आचार्य शांतिसूरि (शांतिनाथ): 'वादिवेताल', जैन तर्कशास्त्र के महायोद्धा और जीवाविचार के रचयिता | Acharya Shantisuri

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य शांतिसूरि (शांतिनाथ): 'वादिवेताल' और जैन तर्कशास्त्र के अजेय योद्धा

आचार्य शांतिसूरि (शांतिनाथ): 'वादिवेताल', जैन तर्कशास्त्र के महायोद्धा और जीवाविचार के रचयिता

भारतीय तर्कशास्त्र के मध्यकालीन इतिहास में 11वीं शताब्दी का समय 'शास्त्रार्थ' का स्वर्ण युग था। इस समय जैन, बौद्ध और वैदिक विद्वानों के बीच ज्ञान की तलवारें खिंची रहती थीं। इस दौर में जैन दर्शन की ओर से एक ऐसा योद्धा खड़ा हुआ जिसकी तर्कशक्ति के आगे बड़े-बड़े विद्वान पानी भरते थे। वे थे—आचार्य शांतिसूरि (जिन्हें 'शांतिनाथ' के नाम से भी स्मरण किया जाता है)। वे केवल एक संत नहीं थे, वे एक 'तार्किक-शिरोमणि' थे। उन्हें 'वादिवेताल' (Vadi-vetala) की उपाधि दी गई थी, जिसका अर्थ है—"वाद-विवाद का वह बेताल (भूत) जिसे कोई हरा न सके।"

📌 आचार्य शांतिसूरि: एक दार्शनिक प्रोफाइल
पूरा नाम आचार्य शांतिसूरि (Acharya Shantisuri)
उपाधि वादिवेताल (King of Debaters), युग-प्रधान
काल 11वीं शताब्दी (लगभग 1040 ईस्वी में स्वर्गवास)
गच्छ (परंपरा) थरापद्रा गच्छ (श्वेतांबर परंपरा)
समकालीन शासक राजा भोज (मालवा) और राजा भीमदेव (गुजरात)
प्रमुख ग्रंथ जीवाविचार (Jiva-Vichara), उत्तराध्ययन-बृहद्वृत्ति (शिष्यपाईय)
मुख्य योगदान 32 बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराना

2. जीवन और काल: थरापद्रा गच्छ के आचार्य

आचार्य शांतिसूरि का जन्म 11वीं शताब्दी के आरंभ में गुजरात या राजस्थान के क्षेत्र में हुआ था। उनके गुरु का नाम वर्धमान सूरि था। बचपन से ही उनकी बुद्धि अत्यंत कुशाग्र थी। उन्होंने जैन आगमों के साथ-साथ न्याय (Logic), व्याकरण और काव्यशास्त्र में महारत हासिल की। वे 'थरापद्रा गच्छ' के आचार्य बने और उन्होंने जैन धर्म को तर्कों के माध्यम से सुदृढ़ किया।

3. 'वादिवेताल' की उपाधि: अजेय तार्किक

उस समय भारत में यह परंपरा थी कि विद्वान एक-दूसरे को 'वाद' (Debate) की चुनौती देते थे। हारने वाले को अपना मत छोड़ना पड़ता था या अपमानित होना पड़ता था। शांतिसूरि ने अपने जीवन में अनगिनत शास्त्रार्थ किए और कभी पराजित नहीं हुए।

उनकी तर्क शैली इतनी आक्रामक और सटीक थी कि विरोधी विद्वान उन्हें देखते ही घबरा जाते थे। इसीलिए विद्वत समाज ने उन्हें 'वादिवेताल' (वाद-विवाद का बेताल) कहना शुरू कर दिया। यह उपाधि उनके प्रचंड पांडित्य का प्रतीक थी।

4. राजा भोज की सभा: 32 बौद्धों से ऐतिहासिक युद्ध

शांतिसूरि के जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटना मालवा के विद्वान राजा भोज (1010–1055 ई.) के दरबार में घटी।

एक बनाम बत्तीस

राजा भोज के दरबार में 32 प्रमुख बौद्ध विद्वान (तार्किक) आए हुए थे। वे जैन धर्म का खंडन कर रहे थे। उन्होंने चुनौती दी कि कोई जैन मुनि उनसे शास्त्रार्थ करे।

आचार्य शांतिसूरि ने चुनौती स्वीकार की। शास्त्रार्थ कई दिनों तक चला। विषय था—"ईश्वर कर्ता है या नहीं?" और "क्षणभंगुरवाद बनाम अनेकांतवाद"

