आचार्य मैत्रेयनाथ: योगाचार दर्शन के प्रवर्तक, असंग के गुरु और 'विज्ञानवाद' के तार्किक ऋषि
भारतीय दर्शन के इतिहास में मैत्रेय (Maitreya) का नाम एक रहस्य और श्रद्धा का विषय रहा है। जहाँ आम बौद्ध अनुयायी उन्हें 'भावी बुद्ध' (Future Buddha) के रूप में पूजते हैं, वहीं दर्शनशास्त्र के गंभीर विद्यार्थी उन्हें आचार्य मैत्रेयनाथ (Maitreya-natha) के रूप में जानते हैं। वे 4थी शताब्दी के एक महान ऐतिहासिक दार्शनिक थे, जिन्होंने महायान बौद्ध धर्म में 'योगाचार' (Yogacara) या 'विज्ञानवाद' (Vijnanavada) की नींव रखी। उन्होंने नागार्जुन के 'शून्यवाद' (Madhyamaka) की कठोर तार्किकता और 'सर्वास्तिवाद' के यथार्थवाद के बीच एक 'मध्यम मार्ग' निकाला।
| पूरा नाम | आचार्य मैत्रेयनाथ (Maitreya-natha) |
| काल | लगभग 270–350 ईस्वी (गुप्त काल के आरंभिक वर्ष) |
| शिष्य | आचार्य असंग (Asanga) |
| संप्रदाय | योगाचार (Yogacara) / विज्ञानवाद |
| प्रमुख सिद्धांत | विज्ञप्तिमात्रता (Consciousness Only), त्रिरस्वभाव, तथागतगर्भ |
| प्रमुख ग्रंथ | महायानसूत्रालंकार, अभिसमयालंकार, मध्यांतविभाग, धर्मधर्मताविभाग, रत्नगोत्रविभाग |
2. ऐतिहासिक पहचान: असंग के गुरु
परंपरागत कथाओं के अनुसार, महान बौद्ध विद्वान असंग (Asanga) ने 12 वर्षों तक गुफा में तपस्या की ताकि वे मैत्रेय बुद्ध के दर्शन कर सकें। जब वे निराश होकर लौटने लगे, तो उन्होंने एक घायल कुत्ते को देखा, जिसके घावों में कीड़े पड़े थे। करुणावश असंग ने अपनी जीभ से कीड़े निकालने की कोशिश की। तभी कुत्ता गायब हो गया और वहां मैत्रेय प्रकट हुए। वे असंग को तुषित स्वर्ग (Tushita Heaven) ले गए और वहां उन्हें पाँच ग्रंथ सुनाए।
आधुनिक मत: आधुनिक इतिहासकारों (जैसे एरिक फ्रॉवालनर और जी. तुच्ची) का मानना है कि 'मैत्रेय' तुषित स्वर्ग के देवता नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक मानव गुरु मैत्रेयनाथ थे। वे असंग के शिक्षक थे। असंग ने अपने गुरु के प्रति आदर व्यक्त करने के लिए अपनी रचनाओं का श्रेय उन्हें दिया, जिससे बाद में 'भावी बुद्ध' के साथ उनका नाम जुड़ गया।
3. योगाचार दर्शन: 'चित्त' की प्रधानता
मैत्रेयनाथ ने जिस दर्शन की नींव रखी, उसे योगाचार कहते हैं क्योंकि यह 'योग' (ध्यान साधना) और 'आचार' (आचरण) पर बल देता है। इसे विज्ञानवाद भी कहते हैं।
मूल तर्क: मैत्रेय ने तर्क दिया कि संसार में जो कुछ भी हम देखते हैं, वह 'विज्ञप्तिमात्र' (Consciousness Only) है। बाहर कोई वस्तु नहीं है, सब कुछ मन का प्रक्षेपण (Projection) है।
जैसे सपने में हम हाथी देखते हैं, जबकि वहां हाथी नहीं होता, केवल मन होता है। उसी तरह जाग्रत अवस्था में भी जगत मन की रचना है।
4. तर्कशास्त्र: त्रिरस्वभाव का सिद्धांत (Three Natures)
नागार्जुन का 'शून्यवाद' कहता था कि "सब कुछ शून्य है।" इससे लोगों को लगा कि कुछ भी सच नहीं है (नास्तिकता)। मैत्रेयनाथ ने इस भ्रांति को दूर करने के लिए एक अत्यंत सूक्ष्म तार्किक ढांचा दिया जिसे 'त्रिरस्वभाव' (Three Natures) कहते हैं। यह सत्य को देखने के तीन स्तर हैं:
यह पूर्णतः असत्य है। जैसे अंधेरे में रस्सी को 'सांप' समझ लेना। सांप केवल हमारी कल्पना है, उसका कोई अस्तित्व नहीं है। (यह सामान्य अज्ञानी की दृष्टि है)।
यह सापेक्ष सत्य है। यह वह 'रस्सी' है जो धागों और स्थितियों पर निर्भर है। यह सांप नहीं है, लेकिन इसका अस्तित्व कारणों (Causes and Conditions) पर टिका है। यह विज्ञान (Consciousness) का प्रवाह है।
