आचार्य शंकर (Acharya Shankar)

Sooraj Krishna Shastri
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दो विद्वान शंकर: शंकर मिश्र (तर्कशास्त्री) और शंकर भट्ट (मीमांसक)

न्याय और धर्म के दो स्तंभ: शंकर मिश्र और शंकर भट्ट

एक तुलनात्मक अध्ययन (The Logician vs The Jurist)

भारतीय दर्शन के मध्यकाल (Medieval Period) में 'शंकर' नाम के दो ऐसे महान विद्वान हुए जिन्होंने अपनी मेधा से संस्कृत वाङ्मय को समृद्ध किया। एक थे शंकर मिश्र, जिन्होंने 'वैशेषिक दर्शन' के लुप्त होते ज्ञान को तर्कों से पुनर्जीवित किया। दूसरे थे शंकर भट्ट, जिन्होंने 'मीमांसा' और 'धर्मशास्त्र' के माध्यम से हिन्दू विधि (Hindu Law) और कर्मकांडों को व्यवस्थित किया। ये दोनों विद्वान अलग-अलग क्षेत्रों (मिथिला और काशी) से थे और इनके कार्यक्षेत्र भी भिन्न थे।

विवरण 1. शंकर मिश्र (Shankara Mishra) 2. शंकर भट्ट (Shankara Bhatta)
मुख्य क्षेत्र वैशेषिक और न्याय (Logic & Atomism) मीमांसा और धर्मशास्त्र (Rituals & Law)
स्थान / पीठ मिथिला (बिहार) - न्याय का केंद्र काशी (वाराणसी) - धर्मशास्त्र का केंद्र
अनुमानित काल 15वीं शताब्दी (लगभग 1450 ई.) 16वीं शताब्दी (लगभग 1550-1600 ई.)
प्रसिद्ध उपाधि उपस्कारकार (टीकाकार) भट्ट (मीमांसा के विद्वान)
महान कृति वैशेषिक सूत्रोपस्कार (Upaskara) धर्मद्वैतनिर्णय और विधिरत्न

1. शंकर मिश्र: वैशेषिक दर्शन के उद्धारक

शंकर मिश्र मिथिला (Mithila) की उस गौरवशाली परंपरा से आते हैं जहाँ 'नव्य-न्याय' (Neo-Logic) का जन्म हुआ। महर्षि कणाद के सूत्र अत्यंत संक्षिप्त और कठिन थे। शंकर मिश्र ने उन पर 'उपस्कार' (Upaskara) नामक भाष्य लिखकर उन्हें विद्वानों के लिए सुगम बनाया।

  • परमाणुवाद की रक्षा: उन्होंने तार्किक रूप से सिद्ध किया कि अदृश्य परमाणुओं में गति कैसे उत्पन्न होती है और वे कैसे जुड़कर सृष्टि बनाते हैं।
  • ईश्वर का तर्क: वैशेषिक दर्शन में ईश्वर की सत्ता को तार्किक रूप से स्थापित करने में इनका बड़ा योगदान है। उन्होंने कहा कि "परमाणुओं को जोड़ने वाला एक चेतन निमित्त कारण (ईश्वर) होना आवश्यक है।"
  • अन्य ग्रंथ: 'कणाद रहस्य' और 'वादि-विनोद' उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं जो वाद-विवाद (Debate) की कला सिखाती हैं।

2. शंकर भट्ट: मीमांसा और धर्म के व्यवस्थापक

शंकर भट्ट काशी के प्रसिद्ध 'भट्ट परिवार' के रत्न थे। उनके पिता नारायण भट्ट एक महान विद्वान थे। शंकर भट्ट का कार्यक्षेत्र 'पूर्व मीमांसा' था, जिसका अर्थ है वेदों के वाक्यों का सही अर्थ निकालना और धर्म के नियमों को तय करना।

  • विधि और निषेध: उन्होंने अपने ग्रंथ 'विधिरत्न' में समझाया कि वेदों में कौन सा कार्य 'करना ही चाहिए' (विधि) और कौन सा 'नहीं करना चाहिए' (निषेध)।
  • कानूनी योगदान: उनका ग्रंथ 'धर्मद्वैतनिर्णय' (Dharmadvaitanirnaya) उस समय के समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। जब दो धार्मिक नियमों में टकराव (Conflict) होता था, तो यह ग्रंथ निर्णय देता था कि किसे माना जाए।
  • मीमांसा बालप्रकाश: छात्रों के लिए उन्होंने मीमांसा दर्शन को सरल बनाने हेतु यह ग्रंथ लिखा।

निष्कर्ष: ज्ञान के दो प्रवाह

"एक ने जगत के 'पदार्थ' को समझा, दूजे ने वेद के 'अर्थ' को।"

शंकर मिश्र और शंकर भट्ट, दोनों ने 'शंकर' नाम की सार्थकता सिद्ध की। शंकर मिश्र ने हमें सिखाया कि भौतिक जगत (Physics) के नियमों को तर्क से कैसे समझा जाए, जबकि शंकर भट्ट ने सिखाया कि सामाजिक और धार्मिक जीवन (Jurisprudence) को नियमों से कैसे चलाया जाए। एक 'विज्ञान' के पक्षधर थे, तो दूसरे 'विधान' के। भारतीय ज्ञान परंपरा इन दोनों 'शंकरों' की सदैव ऋणी रहेगी।

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