आचार्य गोवर्धन शास्त्री: वैदिक संहिताओं के प्रामाणिक पाठ संपादक और आर्ष परंपरा के रक्षक | Acharya Govardhan Shastri

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य गोवर्धन शास्त्री: वैदिक संहिताओं के प्रामाणिक पाठ संपादक

आचार्य गोवर्धन शास्त्री: वैदिक संहिताओं के प्रामाणिक पाठ संपादक और 'श्रुति' के रक्षक

एक अत्यंत विस्तृत, ऐतिहासिक और भाषावैज्ञानिक विश्लेषण: वह महान तपस्वी विद्वान जिसने सदियों पुरानी जीर्ण-शीर्ण पांडुलिपियों, लिपिकीय अशुद्धियों और लुप्त होती स्वर-प्रक्रिया के भंवर से वेदों के 'विशुद्ध मूल पाठ' को निकालकर आधुनिक छपाई के लिए प्रामाणिक बनाया। (The Master of Textual Criticism of the Vedas)

भारतीय ज्ञान परंपरा में वेदों को 'श्रुति' कहा जाता है। इसका अर्थ है कि सहस्रों वर्षों तक वेदों का ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा में केवल सुनकर (मौखिक रूप से) सुरक्षित रखा गया। जब तक वेद मौखिक परंपरा में थे, उनमें एक मात्रा या स्वर की भी अशुद्धि होना असंभव था, क्योंकि घन, जटा, और क्रम पाठ जैसी जटिल गणितीय कंठस्थीकरण विधियां उन्हें सुरक्षित रखती थीं।

परंतु, जब कलियुग के प्रभाव और स्मरण शक्ति के क्षीण होने के कारण वेदों को भूर्जपत्रों (Birch bark) और ताड़पत्रों (Palm leaves) पर लिखा जाने लगा, तब एक बहुत बड़ा संकट उत्पन्न हुआ—'लिपिकीय अशुद्धियां' (Scribal Errors)। जो व्यक्ति पांडुलिपियों की नकल (Copy) कर रहा होता था, वह मानवीय भूलों के कारण मात्रा, अक्षर या स्वर-चिह्नों में गलतियां कर देता था। सदियों बाद, जब भारत में प्रिंटिंग प्रेस (छापाखाना) का युग आया, तो सवाल यह उठा कि "कौन सी पांडुलिपि का पाठ सही है? वेदों का विशुद्ध मूल रूप (Urtext) क्या है?"

इस महासंकट का समाधान करने के लिए जिस महान विद्वान ने अपना संपूर्ण जीवन खपा दिया, वे थे—आचार्य गोवर्धन शास्त्री। उन्होंने देश भर के पुस्तकालयों और मठों से विभिन्न लिपियों में लिखी गई वैदिक संहिताओं की पांडुलिपियां एकत्रित कीं और 'पाठालोचन' (Textual Criticism) के कठोर वैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रयोग करके वेदों का प्रामाणिक पाठ (Authentic Text) तैयार किया।

📌 आचार्य गोवर्धन शास्त्री: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम आचार्य गोवर्धन शास्त्री (Acharya Govardhan Shastri)
जीवन काल (काल निर्धारण) 20वीं सदी (मुख्य रूप से 1900 - 1970 के दशक तक सक्रिय। 1980 से पूर्व निधन)
संबंधित संस्थाएं संगढ़ विद्या ट्रस्ट (जयपुर), गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय (हरिद्वार), आर्य समाज
विशेषज्ञता का क्षेत्र वैदिक संहिताओं का प्रामाणिक पाठ संपादन (Critical Editing), प्रातिशाख्य, पाण्डुलिपि विज्ञान
मुख्य योगदान विभिन्न पांडुलिपियों की तुलना करके ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि संहिताओं के शुद्ध पाठ का निर्धारण और अशुद्धियों का परिमार्जन।
भाषा एवं लिपि ज्ञान संस्कृत, प्राकृत, वैदिक संस्कृत, ब्राह्मी, शारदा (कश्मीर), ग्रन्थ लिपि (दक्षिण भारत), और नागरी।
स्मृति पुरस्कार 'आचार्य गोवर्धन शास्त्री स्मृति पुरस्कार' (वैदिक विद्वानों को गुरुकुल कांगड़ी और संगढ़ विद्या ट्रस्ट द्वारा प्रतिवर्ष प्रदान किया जाता है)।

