स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक: वैदिक निरुक्त और अथर्ववेद के सुगम भाष्यकार | Swami Brahmamuni Paribrajaka

Sooraj Krishna Shastri
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स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक: वैदिक निरुक्त और अथर्ववेद के सुगम भाष्यकार

स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक: वैदिक निरुक्त और अथर्ववेद के सुगम भाष्यकार

आधुनिक वैदिक पुनर्जागरण के वह सर्वोच्च संन्यासी विद्वान, जिन्होंने महर्षि यास्क के क्लिष्ट 'निरुक्त' शास्त्र को अपनी 'निरुक्त सम्मर्श' टीका से अत्यंत सुगम बना दिया, और वेदों में छिपे विज्ञान (विमान-विद्या) को प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत किया।

1. प्रस्तावना: वेदार्थ की कुंजी 'निरुक्त' और भाष्य की आवश्यकता

भारतीय ज्ञान-परम्परा में यह एक अटल सिद्धांत है कि छः वेदांगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) के ज्ञान के बिना वेदों का अर्थ समझना असंभव है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने वेदों की 'यौगिक' (Derivative) व्याख्या को अनिवार्य बताया था, जिसका मूल आधार महर्षि यास्क द्वारा रचित 'निरुक्त' (Etymology/Philology) है।

किन्तु यास्क का निरुक्त स्वयं में अत्यंत क्लिष्ट और सूत्रबद्ध (Sutra-like) है। आम अध्येताओं और संस्कृत के साधारण विद्यार्थियों के लिए इसे समझना लोहे के चने चबाने के समान था। इस कठिन समस्या का समाधान बीसवीं शताब्दी में स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक (Swami Brahmamuni Parivrajak) ने किया। उन्होंने निरुक्त पर एक ऐसा सरल, तार्किक और विस्तृत भाष्य लिखा, जिसने आधुनिक वैदिक शोधार्थियों के लिए वेदार्थ के बंद दरवाज़े खोल दिए। इसके अतिरिक्त उनका 'अथर्ववेद' का भाष्य आज भी अकादमिक जगत में मानक (Standard) माना जाता है।

📌 स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक: एक अकादमिक एवं आध्यात्मिक प्रोफाइल
पूरा नाम स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक (उपाधि: विद्यामार्तण्ड)
काल निर्धारण जन्म: 1893 ई. – मृत्यु: 1968 ई.
वैचारिक पृष्ठभूमि आर्य समाज, संन्यास आश्रम, वैदिक विज्ञान-दृष्टि
मुख्य शोध क्षेत्र निरुक्त (Etymology), अथर्ववेद, वैदिक विज्ञान (Vimana Vidya), दर्शनशास्त्र
महानतम कृति निरुक्त सम्मर्श (Nirukta Sammarsha) - निरुक्त की विस्तृत संस्कृत-हिंदी व्याख्या
अन्य प्रमुख ग्रन्थ अथर्ववेद भाष्य, वेदों में विमान-विद्या, दयानन्द दर्शन, वेदान्त दर्शन भाष्य

2. जीवन और संन्यास: एक परिव्राजक की ज्ञान-यात्रा

स्वामी ब्रह्ममुनि का जन्म 1893 में हुआ था। युवावस्था में ही महर्षि दयानन्द सरस्वती के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने अपना जीवन वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार और साहित्य-सृजन के लिए समर्पित कर दिया।

उन्होंने 'परिव्राजक' (Wandering Monk) के रूप में संन्यास की दीक्षा ली। एक संन्यासी का मुख्य कर्म 'ज्ञान का दान' (Distribution of Knowledge) होता है। स्वामी जी ने देश भर का भ्रमण किया, किन्तु उनका मुख्य केंद्र वैदिक साहित्य का 'स्वाध्याय' और 'लेखन' रहा। उन्हें उनके अगाध पाण्डित्य के लिए गुरुकुलों और आर्य विद्वत-सभाओं द्वारा 'विद्यामार्तण्ड' (Sun of Knowledge) की उपाधि से विभूषित किया गया था।

3. मास्टरपीस: 'निरुक्त सम्मर्श' - यास्क मुनि की सुगम व्याख्या

महर्षि यास्क का 'निरुक्त' वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति (Origin of words) का विज्ञान है। पाश्चात्य विद्वानों ने जब इसका अनुवाद किया, तो वे कई स्थानों पर इसके गूढ़ार्थों को समझ नहीं पाए। प्राचीन भारतीय भाष्यकार 'दुर्गाचार्य' की टीका भी अत्यंत कठिन थी।

