आचार्य वसुमित्र: सर्वास्तिवाद के सूर्य, 'महाविभाषा' के प्रणेता और चतुर्थ बौद्ध संगीति के अध्यक्ष
भारतीय दर्शन के इतिहास में, विशेषकर बौद्ध 'अभिधम्म' (Abhidharma) परंपरा में, आचार्य वसुमित्र (Vasumitra) का नाम एक महान तार्किक और व्यवस्थापक के रूप में लिया जाता है। वे दूसरी शताब्दी ईस्वी (2nd Century CE) के सबसे प्रभावशाली दार्शनिक थे। जब सम्राट कनिष्क ने कश्मीर में ऐतिहासिक चतुर्थ बौद्ध संगीति (Fourth Buddhist Council) का आयोजन किया, तो 500 अरहतों (ज्ञानियों) ने एक स्वर में वसुमित्र को अपना अध्यक्ष चुना था। उन्होंने 'समय' (Time) और 'अस्तित्व' (Existence) की गुत्थी को सुलझाते हुए वह सिद्धांत दिया, जिसने 'सर्वास्तिवाद' (सब कुछ है) संप्रदाय को स्थापित किया।
- 1. प्रस्तावना: बौद्ध जगत के चार सूर्य
- 2. जीवन और काल: कनिष्क का युग
- 3. चतुर्थ बौद्ध संगीति: महाविभाषा का जन्म
- 4. सर्वास्तिवाद का दर्शन: "सर्वम् अस्ति" (सब कुछ है)
- 5. काल का सिद्धांत (Theory of Time): वसुमित्र का तर्क
- 6. प्रमुख कृतियाँ: प्रकरणपाद और सम्प्रदाय-भेद
- 7. निष्कर्ष: वसुमित्र का दार्शनिक प्रभाव
| नाम | आचार्य वसुमित्र (Vasumitra) |
| उपाधि | महाविभाषा-शास्त्री, संगीति-अध्यक्ष |
| काल | द्वितीय शताब्दी ईस्वी (कनिष्क का समकालीन) |
| स्थान | गांधार / कश्मीर |
| संप्रदाय | सर्वास्तिवाद (वैभाषिक) |
| प्रमुख योगदान | अवस्था-अन्यथात्व (Theory of State-change), महाविभाषा शास्त्र का संपादन |
| ग्रंथ | प्रकरणपाद, महाविभाषा (सह-लेखन), समयभेदोपरचनचक्र |
2. जीवन और काल: कनिष्क का युग
वसुमित्र कुषाण सम्राट कनिष्क (78–101 CE) के समकालीन थे। उस समय बौद्ध धर्म 18 अलग-अलग संप्रदायों में बंटा हुआ था और उनके बीच घोर दार्शनिक मतभेद थे। वसुमित्र का जन्म गांधार (उत्तरी पाकिस्तान) क्षेत्र में हुआ माना जाता है।
बौद्ध इतिहास में उस समय को 'चार सूर्यों का युग' कहा जाता है। ये चार महान विद्वान थे:
1. अश्वघोष (कवि और नाटककार)
2. नागार्जुन (शून्यवाद के जनक)
3. आर्यदेव (या कुमारलात)
4. वसुमित्र (सर्वास्तिवाद के तार्किक)
3. चतुर्थ बौद्ध संगीति: महाविभाषा का जन्म
सम्राट कनिष्क बौद्ध धर्म के विभिन्न मतों को लेकर भ्रमित थे। उन्होंने वसुमित्र से सलाह ली। वसुमित्र के सुझाव पर कनिष्क ने कश्मीर के कुंडलवन में चतुर्थ बौद्ध संगीति बुलाई।
इस संगीति में 500 विद्वान एकत्र हुए। वसुमित्र को इसका अध्यक्ष और महान कवि अश्वघोष को उपाध्यक्ष बनाया गया।
यहाँ एक विशाल ग्रंथ तैयार किया गया—'महाविभाषा शास्त्र' (Great Commentary)। यह ग्रंथ इतना विशाल और जटिल था कि इसे 'वैभाषिक' दर्शन का आधार माना गया। वसुमित्र ने इसमें बौद्ध त्रिपिटक की दार्शनिक व्याख्या की और विरोधियों के तर्कों का खंडन किया।
4. सर्वास्तिवाद का दर्शन: "सर्वम् अस्ति"
वसुमित्र जिस दर्शन के प्रधान थे, उसे सर्वास्तिवाद (Sarvastivada) कहते हैं। इसका अर्थ है—"सर्वम् अस्ति" (Everything Exists)।
- मूल समस्या: बौद्ध धर्म मानता है कि सब कुछ 'क्षणिक' (Momentary) है। अगर सब कुछ हर पल नष्ट हो रहा है, तो हमें पिछले पल की याद कैसे रहती है? कर्म का फल भविष्य में कैसे मिलता है?