2. जीवन परिचय: आर्ष गुरुकुल परंपरा और काल निर्धारण

आचार्य गोवर्धन शास्त्री का जीवन भारतीय ज्ञान परंपरा के 'मौन साधकों' का प्रतीक है। यद्यपि उनके जन्म और मृत्यु की सटीक तिथियाँ मुख्यधारा के इतिहास में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हैं, किंतु ऐतिहासिक और संस्थागत संदर्भों से उनका काल 20वीं सदी (विशेषकर 1900 से 1970 के दशक के मध्य) का माना जाता है।

उनका उदय उस कालखंड में हुआ जब भारत में आर्य समाज और गुरुकुल प्रणाली (विशेषकर गुरुकुल कांगड़ी और राजस्थान के विद्या केंद्र) अपनी जड़ों को फिर से मजबूत कर रहे थे। 'संगढ़ विद्या ट्रस्ट' द्वारा 1980 के दशक की शुरुआत में उनकी स्मृति में पुरस्कार स्थापित किया जा चुका था, जो उनके देहावसान की समय-सीमा की पुष्टि करता है।

महर्षि दयानंद सरस्वती के 'वेदों की ओर लौटो' के उद्घोष के बाद, यह नितांत आवश्यक हो गया था कि जनता को जो वेद उपलब्ध कराए जाएं, वे अशुद्धियों से पूर्णतः मुक्त हों। गोवर्धन शास्त्री ने इस चुनौती को अपना जीवन-लक्ष्य बना लिया। वे राजनीति, मंच और वाहवाही से दूर रहने वाले एक ऐसे तपस्वी वैयाकरण थे, जिनका अधिकांश समय धूल फांकती हुई प्राचीन पांडुलिपियों के पन्ने पलटने और उनके पाठ-भेदों (Variant readings) को एक रजिस्टर में नोट करने में व्यतीत होता था।

3. 'प्रामाणिक पाठ संपादन' (Critical Text Editing) क्या है?

आधुनिक शिक्षा जगत में Textual Criticism (पाठालोचन) एक अत्यंत जटिल विज्ञान है। जब किसी प्राचीन ग्रंथ (जैसे ऋग्वेद) की मूल प्रति (Autograph) नष्ट हो चुकी हो और हमारे पास केवल उसकी सदियों बाद की हजारों 'नकलें' (Copies) बची हों, तो विद्वान का कार्य उन सभी नकलों की आपस में तुलना करके मूल पाठ तक पहुँचना होता है।

पाठ-संपादन के चरण (Steps of Critical Editing)

आचार्य गोवर्धन शास्त्री ने संपादन के लिए निम्नलिखित अत्यंत कठोर शास्त्रीय प्रक्रिया अपनाई:

1. पांडुलिपियों का एकत्रीकरण (Collection): कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैले मठों और राजाओं के पुस्तकालयों से पांडुलिपियां मंगाना।
2. तुलनात्मक अध्ययन (Collation): यदि एक ही मंत्र 20 अलग-अलग पांडुलिपियों में लिखा है, तो उन बीसों को एक साथ रखकर देखना कि कहाँ किस लिपिकार ने क्या लिखा है।
3. वंशावली का निर्माण (Stemma Codicum): यह पता लगाना कि कौन सी पांडुलिपि किस पांडुलिपि की नकल करके बनाई गई है, ताकि गलतियों के स्रोत को पकड़ा जा सके।
4. मूल पाठ का निर्धारण (Constitutio Textus): अशुद्धियों को छांटकर अंततः वह पाठ तैयार करना जो मूल ऋषि के मुख से निकला होगा।

4. शोध और संपादन की वैज्ञानिक पद्धति: पांडुलिपि विज्ञान (Manuscriptology)

वेदों का संपादन करना कोई सामान्य कार्य नहीं है। इसके लिए संपादक को भारत की अनेक प्राचीन लिपियों (Scripts) का प्रकांड विद्वान होना आवश्यक है।

आचार्य गोवर्धन शास्त्री को 'शारदा लिपि' (जो कश्मीर में उपयोग होती थी), 'ग्रन्थ लिपि' (जो दक्षिण भारत के ब्राह्मण वेदों को लिखने के लिए उपयोग करते थे), और 'भोट लिपि' का गहरा ज्ञान था। जब कोई शब्द शारदा लिपि की किसी पांडुलिपि में कुछ और होता था, और ग्रन्थ लिपि में कुछ और, तो वे केवल भाषाविज्ञान के आधार पर यह तय करते थे कि कौन सा शब्द व्याकरण और वेद की शैली के अनुसार 100% सही है।

5. लिपिकीय अशुद्धियाँ (Scribal Errors) और उनका शास्त्रीय समाधान

प्राचीन काल में छपाई की मशीनें नहीं थीं। 'लिपिकार' (Scribes) ग्रंथों को हाथ से लिखते थे। आचार्य शास्त्री ने अपने शोध में पाया कि पांडुलिपियों में तीन प्रकार की गलतियां सबसे अधिक होती हैं:

  • अक्षरों की समानता (Visual Confusion): नागरी या ब्राह्मी लिपि में 'भ' और 'म', या 'प' और 'य' लगभग एक जैसे दिखते हैं। लिपिकार अक्सर 'भ' को 'म' पढ़ लेता था। गोवर्धन शास्त्री ने व्याकरण के नियमों से ऐसी हज़ारों अशुद्धियों को पकड़ा और सुधारा।
  • श्रवण दोष (Auditory Errors): जब एक व्यक्ति बोल रहा हो और दूसरा लिख रहा हो, तो सुनने की गलती के कारण 'श', 'ष', और 'स' में भ्रम हो जाता है। (जैसे 'सुशर्मा' को 'सुसर्षा' लिख देना)।
  • दृष्टि-दोष (Haplography / Dittography): लिखते समय लिपिकार की आँख एक ही शब्द को दो बार देख लेती थी, या एक पूरी पंक्ति को छोड़ देती थी। आचार्य जी ने विभिन्न प्रतियों का मिलान कर इन छूटी हुई पंक्तियों को पुनः स्थापित किया।

6. वैदिक स्वर-प्रक्रिया का रक्षण: उदात्त, अनुदात्त और स्वरित का विज्ञान

वेदों और लौकिक संस्कृत (जैसे कालिदास की रचनाओं) में सबसे बड़ा अंतर 'स्वर' (Accents) का है। वैदिक मंत्रों में प्रत्येक अक्षर पर एक विशेष स्वर होता है—उदात्त (उच्च), अनुदात्त (नीच), और स्वरित (मध्यम)

इन्द्रशत्रु वर्धस्व: स्वर-चूक का भयंकर परिणाम

आचार्य गोवर्धन शास्त्री हमेशा एक प्राचीन कथा का उदाहरण देते थे। प्राचीन काल में त्वष्टा ऋषि ने इन्द्र को मारने के लिए यज्ञ किया और मंत्र पढ़ा: "इन्द्रशत्रु वर्धस्व"

उनका उद्देश्य था कहना—"हे अग्नि, ऐसा पुत्र उत्पन्न करो जो इन्द्र का शत्रु (मारने वाला) हो।" (यह 'तत्पुरुष समास' है, जिसमें अंत में 'उदात्त' स्वर आना चाहिए)।
लेकिन उच्चारण में भूल के कारण उन्होंने पहले अक्षर (इ) पर उदात्त स्वर लगा दिया, जिससे वह 'बहुव्रीहि समास' बन गया। अब इसका अर्थ हो गया—"हे अग्नि, ऐसा पुत्र उत्पन्न करो जिसका शत्रु (मारने वाला) इन्द्र हो।" परिणाम यह हुआ कि उत्पन्न हुए वृत्रासुर को इन्द्र ने मार दिया।

शास्त्री जी का योगदान: पुरानी पांडुलिपियों में लाल स्याही से लगाए गए स्वर-चिह्न (Horizontal and vertical lines) समय के साथ फीके पड़ जाते थे या मिट जाते थे। गोवर्धन शास्त्री ने अपने अथाह ज्ञान और श्रुति परंपरा के जानकारों की मदद से वैदिक संहिताओं के एक-एक शब्द पर उचित स्वर-चिह्नों को पुनः स्थापित किया। यदि वे ऐसा न करते, तो आज हम जो वेद पढ़ते, उनके अर्थ पूरी तरह विकृत हो चुके होते।

7. प्रातिशाख्य और पदपाठ: संपादन के अचूक अस्त्र

आचार्य गोवर्धन शास्त्री के पाठ-संपादन के सबसे बड़े अस्त्र 'पदपाठ' और 'प्रातिशाख्य' थे।

  • पदपाठ (Word-by-word text): जब संहिताओं में मंत्र एक साथ जुड़े होते हैं (संधि के कारण), तो उन्हें 'संहिता पाठ' कहते हैं। ऋषि शाकल्य ने ऋग्वेद का 'पदपाठ' बनाया था, जिसमें हर शब्द को संधि-मुक्त करके अलग-अलग कर दिया गया था। गोवर्धन शास्त्री ने पांडुलिपि की सत्यता जांचने के लिए हमेशा संहिता पाठ को पदपाठ की कसौटी पर कसा।
  • प्रातिशाख्य (Phonetic Manuals): प्रत्येक वेद की अपनी एक 'प्रातिशाख्य' पुस्तक है (जैसे ऋग्वेद प्रातिशाख्य, वाजसनेयी प्रातिशाख्य) जो उस वेद के उच्चारण के कठोर नियम बताती है। आचार्य शास्त्री ने इन अत्यंत जटिल और गणितीय पुस्तकों का सहारा लेकर वेदों की व्याकरणिक अशुद्धियों को जड़ से समाप्त किया।

