महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव: असम के सांस्कृतिक सूर्य, 'एकशरण नाम धर्म' के प्रवर्तक और बहुमुखी प्रतिभा के धनी
भारतवर्ष के पूर्वोत्तर में, ब्रह्मपुत्र की पावन घाटी में 15वीं शताब्दी में एक ऐसे महापुरुष का उदय हुआ, जिसने न केवल भक्ति की धारा बहाई, बल्कि पूरी असमिया जाति, साहित्य, संगीत और संस्कृति को एक सूत्र में पिरो दिया। वे थे महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव (Srimanta Sankardev)। वे एक संत, समाज सुधारक, कवि, नाटककार, संगीतज्ञ और चित्रकार थे। यदि तुलसीदास ने उत्तर भारत को रामचरितमानस दिया, तो शंकरदेव ने असम को 'कीर्तन-घोषा' और 'नामघर' दिया। उनका जीवन 'भक्ति' और 'कला' के अद्भुत संगम का प्रतीक है।
- 1. प्रस्तावना: असमिया अस्मिता के जनक
- 2. जन्म और बाल्यकाल: अलियपुखुरी का चमत्कार
- 3. तीर्थाटन और दर्शन का निर्माण
- 4. एकशरण नाम धर्म: एकेश्वरवाद की क्रांति
- 5. सांस्कृतिक योगदान: सत्र, नामघर और बोरगीत
- 6. मणिकांचन योग: माधवदेव से मिलन
- 7. साहित्यिक संपदा: कीर्तन घोषा और अंकिया नाट
- 8. समाज सुधार: जातिविहीन समाज का स्वप्न
- 9. निष्कर्ष: शंकरदेव की अमर विरासत
| पूरा नाम | श्रीमंत शंकरदेव (Srimanta Sankardev) |
| उपाधि | महापुरुष, जगतगुरु, असमिया संस्कृति के पितामह |
| काल | 1449 – 1568 ईस्वी (119 वर्ष का दीर्घ जीवन) |
| जन्म स्थान | अलियपुखुरी, बोरदोवा (नगाँव, असम) |
| दर्शन | एकशरण नाम धर्म (Neo-Vaishnavism) |
| प्रमुख शिष्य | श्रीश्री माधवदेव (Madhavdev) |
| प्रमुख रचनाएँ | कीर्तन घोषा, दशम, गुणमाला, अंकिया नाट, बोरगीत |
| संस्थापक | सत्र (Sattra) और नामघर (Namghar) संस्था |
2. जन्म और बाल्यकाल: अलियपुखुरी का चमत्कार
श्रीमंत शंकरदेव का जन्म 1449 ईस्वी में मध्य असम के नगाँव जिले के अलियपुखुरी (बोरदोवा) नामक स्थान पर हुआ था। वे शिरोमणि भुइयां (जमींदार) परिवार से थे। उनके पिता का नाम कुसुमवर भुइयां और माता का नाम सत्यसंध्या था। दुर्भाग्यवश, बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया और उनका पालन-पोषण उनकी दादी खेरसूती ने किया।
बचपन में वे अत्यंत चंचल थे, लेकिन उनकी मेधा अलौकिक थी। 12 वर्ष की आयु में जब उन्हें गुरु महेंद्र कंदली के पास पढ़ने भेजा गया, तो उन्होंने प्रवेश करते ही बिना स्वरों (matras) का प्रयोग किए एक अद्भुत कविता लिखी—'करतल कमल कमल दल नयन'। यह उनकी सुप्त प्रतिभा का पहला विस्फोट था।
एक दिन जब बालक शंकर विद्यालय में सो रहे थे, तो एक कोबरा सांप ने आकर अपने फन से उन्हें धूप से बचाया। गुरु महेंद्र कंदली ने यह दृश्य देखा और समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि साक्षात 'शंकर' (शिव) का अवतार है। तभी से उनका नाम 'शंकरदेव' पड़ा।
3. तीर्थाटन और दर्शन का निर्माण