- वसुमित्र का उत्तर: उन्होंने कहा कि 'द्रव्य' (Substance/Dharma) तीनों कालों (भूत, भविष्य, वर्तमान) में अस्तित्व में रहता है। केवल उसकी 'अवस्था' (Mode) बदलती है।
5. काल का सिद्धांत (Theory of Time): वसुमित्र का तर्क
वसुमित्र का सबसे बड़ा तार्किक योगदान 'काल' (Time) की व्याख्या है। उस समय सर्वास्तिवाद के अंदर ही चार बड़े विद्वान थे जिन्होंने समय को अलग-अलग तरह से समझाया। वसुमित्र के तर्क को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया।
वे चार मत इस प्रकार थे:
- धर्मत्रात (भाव-अन्यथात्व): वस्तु का 'स्वरूप' बदलता है, द्रव्य नहीं। (जैसे सोने के कंगन को गलाकर कुंडल बना देना)।
- घोष (लक्षण-अन्यथात्व): जब वस्तु वर्तमान में होती है, तो उसमें अतीत और भविष्य के लक्षण भी छिपे होते हैं।
- बुद्धदेव (अन्योन्यथात्व): वस्तु का नाम उसके संबंध (Relativity) से बदलता है। (जैसे एक ही औरत किसी की माँ है, किसी की बेटी)।
- वसुमित्र (अवस्था-अन्यथात्व) - (The Winner):
वसुमित्र ने कहा: "द्रव्य (Dharma) वही रहता है, केवल उसकी क्रियाकारिता (Activity/Karitra) या अवस्था (State) बदलती है।"
वसुमित्र ने अपने तर्क को समझाने के लिए एक बहुत ही सुंदर गणितीय उदाहरण दिया (जिसे अब Abacus Analogy कहते हैं):
"जैसे गणना करने वाली गुटिका (Bead/Ball) जब इकाई (Unit) के स्थान पर रखी जाती है, तो उसका मान 'एक' (1) होता है। जब वही गुटिका दहाई (Tens) के स्थान पर रखी जाती है, तो उसका मान 'दस' (10) होता है। और सैकड़ा (Hundreds) के स्थान पर 'सौ' (100) होता है।
गुटिका वही है, लेकिन स्थान (अवस्था) बदलने से उसका मूल्य (Value) बदल जाता है। इसी प्रकार, धर्म (Entity) जब अपनी क्रिया नहीं कर रहा होता, तो 'भविष्य' है। जब क्रिया कर रहा होता है, तो 'वर्तमान' है। और जब क्रिया समाप्त कर चुका होता है, तो 'भूत' है।"
6. प्रमुख कृतियाँ: प्रकरणपाद और सम्प्रदाय-भेद
वसुमित्र ने तर्कशास्त्र और दर्शन पर कई ग्रंथ लिखे, जिनमें से अधिकांश के मूल संस्कृत रूप लुप्त हो गए हैं, पर चीनी अनुवाद (ह्वेनसांग द्वारा) उपलब्ध हैं।
- प्रकरणपाद (Prakaranapada): यह सर्वास्तिवाद के 7 मूल अभिधम्म ग्रंथों में से एक है। इसमें उन्होंने चित्त (Mind) और चैतसिकों (Mental Factors) का तार्किक वर्गीकरण किया है।
- समयभेदोपरचनचक्र (Origin and Doctrines of Early Buddhist Schools): यह इतिहास और दर्शन का मिश्रण है। इसमें उन्होंने बौद्ध धर्म के 18 संप्रदायों की उत्पत्ति और उनके दार्शनिक मतभेदों का निष्पक्ष वर्णन किया है। यह ग्रंथ आज भी बौद्ध इतिहास जानने का सबसे बड़ा स्रोत है।
- महाविभाषा (संपादक के रूप में): यद्यपि यह सामूहिक रचना थी, पर इसके मुख्य सूत्रधार वसुमित्र ही थे।
7. निष्कर्ष: वसुमित्र का दार्शनिक प्रभाव
आचार्य वसुमित्र ने बौद्ध दर्शन को 'हवा' से उतारकर 'जमीन' पर खड़ा किया। उन्होंने 'शून्यवाद' (सब कुछ शून्य है) के विरुद्ध 'अस्तिवाद' (सब कुछ है) का झंडा बुलंद किया।
उनका प्रभाव इतना गहरा था कि बाद के महान आचार्य वसुबंधु (4थी सदी) ने अपने ग्रंथ 'अभिधर्मकोश' में जब भी काल (Time) की चर्चा की, तो उन्होंने वसुमित्र के सिद्धांत को ही प्रामाणिक माना। वसुमित्र ने सिद्ध किया कि तर्कशास्त्र का काम केवल बहस करना नहीं, बल्कि समय और अस्तित्व जैसे जटिल प्रश्नों को सुलझाना है। वे भारतीय दर्शन के 'आइंस्टीन' थे जिन्होंने सापेक्षता और समय का अपना सिद्धांत दिया।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- अभिधर्मकोश - आचार्य वसुबंधु (काल निर्देश खंड)।
- Buddhist Logic - Th. Stcherbatsky.
- Sarvastivada Buddhist Scholasticism - Charles Willemen.
- History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta.
- Origin and Doctrines of Early Buddhist Schools - Vasumitra (Tr. by Masuda).
