आचार्य धर्मपाल: नालंदा के सूर्य, विज्ञानवाद के महान व्याख्याता और ह्वेनसांग के प्रेरणा-स्रोत | Acharya Dharmapala

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य धर्मपाल: चेतना-विज्ञान के ऋषि और नालंदा के महान कुलगुरु

आचार्य धर्मपाल: नालंदा के सूर्य, विज्ञानवाद के महान तार्किक और ह्वेनसांग के प्रेरणा-स्रोत

भारतीय दर्शन के इतिहास में आचार्य धर्मपाल (Acharya Dharmapala) का नाम एक ऐसे जाज्वल्यमान नक्षत्र की तरह चमकता है, जिन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय को उसके स्वर्ण युग में पहुँचाया। वे 7वीं शताब्दी के महान बौद्ध दार्शनिक, तार्किक और 'विज्ञानवाद' (Yogacara) के सबसे प्रामाणिक व्याख्याता थे। उन्होंने आचार्य वसुबंधु और दिग्नाग की परंपरा को आगे बढ़ाया। जब चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) भारत आया, तो उसका मुख्य उद्देश्य धर्मपाल के ग्रंथों का अध्ययन करना ही था। धर्मपाल ने सिद्ध किया कि "यह समस्त जगत केवल चेतना (Mind) का खेल है, बाह्य वस्तुओं का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।"

📌 आचार्य धर्मपाल: एक दार्शनिक प्रोफाइल
पूरा नाम आचार्य धर्मपाल (Dharmapala)
उपाधि नालंदा के कुलगुरु (Abbot), बोधिसत्व
काल 6वीं-7वीं शताब्दी (लगभग 530–561 ईस्वी)
जन्म स्थान कांचीपुरम्, दक्षिण भारत (तमिलनाडु)
प्रमुख शिष्य शीलभद्र (ह्वेनसांग के गुरु), धर्मकीर्ति (परंपरा अनुसार)
दर्शन योगाचार-विज्ञानवाद (Consciousness Only School)
प्रसिद्ध ग्रंथ विज्ञप्तिमात्रता-सिद्धि (Vijnaptimatrata-siddhi), आलंबन-परीक्षा-वृत्ति

2. जीवन परिचय: कांचीपुरम् से नालंदा तक

आचार्य धर्मपाल का जन्म दक्षिण भारत के पल्लव साम्राज्य की राजधानी कांचीपुरम् में एक उच्च अधिकारी (मंत्री) के घर हुआ था। वे बचपन से ही अत्यंत मेधावी थे।

विवाह मंडप से पलायन

ह्वेनसांग के यात्रा वृतांत के अनुसार, युवावस्था में धर्मपाल का विवाह तय कर दिया गया था। विवाह की पूर्व संध्या पर उनके मन में तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा कि संसार का सुख क्षणिक है और सत्य की खोज ही जीवन का उद्देश्य है। वे विवाह मंडप से भाग गए और एक बौद्ध मठ में शरण ली। वहां उन्होंने प्रव्रज्या (संन्यास) ग्रहण की और शास्त्रों का गहन अध्ययन शुरू किया।

ज्ञान की प्यास उन्हें उत्तर भारत ले आई। वे विश्वविख्यात नालंदा महाविहार पहुंचे, जहाँ उन्होंने दिग्नाग के शिष्यों से तर्कशास्त्र और विज्ञानवाद की शिक्षा ली। अपनी अद्वितीय प्रतिभा के कारण वे शीघ्र ही नालंदा के सबसे प्रमुख विद्वान बन गए।

3. नालंदा के कुलगुरु: स्वर्ण युग का नेतृत्व

धर्मपाल को उनकी विद्वता और नेतृत्व क्षमता के कारण नालंदा विश्वविद्यालय का कुलपति (Abbot) नियुक्त किया गया। यह वह समय था जब नालंदा अपनी ख्याति के चरम पर था।

  • शिक्षण शैली: वे छात्रों को केवल रटाते नहीं थे, बल्कि तर्क (Logic) और वाद-विवाद के माध्यम से सत्य तक पहुँचाते थे।
  • शिष्य परंपरा: उनके सबसे प्रमुख शिष्य शीलभद्र थे। जब चीनी यात्री ह्वेनसांग नालंदा आया, तो धर्मपाल का देहावसान हो चुका था, लेकिन ह्वेनसांग ने शीलभद्र से ही शिक्षा ली। इस प्रकार, ह्वेनसांग का ज्ञान परोक्ष रूप से धर्मपाल का ही ज्ञान था।
  • सेवानिवृत्ति: जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने कुलगुरु का पद शीलभद्र को सौंप दिया और स्वयं बोधि वृक्ष (बोधगया) के पास एकांत साधना में चले गए।

4. दार्शनिक चिंतन: विज्ञानवाद और 'विज्ञप्तिमात्रता'

धर्मपाल 'योगाचार' (Yogacara) या 'विज्ञानवाद' (Vijnanavada) के प्रबल समर्थक थे। उनका मुख्य सिद्धांत था—"विज्ञप्तिमात्रता" (Consciousness Only)।

1. बाह्यार्थ-भंग (Denial of External World)

धर्मपाल का तर्क था कि हमें जो भी बाहरी दुनिया (पेड़, पहाड़, लोग) दिखाई देती है, वह वास्तव में हमारे मन (Mind/Chitta) का ही प्रक्षेपण (Projection) है। जैसे सपने में हम हाथी-घोड़े देखते हैं, जबकि बाहर कुछ नहीं होता, वैसे ही जाग्रत अवस्था में भी यह जगत मन की रचना है।
"चित्त ही सब कुछ है, चित्त से परे कुछ नहीं।"

