महर्षि गोपथ : अथर्ववेद का एकमात्र और गौरवशाली ब्राह्मण ग्रंथ के रचनाकार
(Study of Gopatha Brahmana & Atharvavedic Tradition)
वैदिक वाङ्मय में 'ब्राह्मण' ग्रंथों का स्थान वेदों की व्याख्या और कर्मकांड के विनियोग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। महर्षि गोपथ द्वारा प्रणीत 'गोपथ ब्राह्मण' (Gopatha Brahmana) अथर्ववेद का एकमात्र उपलब्ध ब्राह्मण ग्रंथ है। जहाँ ऋग्वेद के पास ऐतरेय, यजुर्वेद के पास शतपथ और सामवेद के पास ताण्ड्य जैसे कई ब्राह्मण हैं, वहीं अथर्ववेद की सम्पूर्ण प्रयोगात्मक शक्ति इसी एक ग्रंथ में निहित है। यह ग्रंथ न केवल यज्ञों की विधियाँ बताता है, बल्कि सृष्टि की उत्पत्ति, ओंकार (ॐ) की महिमा और गायत्री मंत्र के सूक्ष्म रहस्यों पर भी प्रकाश डालता है।
| सम्बन्धित वेद | अथर्ववेद (Atharvaveda) |
| प्रणेता ऋषि | महर्षि गोपथ |
| शाखा | शौनक एवं पैप्पलाद शाखा से सम्बद्ध |
| संरचना | दो भाग (पूर्व गोपथ एवं उत्तर गोपथ) |
| कुल प्रपाठक (अध्याय) | 11 (5 पूर्व में, 6 उत्तर में) |
| मुख्य विषय | ओंकार महिमा, गायत्री, यज्ञ विधान, ब्रह्मा पुरोहित के कर्तव्य |
1. ग्रंथ की संरचना: पूर्व और उत्तर गोपथ
गोपथ ब्राह्मण दो स्पष्ट भागों में विभाजित है, जिनमें कुल 11 प्रपाठक और 258 कंडिकाएँ हैं:
- पूर्व गोपथ (Purva Gopatha): इसमें 5 प्रपाठक हैं। यह भाग मुख्य रूप से दार्शनिक और सैद्धांतिक है। इसमें ब्रह्मचर्य, दीक्षा, गायत्री मंत्र की व्याख्या और ओंकार (ॐ) की उत्पत्ति का अद्भुत विवरण मिलता है। इसमें ऋत्विकों के चयन और 'ब्रह्मा' के महत्व पर बल दिया गया है।
- उत्तर गोपथ (Uttara Gopatha): इसमें 6 प्रपाठक हैं। यह भाग पूर्णतः कर्मकांडीय (Ritualistic) है। इसमें विभिन्न यज्ञों जैसे—अश्वमेध, पुरुषमेध, अग्निष्टोम और सत्रादि का सूक्ष्म वर्णन है। यह अन्य ब्राह्मणों (जैसे शतपथ और ऐतरेय) के साथ सामंजस्य बिठाते हुए अथर्ववेद के विशिष्ट दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है।
2. दार्शनिक पक्ष: ओंकार और गायत्री की महिमा
महर्षि गोपथ ने ओंकार (ॐ) को सृष्टि का मूल माना है। उनके अनुसार, ओंकार से ही समस्त वेदों और ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है।
- ओंकार की व्याख्या: गोपथ ब्राह्मण विस्तार से बताता है कि कैसे 'अ', 'उ', और 'म' से मिलकर बना यह नाद ब्रह्म का स्वरूप है।
- गायत्री मंत्र: इसमें गायत्री के 24 अक्षरों की तुलना 24 प्राकृतिक तत्वों से की गई है। महर्षि गोपथ ने गायत्री को 'वेदों की माता' के रूप में प्रतिष्ठित करने में बड़ा योगदान दिया है।
- ब्रह्मचर्य: पूर्व गोपथ में विद्यार्थी (ब्रह्मचारी) के कर्तव्यों का अत्यंत आदर्श वर्णन है, जो शिक्षा पद्धति के प्राचीन गौरव को दर्शाता है।
3. 'ब्रह्मा' पुरोहित का महत्व और गोपथ
यज्ञ में चार मुख्य ऋत्विक (पुरोहित) होते हैं—होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा। अथर्ववेद का पुरोहित 'ब्रह्मा' कहलाता है।
गोपथ ब्राह्मण के अनुसार, ब्रह्मा यज्ञ का 'मन' है और शेष तीन ऋत्विक यज्ञ के 'अंग' हैं। जैसे बिना मन के शरीर गति नहीं कर सकता, वैसे ही बिना अथर्ववेदी 'ब्रह्मा' के यज्ञ सफल नहीं हो सकता। गोपथ मुनि ने ब्रह्मा के लिए मौन रहकर यज्ञ की रक्षा करने और त्रुटियों को सुधारने (प्रायश्चित) के कड़े नियम बताए हैं।
4. निष्कर्ष
महर्षि गोपथ द्वारा रचित यह ग्रंथ अथर्ववेद की आत्मा है। यह हमें सिखाता है कि यज्ञ केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि एक आंतरिक विज्ञान है। आज जब हम अथर्ववेद का अध्ययन करते हैं, तो गोपथ ब्राह्मण वह प्रकाश स्तंभ है जो हमें मंत्रों के गूढ़ अर्थों और उनके प्रयोग की दिशा दिखाता है। ओंकार से लेकर यज्ञ की पूर्णाहुति तक, गोपथ मुनि का यह योगदान सनातन धर्म की अमर विरासत है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- गोपथ ब्राह्मण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी भाष्य)।
- अथर्ववेद संहिता - शौनक शाखा।
- वैदिक साहित्य का इतिहास - आचार्य बलदेव उपाध्याय।
- The Gopatha Brahmana of the Atharva Veda - Rajendralal Mitra.
