शंकरमिश्र: वैशेषिक दर्शन के उद्धारक, 'उपस्कार' के रचयिता और मिथिला के महान नैयायिक | Shankar Mishra

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य शंकरमिश्र: वैशेषिक दर्शन के 'उपस्कारक' और मिथिला के दार्शनिक सूर्य

आचार्य शंकरमिश्र: वैशेषिक दर्शन के अंतिम स्तंभ, 'उपस्कार' के रचयिता और मिथिला के गौरव

भारतीय दर्शन के इतिहास में 15वीं शताब्दी का कालखंड 'नवजागरण' का काल था, विशेषकर न्याय और वैशेषिक दर्शन के लिए। जब प्राचीन वैशेषिक दर्शन (परमाणुवाद और पदार्थ विज्ञान) न्याय दर्शन के बढ़ते प्रभाव के कारण लुप्त होने के कगार पर था, तब मिथिला की धरती से एक युवा प्रतिभा का उदय हुआ—महामहोपाध्याय शंकरमिश्र (Shankar Mishra)। उन्होंने महर्षि कणाद के सूत्रों पर 'वैशेषिक सूत्र उपस्कार' नामक टीका लिखकर इस दर्शन को पुनर्जीवित कर दिया। आज यदि हम कणाद के वास्तविक विचारों को समझ पाते हैं, तो उसका श्रेय केवल शंकरमिश्र को जाता है।

📌 आचार्य शंकरमिश्र: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम शंकरमिश्र (Shankar Mishra)
उपाधि महामहोपाध्याय, बाल-कवि, वैशेषिक-उद्धारक
काल 15वीं शताब्दी (लगभग 1450 ईस्वी)
जन्म स्थान सरिसव-पाही ग्राम, मिथिला (बिहार)
पिता/गुरु भवननाथ मिश्र (उपाख्य: भवदेव)
संप्रदाय नव्य-न्याय एवं वैशेषिक
प्रमुख कृति वैशेषिक सूत्र उपस्कार (Upaskara), वादिनोद, कणाद-रहस्य

2. जीवन परिचय: मिथिला की विद्वत परंपरा

शंकरमिश्र का जन्म 15वीं शताब्दी के मध्य में मिथिला (वर्तमान उत्तर बिहार) के प्रसिद्ध गाँव सरिसव-पाही में हुआ था। यह गाँव विद्वानों की खान माना जाता था। उनके पिता भवननाथ मिश्र (जिन्हें 'अयचि' या 'भवदेव' भी कहा जाता है) स्वयं एक महान नैयायिक और मीमांसक थे।

मिथिला उस समय 'नव्य-न्याय' (New Logic) का केंद्र थी, जहाँ गंगेश उपाध्याय जैसे दिग्गजों ने तर्कशास्त्र की नई नींव रखी थी। शंकरमिश्र का लालन-पालन इसी अत्यंत बौद्धिक वातावरण में हुआ। उन्होंने अपने पिता से ही शास्त्रों का अध्ययन किया। उनके चाचा जीवनाथ मिश्र भी एक प्रसिद्ध विद्वान थे। इस प्रकार, शंकरमिश्र को ज्ञान विरासत में मिला था, जिसे उन्होंने अपनी प्रतिभा से और अधिक चमकाया।

3. बाल्यकाल की प्रतिभा: दरबारी कवि और बाल-पंडित

शंकरमिश्र बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। कहा जाता है कि मात्र 5 वर्ष की आयु में उन्होंने राजा के दरबार में श्लोक रचकर सुनाया था।

बाल कवि का श्लोक

एक किंवदंती के अनुसार, जब वे बहुत छोटे थे, तब वे मिथिला नरेश के दरबार में गए। राजा ने उनकी छोटी उम्र देखकर उपहास में पूछा कि क्या वे कुछ जानते हैं? बालक शंकर ने तुरंत संस्कृत में उत्तर दिया:

"बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पञ्चमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम्॥"
(हे जगदानंद! मैं शरीर से बालक हूँ, लेकिन मेरी सरस्वती (विद्या) बालिका नहीं है। मैं पांच वर्ष की आयु पूरी होने से पहले ही तीनों लोकों का वर्णन कर सकता हूँ।)

यह सुनकर राजा और सभासद दंग रह गए। उनकी यह आत्मविश्वास पूर्ण उक्ति आज भी संस्कृत जगत में प्रसिद्ध है।

4. उपस्कार टीका: कणाद के सूत्रों की संजीवनी

शंकरमिश्र की कीर्ति का अक्षय स्तंभ उनका ग्रंथ 'वैशेषिक सूत्र उपस्कार' (Vaisheshika Sutra Upaskara) है।

उस समय तक वैशेषिक दर्शन की स्थिति बहुत दयनीय हो गई थी। प्राचीन भाष्य (प्रशस्तपाद भाष्य) बहुत कठिन थे और मूल सूत्रों का अर्थ समझना मुश्किल हो रहा था। दूसरी ओर, न्याय दर्शन के विद्वान वैशेषिक के स्वतंत्र अस्तित्व को निगल रहे थे।