स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'निरुक्त सम्मर्श' नाम से निरुक्त का एक अत्यंत सुबोध और विस्तृत भाष्य लिखा।

  • सुगम संस्कृत-हिंदी व्याख्या: उन्होंने पहले यास्क के सूत्रों को सरल संस्कृत (संस्कृत टीका) में समझाया, और फिर उसका हिंदी में अत्यंत स्पष्ट अनुवाद प्रस्तुत किया।
  • पाणिनीय व्याकरण का समन्वय: उन्होंने प्रत्येक वैदिक शब्द की सिद्धि (Derivation) पाणिनीय 'उणादि सूत्रों' और अष्टाध्यायी के नियमों के आधार पर करके दिखाई, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि निरुक्त की व्युत्पत्तियाँ मनगढ़ंत नहीं, बल्कि कठोर व्याकरणिक नियमों पर आधारित हैं।

4. यौगिक अर्थ-प्रक्रिया: शब्दों का धातु-मूलक वैज्ञानिक विश्लेषण

पाश्चात्य 'Philology' और यास्क के 'निरुक्त' में एक बड़ा वैचारिक अंतर है। स्वामी ब्रह्ममुनि ने अपने भाष्य में "सर्वाणि नामानि आख्यातजानि" (सभी संज्ञाएँ क्रियाओं/धातुओं से उत्पन्न हुई हैं) सिद्धांत को सैकड़ों उदाहरणों से सिद्ध किया।

"तद्यत्र स्वरादयो न विद्यन्ते, तत्राप्यक्षराश्रयान्निब्र्रूयात्" (निरुक्त 2.1)
(जहाँ शब्दों की सिद्धि व्याकरण से स्पष्ट न हो, वहाँ केवल अक्षरों के अर्थ के आधार पर शब्द का अर्थ खोजना चाहिए।)
निरुक्त सम्मर्श का एक उदाहरण

स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि वैदिक शब्दों के अर्थ 'रूढ़' (Fixed) नहीं होते। उदाहरणार्थ, शब्द 'असुर'

लौकिक संस्कृत में 'असुर' का अर्थ 'राक्षस' या 'दानव' है। किन्तु 'निरुक्त सम्मर्श' में स्वामी जी ने यास्क का हवाला देते हुए बताया कि वेदों में 'असुर' शब्द 'असु' (प्राण) + 'र' (वाला) से बना है। अर्थात् 'जिसके पास असीम प्राण-शक्ति है'। इसीलिए ऋग्वेद में कई स्थानों पर साक्षात् 'परमात्मा' या 'इन्द्र' को 'असुर' (शक्तिमान) कहा गया है। इस भाष्य ने वेदों के अर्थ को मध्यकालीन पौराणिक भ्रांतियों से पूरी तरह मुक्त कर दिया।

5. अथर्ववेद भाष्य: विज्ञान, आयुर्वेद और राष्ट्रनीति का रहस्योद्घाटन

'निरुक्त सम्मर्श' के बाद स्वामी ब्रह्ममुनि का दूसरा सबसे बड़ा भगीरथ कार्य 'अथर्ववेद' का सम्पूर्ण भाष्य करना था। उन्नीसवीं सदी में पाश्चात्य विद्वानों (ग्रिफिथ आदि) ने अथर्ववेद को 'जादू-टोने और तंत्र-मंत्र' (Magic and Witchcraft) की किताब कहकर प्रचारित किया था।

स्वामी जी ने इस कलंक को धोते हुए अथर्ववेद का विशुद्ध वैज्ञानिक और आधिभौतिक (Physical/Scientific) भाष्य प्रस्तुत किया।

  • आयुर्वेद (Medical Science): उन्होंने अथर्ववेद के मंत्रों में वर्णित 'रोगों' (जैसे यक्ष्मा/टीबी, ज्वर) और उनके निवारण के लिए बताई गई 'औषधियों' का आयुर्वेदिक संदर्भो के साथ सटीक वर्णन किया। उन्होंने सिद्ध किया कि वेदों में 'कृमि' (Worms/Bacteria) से होने वाले रोगों का पूरा सूक्ष्म-विज्ञान (Microbiology) मौजूद है।
  • राष्ट्र-निर्माण: भूमि सूक्त, ब्रह्मचर्य सूक्त और सभा-समिति के सूक्तों की व्याख्या कर उन्होंने अथर्ववेद को राजनीति और समाजशास्त्र का सर्वोच्च ग्रन्थ सिद्ध किया।