यह परम सत्य है। जब हम रस्सी को 'रस्सी' के रूप में ही देख लेते हैं और 'सांप' का भ्रम पूरी तरह मिट जाता है। यह शून्यता की अवस्था है—जहाँ न तो कल्पित सांप है, और न ही रस्सी का अहंकार। केवल 'तथता' (Suchness) है।
5. पंच-मैत्रेय ग्रंथ: दर्शन के पांच स्तंभ
मैत्रेयनाथ के नाम से पांच प्रमुख ग्रंथ (The Five Dharmas of Maitreya) प्रसिद्ध हैं, जो महायान बौद्ध दर्शन और तर्कशास्त्र के आधारस्तंभ हैं:
- अभिसमयालंकार (Ornament of Realization): इसमें 'प्रज्ञापारमिता' सूत्रों की व्याख्या है। यह बताता है कि एक बोधिसत्व बुद्ध बनने की यात्रा (8 स्तरों में) कैसे करता है।
- महायानसूत्रालंकार (Ornament of Mahayana Sutras): यह महायान बौद्ध धर्म का एक व्यवस्थित मैनुअल है। इसमें बताया गया है कि महायान, हीनयान से श्रेष्ठ क्यों है।
- मध्यांतविभाग (Distinguishing the Middle from the Extremes): यह नागार्जुन के 'मध्यम मार्ग' की तार्किक व्याख्या है। यह बताता है कि 'अस्तित्व' (Existence) और 'नास्तित्व' (Non-existence) के दोनों छोरों (Extremes) को कैसे छोड़ा जाए।
- धर्मधर्मताविभाग (Distinguishing Phenomena and Numena): यह दृश्य जगत (Phenomena) और परम सत्य (Numena) के बीच का अंतर स्पष्ट करता है।
- रत्नगोत्रविभाग (Uttaratantra Shastra): यह 'बुद्ध-धातु' (Buddha Nature) पर सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है।
6. तथागतगर्भ: बुद्धत्व का तर्क
मैत्रेयनाथ का एक क्रांतिकारी दार्शनिक योगदान 'तथागतगर्भ' (Tathagatagarbha) का सिद्धांत था।
तर्क: "यदि सभी प्राणी बुद्ध बन सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि बुद्ध बनने का 'बीज' (Seed) उनमें पहले से मौजूद होना चाहिए। यदि दूध में घी न हो, तो मथने पर घी नहीं निकलेगा। उसी प्रकार, यदि हमारे अंदर बुद्ध-स्वभाव न हो, तो साधना करने पर भी बुद्धत्व नहीं मिलेगा।"
मैत्रेय ने कहा कि हर प्राणी के अंदर एक 'तथागत' (बुद्ध) गर्भ में छिपा बैठा है, बस अज्ञान की धूल हटानी है। यह सिद्धांत बाद में चीन और जापान (Zen Buddhism) में बहुत लोकप्रिय हुआ।
7. निष्कर्ष: मैत्रेय की दार्शनिक विरासत
आचार्य मैत्रेयनाथ ने बौद्ध दर्शन को केवल 'शून्यता' (Emptiness) के नकारात्मक दिखने वाले तर्क से बाहर निकालकर उसे एक 'सकारात्मक मनोविज्ञान' (Positive Psychology) का रूप दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि 'शून्य' का अर्थ 'कुछ नहीं' नहीं है, बल्कि 'पूर्णता' है।
उनके शिष्य असंग और वसुबंधु ने उनके विचारों को और पल्लवित किया, जिससे बाद में दिग्नाग और धर्मकीर्ति जैसे महान नैयायिकों (Logicians) का जन्म हुआ। आज जब हम 'Mind-Only' (मात्र चित्त) दर्शन की बात करते हैं, तो हम अनजाने में आचार्य मैत्रेयनाथ के तर्कों का ही प्रयोग कर रहे होते हैं। वे आकाश के देवता होने से पहले धरती के एक महान दार्शनिक थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- Maitreya's Distinguishing the Middle from the Extremes - (Tr. by D'Amato).
- On Being and What There Is (Abhidharma Studies) - Frauwallner.
- Mahayanasutralankara - (S. Levi / Hindi Tr.).
- A History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta.
- The Buddha Within (Tathagatagarbha Doctrine) - S.K. Hookham.