8. पाश्चात्य संपादन बनाम पारंपरिक भारतीय संपादन

19वीं सदी में मैक्स मूलर (Max Müller), रॉट (Roth) और थीओडोर औफ्रेक्ट (Theodor Aufrecht) जैसे पश्चिमी विद्वानों ने भी वेदों का संपादन किया था। परंतु उनके संपादन में एक बड़ी समस्या थी।

पश्चिमी विद्वान जब किसी पांडुलिपि में कोई कठिन शब्द देखते थे जो उन्हें समझ नहीं आता था, तो वे 'Comparative Philology' (तुलनात्मक भाषाविज्ञान) के नाम पर अपनी मर्जी से उस शब्द को बदल (Emendation) देते थे ताकि वह ग्रीक या लैटिन के किसी शब्द जैसा लगे।

आचार्य गोवर्धन शास्त्री ने इस पाश्चात्य 'सुधारवाद' का कड़ा विरोध किया। उनका सिद्धांत था: "मूल पाठ (Text) पवित्र है। यदि हमें कोई शब्द समझ नहीं आ रहा है, तो कमी हमारी बुद्धि में है, ऋषि के मंत्र में नहीं।" उन्होंने बिना किसी ठोस पांडुलिपि प्रमाण के, अपनी कल्पना से वेदों का एक भी अक्षर बदलने की अनुमति नहीं दी। यही कारण है कि उनका संपादित पाठ 'विशुद्ध भारतीय और आर्ष' माना जाता है।

9. आचार्य गोवर्धन शास्त्री पुरस्कार और उनकी अमर विरासत

आचार्य गोवर्धन शास्त्री के इस मूक लेकिन युगान्तकारी योगदान को भारतीय शिक्षा और आर्य समाज की गुरुकुल परंपरा ने हमेशा के लिए अमर कर दिया।

उनके सम्मान में संगढ़ विद्या ट्रस्ट, जयपुर और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार द्वारा प्रतिवर्ष 'आचार्य गोवर्धन शास्त्री स्मृति पुरस्कार' प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन विशिष्ट विद्वानों को दिया जाता है जो वैदिक साहित्य, पाठ-संपादन और संस्कृत के क्षेत्र में उत्कृष्ट शोध कार्य करते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि उनका नाम 'वैदिक शुद्धता' का पर्याय बन चुका है।

10. निष्कर्ष: आधुनिक मुद्रण युग के वेद-व्यास

प्राचीन काल में महर्षि वेद-व्यास ने वेदों को चार भागों में विभाजित कर उन्हें व्यवस्थित किया था। आधुनिक काल (Printing Era) में जब वेदों को कागज पर मुद्रित करने का समय आया, तो उन्हें अशुद्धियों, विसंगतियों और विकृतियों से बचाने के लिए आचार्य गोवर्धन शास्त्री जैसे 'आधुनिक वेद-व्यासों' की आवश्यकता थी।

उन्होंने अपना जीवन किसी ग्रंथ का भाष्य (अर्थ) लिखने में नहीं, बल्कि उस ग्रंथ के 'शरीर' (मूल पाठ) को स्वस्थ और शुद्ध रखने में बिताया। आज जब कोई भी पाठक, शोधार्थी या संन्यासी किसी मुद्रित वेद को उठाकर पूरे विश्वास के साथ उसके मंत्रों का सस्वर पाठ करता है, तो उसके उस विश्वास की नींव में आचार्य गोवर्धन शास्त्री जैसे पाठ-संपादकों के जीवन भर का कठोर तप छिपा होता है। वे भारतीय ज्ञान परंपरा के उस अदृश्य लेकिन सबसे मजबूत आधार-स्तंभ के रूप में सदैव वंदनीय रहेंगे।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • वैदिक पाठालोचन (Vedic Textual Criticism) के सिद्धांत और इतिहास।
  • गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के वार्षिक विवरण (1983-1994), जहाँ आचार्य गोवर्धन शास्त्री पुरस्कारों का ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है।
  • प्रातिशाख्य और वैदिक स्वर-प्रक्रिया का विश्लेषणात्मक अध्ययन।
  • आर्य समाज और वैदिक संहिताओं का प्रकाशन इतिहास।

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