युवावस्था में पत्नी की मृत्यु के बाद, शंकरदेव को संसार से विरक्ति हो गई। उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह कर 1481 ईस्वी में एक लंबी तीर्थयात्रा (Baro-Bhutia Tirtha) शुरू की। वे 12 वर्षों तक पूरे भारत में घूमते रहे।
उन्होंने पुरी, काशी, वृंदावन, मथुरा, कुरुक्षेत्र और रामेश्वरम की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने पूरे भारत में चल रही भक्ति धारा को समझा। कबीर, नामदेव और रामानुज के दर्शन का प्रभाव उन पर पड़ा। जब वे असम लौटे, तो उनके पास एक स्पष्ट दृष्टि थी—"एक ऐसे धर्म की स्थापना जो जाति-पाति से मुक्त हो और जिसमें कर्मकांडों का आडंबर न हो।"
4. एकशरण नाम धर्म: एकेश्वरवाद की क्रांति
शंकरदेव ने जिस धर्म की स्थापना की, उसे 'एकशरण नाम धर्म' (Ekasarana Naam Dharma) कहा जाता है। इसका मूल मंत्र है—
"एक देव, एक सेव, एक बिने नाहि केव"
(ईश्वर एक है, सेवा उसी एक की करनी चाहिए, उसके बिना और कोई नहीं)।
- कृष्ण ही परब्रह्म: उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण (विष्णु) को ही एकमात्र आराध्य माना।
- मूर्ति पूजा का निषेध: उन्होंने कर्मकांड, बलि प्रथा और मूर्ति पूजा का विरोध किया। उनके धर्म में भगवान का प्रतीक कोई मूर्ति नहीं, बल्कि पवित्र ग्रंथ (भागवत) को माना गया, जिसे 'सिंहासन' पर रखा जाता है।
- दास भाव: उनकी भक्ति 'दास भाव' (Dasya Bhakti) की थी, जिसमें भक्त खुद को ईश्वर का सेवक मानता है।
- नाम संकीर्तन: ईश्वर प्राप्ति का सबसे सरल माध्यम 'नाम-जप' और सामुदायिक प्रार्थना को बताया।
5. सांस्कृतिक योगदान: सत्र, नामघर और बोरगीत
शंकरदेव ने धर्म को संस्कृति के माध्यम से लोगों तक पहुँचाया। उन्होंने तीन महान संस्थाएँ दीं जो आज भी असमिया समाज की रीढ़ हैं:
1. नामघर (Namghar)
यह केवल मंदिर नहीं, बल्कि एक 'सामुदायिक भवन' है। यहाँ प्रार्थना के साथ-साथ गाँव के फैसले (पंचायत) और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। यह विश्व का संभवतः पहला लोकतांत्रिक धार्मिक संस्थान था जहाँ किसी भी जाति का व्यक्ति प्रवेश कर सकता था।
2. सत्र (Sattra)
ये मठ या विहार हैं जहाँ भिक्षु (केवलिया) रहते हैं और कला-संस्कृति की साधना करते हैं। आज भी असम में माजुली द्वीप और अन्य स्थानों पर सैकड़ों सत्र सक्रिय हैं।
3. बोरगीत (Bargeet)
शंकरदेव ने एक विशिष्ट प्रकार के devotional गीतों की रचना की, जिन्हें 'बोरगीत' (महान गीत) कहा जाता है। ये गीत 'ब्रजावली' भाषा (मैथिली और असमिया का मिश्रण) में लिखे गए और शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं।
6. मणिकांचन योग: माधवदेव से मिलन
शंकरदेव के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी—अपने प्रधान शिष्य माधवदेव से मिलन। माधवदेव पहले एक कट्टर शाक्त (शक्ति उपासक) थे और बलि प्रथा में विश्वास रखते थे।