2. अष्ट-विज्ञान (Eight Consciousnesses)

उन्होंने मन की संरचना को बहुत गहराई से समझाया। उन्होंने 8 प्रकार के विज्ञान (Consciousness) माने:

  1. चक्षु विज्ञान (देखना)
  2. श्रोत्र विज्ञान (सुनना)
  3. घ्राण विज्ञान (सूंघना)
  4. जिह्वा विज्ञान (चखना)
  5. काय विज्ञान (स्पर्श)
  6. मनोविज्ञान (सोचना)
  7. क्लिष्ट-मनस (अहंकार/Ego)
  8. आलय-विज्ञान (Storehouse Consciousness): यह सबसे महत्वपूर्ण है। यह एक गोदाम की तरह है जहाँ हमारे सभी कर्मों के संस्कार (Seeds/बीज) जमा रहते हैं। इसी से दुनिया का निर्माण होता है।

5. तर्कशास्त्र में योगदान: बाह्यार्थ-भंग

धर्मपाल ने दिग्नाग के तर्कशास्त्र को और परिष्कृत किया। उन्होंने 'आलंबन-परीक्षा' (Examination of the Object) पर एक महत्वपूर्ण टीका लिखी।

परमाणुवाद का खंडन

न्याय-वैशेषिक और सर्वास्तिवादी मानते थे कि दुनिया परमाणुओं (Atoms) से बनी है। धर्मपाल ने तार्किक रूप से इसका खंडन किया:
"यदि परमाणु का आकार है, तो उसके हिस्से (Parts) होंगे। अगर हिस्से हैं, तो वह परमाणु (सबसे छोटा कण) नहीं हो सकता। और अगर परमाणु का कोई आकार नहीं है, तो हजारों परमाणु मिलकर भी कोई बड़ी चीज (जैसे पहाड़) नहीं बना सकते। अतः, भौतिक पदार्थ का अस्तित्व तार्किक रूप से सिद्ध नहीं हो सकता। केवल 'विचार' (Idea) ही सत्य है।"

6. प्रमुख कृतियाँ: चीनी अनुवादों में जीवित ज्ञान

दुर्भाग्यवश, धर्मपाल के मूल संस्कृत ग्रंथ भारत में लुप्त हो गए, लेकिन ह्वेनसांग द्वारा किए गए चीनी अनुवादों में वे आज भी सुरक्षित हैं।

  • विज्ञप्तिमात्रता-सिद्धि-शास्त्र (Cheng Weishi Lun): यह उनका सबसे महान ग्रंथ है। इसमें उन्होंने वसुबंधु की 'त्रिंशिका' (30 Verses) पर विस्तृत भाष्य लिखा है। यह चीनी बौद्ध धर्म के 'फा-शियांग' (Faxiang) संप्रदाय का आधार ग्रंथ है।
  • आलंबन-परीक्षा-वृत्ति: इसमें ज्ञान के विषय (Object) की तार्किक जांच की गई है।
  • शतशास्त्र-वैपुल्य-टीका: यह आर्यदेव के 'शतशास्त्र' पर टीका है, जिसमें शून्यवाद और विज्ञानवाद का समन्वय है।

7. प्रभाव: ह्वेनसांग और चीनी बौद्ध धर्म

धर्मपाल का प्रभाव भारत से अधिक चीन और जापान में पड़ा।

ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा विवरण में लिखा है: "नालंदा में धर्मपाल की सुगंध अभी भी व्याप्त है।" ह्वेनसांग ने धर्मपाल के विचारों को चीन ले जाकर 'योगाचार' संप्रदाय की स्थापना की। आज भी जब पूर्वी एशिया में बौद्ध मनोविज्ञान (Buddhist Psychology) की बात होती है, तो धर्मपाल के 'आलय-विज्ञान' के सिद्धांत को ही आधार माना जाता है।

8. निष्कर्ष: धर्मपाल की अमर विरासत

आचार्य धर्मपाल केवल एक दार्शनिक नहीं, बल्कि एक 'ऋषि-वैज्ञानिक' थे जिन्होंने चेतना (Consciousness) के रहस्यों को खोला। उन्होंने सिद्ध किया कि मनुष्य का सबसे बड़ा ब्रह्मांड उसके अपने भीतर (मन में) है।

नालंदा के खंडहर आज भी उस महान आचार्य की गवाही देते हैं जिन्होंने बिना किसी उपकरण के, केवल शुद्ध तर्क और ध्यान के बल पर मनोविज्ञान की ऐसी गहराइयों को छू लिया, जहाँ आधुनिक विज्ञान आज पहुँचने का प्रयास कर रहा है। वे दर्शन और तर्कशास्त्र के सच्चे 'धर्मपाल' (धर्म के रक्षक) थे।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • Cheng Weishi Lun (The Doctrine of Mere-Consciousness) - Translated by Xuanzang (English Tr. by Wei Tat).
  • बौद्ध दर्शन - राहुल सांकृत्यायन।
  • History of Indian Logic - S.C. Vidyabhusana.
  • Buddhist Logic (Vol 1 & 2) - Th. Stcherbatsky.
  • The Life of Hiuen-Tsiang - Samuel Beal.

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