6. वेदों में 'विमान-विद्या' (Aeronautics) और भौतिक विज्ञान

स्वामी ब्रह्ममुनि का एक अत्यंत रोचक और वैज्ञानिक शोध-ग्रंथ है: "वेदों में विमान विद्या" (Vimana Vidya in Vedas)

वैदिक भौतिकी (Vedic Physics)

महर्षि दयानन्द ने 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' में 'अश्विनौ' (Ashvins) देवताओं के रथों की व्याख्या जल, थल और वायु में चलने वाले यानों (Vimanas) के रूप में की थी।

स्वामी ब्रह्ममुनि ने इसी बीज-रूप विचार को विस्तार दिया। उन्होंने ऋग्वेद के मंत्रों (जैसे "त्रिबंधुरेण त्रिवृता रथेन...") का विश्लेषण कर बताया कि प्राचीन भारत में यांत्रिक विद्या (Mechanical Engineering) अत्यंत उन्नत थी। उन्होंने महर्षि भारद्वाज कृत 'यंत्र सर्वस्व' के सन्दर्भों को वेदों के साथ जोड़कर वायुयान निर्माण की सैद्धांतिक (Theoretical) प्रक्रिया को स्पष्ट किया। यह पुस्तक वेदों को धर्मग्रंथ की बजाय 'विज्ञान की पुस्तक' सिद्ध करने का एक बहुत बड़ा प्रयास थी।

7. दार्शनिक और उपनिषद भाष्य

एक संन्यासी होने के नाते उनका जीवन 'दर्शन' (Philosophy) में रमता था। व्याकरण और वेद के साथ-साथ उन्होंने दर्शनशास्त्र पर भी विपुल साहित्य रचा।

उन्होंने 'वेदान्त दर्शन' (ब्रह्मसूत्र) पर एक उत्कृष्ट भाष्य लिखा, जो शंकराचार्य के अद्वैतवाद की बजाय महर्षि दयानन्द के 'त्रैतवाद' (ईश्वर, जीव, और प्रकृति की अनादि सत्ता) पर आधारित था। इसके अतिरिक्त 'दयानन्द दर्शन' नामक पुस्तक लिखकर उन्होंने स्वामी दयानन्द की दार्शनिक मान्यताओं को एक व्यवस्थित 'सिस्टम' के रूप में विश्व के सामने प्रस्तुत किया।

8. निष्कर्ष: आधुनिक वैदिक साहित्य के प्रकाश-स्तंभ

स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक (1893–1968) का सम्पूर्ण जीवन ज्ञान की एक अनवरत यज्ञ-वेदी था। उन्होंने अपने जीवनकाल में जितना विशाल और उच्च-स्तरीय साहित्य सृजित किया, वह किसी भी एक विश्वविद्यालय के पूरे विभाग (Department) के कार्य से अधिक है।

आज जब भी कोई शोधार्थी वेदों का सही अर्थ जानने के लिए यास्क के 'निरुक्त' का आश्रय लेता है, तो उसे स्वामी ब्रह्ममुनि के 'निरुक्त सम्मर्श' से ही होकर गुज़रना पड़ता है। उन्होंने वेदों को पाश्चात्य और मध्यकालीन कुव्याख्याओं से निकालकर, उन्हें 'यौगिक अर्थ' की उस वैज्ञानिक वेदी पर स्थापित किया, जहाँ वेद सम्पूर्ण मानव-जाति के लिए विज्ञान, आयुर्वेद, समाजशास्त्र और अध्यात्म का अक्षय स्रोत बन जाते हैं। आर्य समाज और सम्पूर्ण संस्कृत-जगत इस महान परिव्राजक का युगों-युगों तक ऋणी रहेगा।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • निरुक्त सम्मर्श (यास्क निरुक्त की व्याख्या) - स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक।
  • अथर्ववेद भाष्य (विभिन्न खण्ड) - स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक।
  • वेदों में विमान विद्या (Vedic Aeronautics) - स्वामी ब्रह्ममुनि।
  • दयानन्द दर्शन एवं वेदान्त दर्शन भाष्य - स्वामी ब्रह्ममुनि।
  • आर्य समाज का इतिहास और उसके संन्यासी विद्वानों का अवदान।

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