माधवदेव, शंकरदेव से तर्क करने आए थे कि बलि क्यों आवश्यक है। शंकरदेव ने उनसे केवल एक श्लोक कहा—"यथा तरोर्मूलनिषेचनेन, तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः" (जैसे वृक्ष की जड़ में पानी देने से तना और शाखाएं तृप्त हो जाती हैं, वैसे ही एक कृष्ण की पूजा से सब देवी-देवता तृप्त हो जाते हैं, बलि की क्या आवश्यकता?)।
साढ़े चार घंटे के शास्त्रार्थ के बाद माधवदेव नतमस्तक हो गए। इस मिलन को असमिया इतिहास में 'मणिकांचन योग' (सोने और मणि का मिलन) कहा जाता है।
7. साहित्यिक संपदा: कीर्तन घोषा और अंकिया नाट
शंकरदेव एक महान साहित्यकार थे। उन्होंने संस्कृत के बजाय जनभाषा का प्रयोग किया ताकि आम आदमी धर्म को समझ सके।
- कीर्तन घोषा: यह उनका सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसमें भागवत की कथाओं को पद्य रूप में लिखा गया है। यह असम का 'बाइबल' माना जाता है।
- अंकिया नाट (Ankia Naat): उन्होंने 'चिन्ह यात्रा' (Cihna Yatra) नामक नाटक का मंचन किया, जिसमें पहली बार चित्रित पर्दों (Scenery) का प्रयोग हुआ। यह शेक्सपियर से भी पहले की घटना थी। उनके नाटकों को 'अंकिया नाट' कहा जाता है, जो आज भी 'भाओना' (Bhaona) के रूप में खेले जाते हैं।
- सत्रिया नृत्य: उन्होंने नाटकों के लिए एक विशेष नृत्य शैली विकसित की, जिसे आज भारत के 8 शास्त्रीय नृत्यों (Sattriya Nritya) में स्थान प्राप्त है।
8. समाज सुधार: जातिविहीन समाज का स्वप्न
शंकरदेव एक क्रांतिकारी समाज सुधारक थे। उस समय असम में तांत्रिकों और जाति-प्रथा का बोलबाला था। शंकरदेव ने घोषणा की कि भक्ति पर सबका अधिकार है।
उन्होंने चांदसाई (एक मुस्लिम), गोविंद (गारो जनजाति), और नरोत्तम (नागा जनजाति) जैसे लोगों को अपना शिष्य बनाया और उन्हें ब्राह्मणों के समान सम्मान दिया। उन्होंने छुआछूत की जड़ों पर प्रहार किया और असम की बिखरी हुई जनजातियों को एक 'बृहत्तर असमिया समाज' में बदल दिया।
9. निष्कर्ष: शंकरदेव की अमर विरासत
श्रीमंत शंकरदेव ने 119 वर्ष का सुदीर्घ और सक्रिय जीवन जिया। 1568 ईस्वी में कोच बिहार में उनका महाप्रयाण हुआ। उन्होंने असम को जो दिया, वह केवल धर्म नहीं, बल्कि एक 'पहचान' थी।
आज असम का हर गाँव, हर घर और हर दिल शंकरदेव की विरासत से स्पंदित है। जब भी नामघर में 'दबा' (नगाड़ा) बजता है या कोई सत्रिया नर्तक मंच पर आता है, तो वह उसी महापुरुष को नमन कर रहा होता है जिसने कहा था—"परमार्थ को पाने के लिए जंगल जाने की जरूरत नहीं, वह तुम्हारे हृदय और समुदाय के बीच में है।" वे भारत की राष्ट्रीय एकात्मता के सच्चे अग्रदूत थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- श्रीमंत शंकरदेव: व्यक्तित्व और कृतित्व - डॉ. महेश्वर नेओग।
- कीर्तन घोषा (मूल असमिया और हिंदी अनुवाद)।
- Sankardeva and His Times - Maheshwar Neog.
- The Neo-Vaishnavite Movement and the Satra Institution of Assam - S.N. Sarma.
- पवित्र असम - डॉ. बाणिकांत काकती।
