middle Way) - Translation mainly available in Tibetan/English.
  • The Central Philosophy of Buddhism - T.R.V. Murti.
  • बौद्ध दर्शन के महान आचार्य - राहुल सांकृत्यायन।
  • Resurrecting Candrakirti - Kevin A. Vose.

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