आचार्य बुद्धघोष: थेरवाद के 'अरस्तू', पाली साहित्य के 'व्यास' और विशुद्धिमग्ग के अमर रचयिता
बौद्ध धर्म के 2500 वर्षों के इतिहास में भगवान बुद्ध के बाद यदि किसी एक आचार्य ने थेरवाद (Theravada) परंपरा को सबसे अधिक प्रभावित किया है, तो वे आचार्य बुद्धघोष (Buddhaghosa) हैं। 5वीं शताब्दी के इस महान दार्शनिक ने बिखरे हुए बौद्ध ज्ञान को एक व्यवस्थित (Systematic) रूप दिया। उन्होंने सिंहली भाषा में उपलब्ध अट्ठकथाओं (टीकाओं) का पाली भाषा में अनुवाद करके उन्हें वैश्विक बना दिया। उनका ग्रंथ 'विशुद्धिमग्ग' (Visuddhimagga) बौद्ध मनोविज्ञान और साधना का सबसे प्रामाणिक 'मैनुअल' है। उनके बिना आज हम 'अभिधम्म' की गहराइयों को नहीं समझ पाते।
- 1. प्रस्तावना: बुद्ध की 'आवाज'
- 2. जीवन परिचय: बोधगया से श्रीलंका तक
- 3. महान परीक्षा: देवताओं द्वारा ग्रंथ की चोरी
- 4. विशुद्धिमग्ग: शुद्धि का मार्ग (दर्शन और साधना)
- 5. दार्शनिक चिंतन: अभिधम्म का तर्कशास्त्र
- 6. अट्ठकथाएँ: त्रिपिटक की कुंजी
- 7. कर्म और पुनर्जन्म का तार्किक विश्लेषण
- 8. निष्कर्ष: बुद्धघोष की अमर विरासत
| पूरा नाम | आचार्य बुद्धघोष (Buddhaghosa) |
| अर्थ | बुद्ध के समान आवाज (Voice of the Buddha) |
| काल | 5वीं शताब्दी (लगभग 430 ईस्वी) |
| जन्म स्थान | बोधगया के समीप (मगध, भारत) - ब्राह्मण कुल |
| कार्यक्षेत्र | महाविहार, अनुराधापुर (श्रीलंका) |
| प्रमुख ग्रंथ | विशुद्धिमग्ग (The Path of Purification), समंतपासादिका, सुमंगलविलासिनी |
| दर्शन | थेरवाद (विभज्यवाद), अभिधम्म विश्लेषण |
2. जीवन परिचय: बोधगया से श्रीलंका तक
'महावंश' (श्रीलंका का इतिहास ग्रंथ) के अनुसार, बुद्धघोष का जन्म बोधगया के पास एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे बचपन से ही वेदों और पतंजलि के योगसूत्र के ज्ञाता थे। वे एक महान तार्किक थे और जगह-जगह शास्त्रार्थ करते थे।
एक बार वे एक बौद्ध विहार में ठहरे, जहाँ रेवत नामक स्थविर (भिक्षु) ध्यान कर रहे थे। बुद्धघोष ने उन्हें शास्त्रार्थ की चुनौती दी। रेवत ने उनके सभी वैदिक प्रश्नों का उत्तर दे दिया, लेकिन जब रेवत ने 'अभिधम्म' (चित्त के प्रकार) से जुड़ा एक प्रश्न पूछा, तो बुद्धघोष निरुत्तर हो गए।
सत्य की खोज में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। चूँकि उनकी वाणी (घोष) बुद्ध की तरह गंभीर और ज्ञानपूर्ण थी, इसलिए उनका नाम 'बुद्धघोष' रखा गया।
भारत में त्रिपिटक की मूल टीकाएँ लुप्त हो चुकी थीं, लेकिन वे श्रीलंका में सिंहली भाषा में सुरक्षित थीं। गुरु रेवत के आदेश पर बुद्धघोष उन टीकाओं का पाली में अनुवाद करने के लिए श्रीलंका के प्रसिद्ध महाविहार (अनुराधापुर) गए।
3. महान परीक्षा: देवताओं द्वारा ग्रंथ की चोरी
जब बुद्धघोष श्रीलंका पहुँचे और उन्होंने महाविहार के संघ से प्राचीन पुस्तकों तक पहुँचने की अनुमति माँगी, तो भिक्षुओं ने उनकी योग्यता परखने के लिए एक कठिन परीक्षा ली। उन्होंने बुद्धघोष को केवल दो पंक्तियों की एक गाथा (श्लोक) दी और कहा—"इस पर अपनी व्याख्या लिखो।" वह गाथा थी:
"सीले पतिट्ठाय नरो सपञ्ञो, चित्तं पञ्ञं च भावयं..."
(शील में प्रतिष्ठित होकर, प्रज्ञावान व्यक्ति चित्त और प्रज्ञा की भावना करता है...)