शांतिसूरि ने अकेले ही उन 32 विद्वानों के तर्कों को एक-एक करके काट दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि यदि सब कुछ 'क्षणिक' (Momentary) है (जैसा बौद्ध मानते हैं), तो 'स्मृति' (Memory) और 'कर्म-फल' संभव नहीं है। अंततः राजा भोज ने शांतिसूरि को विजयी घोषित किया और उन्हें राजकीय सम्मान दिया। इस घटना ने जैन न्याय को भारतीय दर्शन में सर्वोच्च स्थान दिलाया।

5. जीवाविचार प्रकरण: जीव विज्ञान का तर्क

आचार्य शांतिसूरि का सबसे लोकप्रिय ग्रंथ 'जीवाविचार प्रकरण' (Jiva-Vichara Prakarana) है। यह ग्रंथ आज भी जैन पाठशालाओं में पढ़ाया जाता है। यह केवल धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि 'जैन जीव-विज्ञान' (Jain Biology) का तार्किक दस्तावेज है।

इसमें उन्होंने जीवों का वर्गीकरण (Taxonomy) अत्यंत सूक्ष्मता से किया है:
स्थावर जीव: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति।
त्रस जीव: दो इंद्रिय (लट), तीन इंद्रिय (चींटी), चार इंद्रिय (मक्खी), पंचेन्द्रिय (मनुष्य, पशु)।
इसमें उन्होंने 84 लाख जीव-योनियों का गणितीय और तार्किक विवरण दिया है, जो उस समय के विज्ञान के लिए एक आश्चर्यजनक उपलब्धि थी।

6. उत्तराध्ययन-वृत्ति: आगमों की तार्किक व्याख्या

जैन धर्म का अंतिम आगम 'उत्तराध्ययन सूत्र' (भगवान महावीर की अंतिम वाणी) माना जाता है। आचार्य शांतिसूरि ने इस पर एक विशाल टीका (Commentary) लिखी जिसे 'शिष्य-हिता' या 'पाइय टीका' कहते हैं।

इस टीका में उन्होंने केवल शब्दों के अर्थ नहीं बताए, बल्कि प्रत्येक सिद्धांत को न्याय (Logic) की कसौटी पर कसा। उन्होंने कथाओं (Stories) के माध्यम से गहन दार्शनिक तत्वों को समझाया। यह टीका इतनी प्रामाणिक मानी जाती है कि इसके बिना उत्तराध्ययन सूत्र का अध्ययन अधूरा माना जाता है।

7. दार्शनिक योगदान: अनेकांत और स्याद्वाद

एक तार्किक के रूप में शांतिसूरि का मुख्य योगदान 'स्याद्वाद' (Theory of Relativity of Truth) की रक्षा करना था।

  • बौद्ध मत का खंडन: बौद्ध कहते थे कि "वस्तु केवल अपने क्षण में सत्य है।" शांतिसूरि ने तर्क दिया कि "वस्तु नित्य भी है और अनित्य भी।" (जैसे सोने का कंगन—आकार बदलता है, पर सोना वही रहता है)।
  • वेदांत का खंडन: वेदांती कहते थे कि "जगत मिथ्या है।" शांतिसूरि ने तर्क दिया कि "जो अनुभव में आ रहा है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है? जगत सत्य है, पर परिवर्तनशील है।"

8. निष्कर्ष: शांतिसूरि की विरासत

आचार्य शांतिसूरि ने सिद्ध किया कि 'शांति' (Peace) और 'तर्क' (Logic) विरोधी नहीं हैं। उन्होंने अपनी शांतिपूर्ण वाणी से ही विरोधियों के कोलाहल को शांत कर दिया।

वे जैन परंपरा के उन गिने-चुने आचार्यों में से हैं जिन्होंने संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं में अधिकारपूर्वक लिखा। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सत्य की रक्षा के लिए तलवार की नहीं, बल्कि 'बुद्धि' की धार की आवश्यकता होती है। जब भी जैन न्याय (Jain Logic) का इतिहास लिखा जाएगा, 'वादिवेताल' शांतिसूरि का नाम स्वर्ण अक्षरों में सबसे ऊपर होगा।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • उत्तराध्ययन सूत्र (शांतिसूरि कृत टीका सहित)।
  • जीवाविचार प्रकरण - (गाथा और अर्थ)।
  • Jain Logic and Epistemology - Hari Satya Bhattacharya.
  • History of Jainism in Gujarat and Rajasthan.
  • प्रभावक चरित (Prabhavak Charitra) - (आचार्यों का जीवन वृतांत)।
विशेष नोट: यदि आपका आशय 8वीं शताब्दी के महान बौद्ध दार्शनिक 'शांतरक्षित' (Shantarakshita) से था (जो नाम में समानता के कारण भ्रमित कर सकते हैं), तो वे 'तत्वसंग्रह' के रचयिता हैं। किन्तु 'शांतिनाथ' या 'शांतिसूरि' नाम मुख्य रूप से जैन परंपरा में ही प्रसिद्ध है।

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