  • 'उपस्कार' का अर्थ: 'उपस्कार' का अर्थ है—सजाना या सहायता करना। शंकरमिश्र ने कणाद के संक्षिप्त और गूढ़ सूत्रों की विस्तृत व्याख्या करके उन्हें फिर से जीवित कर दिया।
  • महत्व: आज दुनिया भर में वैशेषिक दर्शन का अध्ययन शंकरमिश्र की इसी टीका के आधार पर किया जाता है। यदि 'उपस्कार' न होता, तो कणाद के कई सूत्रों का अर्थ हमेशा के लिए लुप्त हो जाता।

5. दार्शनिक योगदान: ईश्वर, अदृष्ट और परमाणु

शंकरमिश्र ने केवल व्याख्या नहीं की, बल्कि वैशेषिक दर्शन में कई नए आयाम भी जोड़े। उन्होंने न्याय और वैशेषिक के बीच के मतभेदों को कम किया।

1. ईश्वर की सिद्धि

प्राचीन वैशेषिक सूत्रों में ईश्वर का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, जिससे कुछ लोग इसे निरीश्वरवादी मानते थे। शंकरमिश्र ने अपने तर्कों से सिद्ध किया कि कणाद के सूत्रों में ईश्वर निहित है।
"संज्ञाकर्मत्वस्मद्विशिष्टानां लिंगम्" (सूत्र) की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि सृष्टि के आदि में परमाणुओं को गति देने वाला और वेदों का रचयिता ईश्वर ही है। उन्होंने ईश्वर को सृष्टि का 'निमित्त कारण' (Efficient Cause) माना।

2. अदृष्ट (Unseen Force)

विज्ञान (परमाणुवाद) और धर्म (कर्म फल) को कैसे जोड़ा जाए? शंकरमिश्र ने 'अदृष्ट' की अवधारणा को स्पष्ट किया।
जब चुंबक लोहे को खींचता है या जब आत्मा शरीर धारण करती है, तो इसके पीछे एक अदृश्य शक्ति कार्य करती है—यही 'अदृष्ट' है। यह हमारे पाप और पुण्य का संचित रूप है जो भौतिक जगत को प्रभावित करता है।

6. वादिनोद: शास्त्रार्थ जीतने की कला

शंकरमिश्र ने 'वादिनोद' (Vadinoda) नामक एक अद्भुत ग्रंथ लिखा। जैसा कि नाम से स्पष्ट है—"वाद" (Debate) + "विनोद" (Joy/Entertainment)। यह ग्रंथ शास्त्रार्थ करने और उसमें विजय प्राप्त करने की कला सिखाता है।

  • इसमें बताया गया है कि विपक्षी को कैसे चुप कराया जाए (निग्रहस्थान)।
  • छल, वितंडा और जाति (गलत तर्क) का प्रयोग कब और कैसे किया जाए (या कैसे पहचाना जाए)।
  • यह ग्रंथ उस समय की बौद्धिक प्रतिस्पर्धा और शास्त्रार्थ संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है।

7. न्याय-वैशेषिक समन्वय: भेदों का अंत

शंकरमिश्र को 'समन्वयवादी' (Syncretist) दार्शनिक माना जाता है। उनसे पहले न्याय और वैशेषिक एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी थे।

समान तंत्र (Allied Systems)

शंकरमिश्र ने दिखाया कि न्याय का 'प्रमाण' (Epistemology) और वैशेषिक का 'प्रमेय' (Metaphysics) एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने वैशेषिक के 7 पदार्थों को न्याय के 16 पदार्थों के साथ संगत किया। उनके प्रयासों के कारण ही बाद में दोनों दर्शन मिलकर "न्याय-वैशेषिक" एक ही संप्रदाय बन गए।

8. निष्कर्ष: शंकरमिश्र का ऐतिहासिक महत्व

आचार्य शंकरमिश्र मिथिला के अंतिम महान दार्शनिक दिग्गजों में से एक थे। उन्होंने एक ऐसे समय में कलम उठाई जब भारत में नवीन चिंतन धाराएँ उभर रही थीं। उन्होंने कणाद के भौतिकवाद (Physics) को आस्तिकता (Theism) के साथ ऐसे गूंथा कि वह भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बना रहा।

उनकी शैली सरल, स्पष्ट और तर्कपूर्ण थी। उन्होंने 'क्लिष्टता' के बजाय 'स्पष्टता' को चुना। आज जब भी कोई छात्र "द्रव्य, गुण, कर्म..." आदि वैशेषिक पदार्थों का अध्ययन करता है, तो वह अनजाने में शंकरमिश्र की ही व्याख्या को पढ़ रहा होता है। वे सचमुच वैशेषिक दर्शन के उद्धारक और मिथिला के गौरव-सूर्य थे।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • वैशेषिक सूत्र उपस्कार - शंकरमिश्र (चौखम्बा संस्कृत सीरीज)।
  • भारतीय दर्शन का इतिहास - डॉ. एस.एन. दासगुप्ता (Vol II)।
  • मिथिला का विद्वत समाज - डॉ. जयकांत मिश्र।
  • वादिनोद - गंगनाथ झा (अंग्रेजी अनुवाद)।
  • Nyaya-Vaisheshika History - Umesh Mishra.

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