बुद्धघोष ने इस एक गाथा के आधार पर अपना महानतम ग्रंथ 'विशुद्धिमग्ग' (Visuddhimagga) लिख डाला।
कहा जाता है कि जब बुद्धघोष ने यह ग्रंथ पूरा किया, तो देवताओं ने उनकी स्मृति (Memory) की परीक्षा लेने के लिए उस ग्रंथ को छिपा दिया। बुद्धघोष ने उसे दोबारा लिखा। देवताओं ने उसे फिर छिपा दिया। उन्होंने तीसरी बार लिखा।
अंत में देवताओं ने तीनों प्रतियाँ लौटा दीं। जब तीनों को मिलाया गया, तो उनमें एक मात्रा या शब्द का भी अंतर नहीं था। यह देखकर संघ ने उन्हें 'मैत्रेय बुद्ध' का अवतार मानकर सम्मानित किया।
4. विशुद्धिमग्ग: शुद्धि का मार्ग (दर्शन और साधना)
'विशुद्धिमग्ग' थेरवाद बौद्ध धर्म का एनसाइक्लोपीडिया है। यह तीन भागों (त्रि-शिक्षा) में विभाजित है:
- शील (Morality): नैतिक आचरण के नियम। यह नींव है।
- समाधि (Concentration): चित्त की एकाग्रता। इसमें बुद्धघोष ने ध्यान के 40 कर्मस्थानों (Subjects of Meditation) का विस्तृत वैज्ञानिक वर्णन किया है (जैसे—श्वास, कसीण, शव-साधना आदि)।
- प्रज्ञा (Wisdom): यह दार्शनिक भाग है। इसमें स्कंध, आयतन, धातु, और प्रतीत्यसमुत्पाद का विश्लेषण है।
5. दार्शनिक चिंतन: अभिधम्म का तर्कशास्त्र
बुद्धघोष 'न्याय' (Logic) के पारंपरिक अर्थ में तार्किक नहीं थे, लेकिन उन्होंने 'अभिधम्म' (Abhidhamma) की जो व्यवस्था दी, वह मनोविज्ञान का शुद्ध तर्कशास्त्र है।
- चित्त का विश्लेषण: उन्होंने मन को एक 'इकाई' (Soul) नहीं, बल्कि क्षण-क्षण बदलती हुई 'प्रक्रिया' (Process) माना। उन्होंने चित्त के 89 या 121 प्रकार बताए।
- चेतसिक (Mental Factors): उन्होंने 52 प्रकार के मानसिक घटकों (जैसे—लोभ, द्वेष, श्रद्धा, प्रज्ञा) का वर्गीकरण किया और बताया कि वे कैसे हमारे व्यवहार को नियंत्रित करते हैं।
- रूप (Matter): उन्होंने पदार्थ (Matter) को भी चार महाभूतों और उनके उपादानों में विभाजित किया।
7. कर्म और पुनर्जन्म का तार्किक विश्लेषण
बुद्धघोष ने उस सबसे कठिन दार्शनिक प्रश्न का उत्तर दिया—"यदि आत्मा नहीं है, तो पुनर्जन्म किसका होता है?"
उन्होंने इसे तार्किक उदाहरणों से समझाया:
प्रतिध्वनि (Echo): जैसे आवाज से गूंज पैदा होती है, पर आवाज गूंज में नहीं जाती।
दीपक की लौ: जैसे एक दीये से दूसरा दीया जलता है, न वही लौ जाती है, न दूसरी बिना कारण के जलती है।
मुहर (Seal): जैसे अंगूठी की छाप मोम पर पड़ती है, अंगूठी मोम में नहीं घुसती।
उन्होंने तर्क दिया कि पुनर्जन्म एक 'कारण-कार्य श्रृंखला' (Causal Chain) है, न कि किसी 'व्यक्ति' (Entity) का स्थानांतरण।
8. निष्कर्ष: बुद्धघोष की अमर विरासत
आचार्य बुद्धघोष का कार्य केवल अनुवाद नहीं था, वह एक 'पुनर्निर्माण' था। उन्होंने सिंहली परंपरा को पाली में लाकर उसे भारत, म्यांमार, थाईलैंड और कंबोडिया के लिए सुलभ बना दिया। यदि बुद्धघोष न होते, तो आज थेरवाद बौद्ध धर्म का साहित्य इतना समृद्ध और व्यवस्थित नहीं होता।
वे एक ऐसे दार्शनिक थे जिन्होंने 'ध्यान' (Meditation) को 'विज्ञान' बना दिया। उनका ग्रंथ 'विशुद्धिमग्ग' आज भी विपश्यना साधकों के लिए प्रकाश स्तंभ है। वे सही अर्थों में 'बुद्ध-घोष' थे—बुद्ध की वह आवाज़ जो सदियों बाद भी गूंज रही है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- विशुद्धिमग्ग - (भदंत रेवतधम्म द्वारा हिंदी अनुवाद)।
- The Path of Purification (Visuddhimagga) - Bhikkhu Nanamoli (English Translation).
- A History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta.
- Buddhaghosa and the Visuddhimagga - B.C. Law.
- अभिधम्मत्थसंगहो - (नारद थेर)।
