आचार्य अभिनवगुप्त: कश्मीर शैव दर्शन के शिखर, तंत्रालोक के रचयिता और 'शांत रस' के प्रतिष्ठापक | Acharya Abhinavagupta

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य अभिनवगुप्त: कश्मीर शैव दर्शन के शिखर और तंत्रालोक के दृष्टा

आचार्य अभिनवगुप्त: 'तंत्रालोक' के दृष्टा, प्रत्यभिज्ञा-दर्शन के महेश्वर और रस-सिद्धान्त के तार्किक व्याख्याता

एक गहन दार्शनिक और तार्किक विश्लेषण (A Detailed Treatise on Acharya Abhinavagupta, Kashmir Shaivism, and Aesthetics)

भारतीय दर्शन के इतिहास में 10वीं-11वीं शताब्दी का कालखंड कश्मीर के लिए स्वर्ण युग था। इस समय आचार्य अभिनवगुप्त (Abhinavagupta) का उदय हुआ, जिन्हें विद्वान 'महामाहेश्वर' कहते हैं। वे केवल एक दार्शनिक नहीं थे, बल्कि एक सिद्ध तांत्रिक, संगीतज्ञ और साहित्य-मीमांसक थे। उन्होंने शंकराचार्य के वेदांत की तरह 'जगत को मिथ्या' नहीं माना, बल्कि उसे 'शिव का विलास' (Play of Consciousness) मानकर स्वीकार किया। उनका दर्शन 'त्रिक' (Trika) या 'प्रत्यभिज्ञा' (Pratyabhijna) के नाम से जाना जाता है।

अभिनवगुप्त ने 'तंत्रालोक' जैसा विशाल ग्रंथ रचकर तंत्र-साधना को वैदिक ज्ञान के समकक्ष खड़ा किया और 'अभिनवभारती' लिखकर भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में 'शांत रस' को 9वें रस के रूप में तार्किक मान्यता दिलाई।

📌 आचार्य अभिनवगुप्त: एक दार्शनिक प्रोफाइल
पूरा नाम आचार्य अभिनवगुप्तपाद (Abhinavaguptapada)
काल लगभग 950 ई. – 1016 ई. (कश्मीर)
दर्शन (Philosophy) कश्मीर शैव दर्शन (त्रिक, प्रत्यभिज्ञा, क्रम, कुल)
प्रमुख गुरु लक्ष्मणगुप्त (दर्शन), शम्भुनाथ (कौल तंत्र), भट्ट तोत (काव्य)
मूल सिद्धांत स्वातन्त्र्य-वाद, आभासवाद, प्रकाश-विमर्श
विशाल ग्रंथ तंत्रालोक (37 आह्निक), ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी
टीका साहित्य अभिनवभारती (नाट्यशास्त्र), ध्वन्यालोक-लोचन (काव्य)

2. जीवन परिचय: योगिनी-भू और गुरु परंपरा

अभिनवगुप्त का जन्म कश्मीर में हुआ था। तांत्रिक परंपरा के अनुसार, उनका जन्म सामान्य काम-वासना से नहीं, बल्कि एक उच्च तांत्रिक समाधि (भैरव-भैरवी मिलन) के दौरान हुआ था, जिसे 'योगिनी-भू' कहा जाता है। बचपन से ही वे ज्ञान के पिपासु थे।

कहा जाता है कि उन्होंने 15 से अधिक गुरुओं से शिक्षा ली। उन्होंने:
बौद्धों से तर्कशास्त्र सीखा।
जैनों से नैतिकता सीखी।
वैष्णवों से भक्ति सीखी।
और अंत में अपने मुख्य गुरु शंभुनाथ से जालंधर पीठ में 'कौल-तंत्र' की दीक्षा ली।

3. तत्त्वमीमांसा: प्रकाश और विमर्श का अद्वैत

अभिनवगुप्त के दर्शन का केंद्र बिंदु 'प्रकाश' और 'विमर्श' का संबंध है। यह वेदांत के 'ब्रह्म' से भिन्न है।

"यदि निर्विमर्शः स्यात् अनीश्वरो जडश्च प्रसज्येत।
पारिच्छेद्यो न स्यात्, मणिदर्पणादिवत्॥"
अर्थ: (ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी) यदि परम तत्व (शिव) 'विमर्श' (स्वयं को जानने की शक्ति / I-consciousness) से रहित होता, तो वह ईश्वर नहीं, बल्कि जड़ होता। वह मणि या दर्पण की तरह होता जिसमें प्रतिबिंब तो पड़ता है, पर उसे 'मैं प्रतिबिंबित कर रहा हूँ'—यह ज्ञान नहीं होता।
मुख्य दार्शनिक अवधारणाएं
  • प्रकाश (Prakasha): शुद्ध चेतना (Pure Consciousness) या शिव। यह दर्पण के समान है।
  • विमर्श (Vimarsha): चेतना की अपने आप को जानने की शक्ति (Self-awareness) या शक्ति। यह दर्पण में दिखने वाला प्रतिबिंब है।
  • स्वातन्त्र्य (Absolute Freedom): शिव को जगत बनाने के लिए किसी 'माया' या 'अविद्या' की जरूरत नहीं है। वह अपनी इच्छा (स्वातन्त्र्य) से ही विश्व के रूप में प्रकट होता है। इसे ही 'आभासवाद' कहते हैं।

4. तंत्रालोक: साधना के चार उपाय

अभिनवगुप्त का सबसे महान ग्रंथ 'तंत्रालोक' (Light on Tantra) है। इसमें उन्होंने 37 अध्यायों (आह्निक) में संपूर्ण आगम शास्त्र का निचोड़ प्रस्तुत किया है। उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के चार उपाय (Methods) बताए हैं:

  • 1. आणव उपाय (क्रिया प्रधान): यह निम्न स्तर के साधकों के लिए है। इसमें मंत्र, जप, प्राणायाम, और बाह्य पूजा का सहारा लिया जाता है। यह 'भेद' (Duality) पर आधारित है।
  • 2. शाक्त उपाय (ज्ञान प्रधान): यहाँ साधक "मैं ही शिव हूँ" इस भावना (Thought construct/विकल्प) का मानसिक अभ्यास करता है। यहाँ 'यन्त्र' या 'मंत्र' की जगह 'चिंतन' मुख्य है।
  • 3. शाम्भव उपाय (इच्छा प्रधान): यह उच्च अवस्था है। इसमें 'विकल्प' (Thoughts) का त्याग करके केवल 'निर्विकल्प' इच्छा शक्ति के द्वारा शिव में प्रवेश किया जाता है।
  • 4. अनुपाया (आनंद प्रधान): यह सर्वोच्च स्थिति है जहाँ "कोई उपाय नहीं" (No method) है। गुरु की कृपा या तीव्र शक्तिपात (Descent of Grace) से साधक को तुरंत बोध होता है कि "मैं पहले से ही मुक्त हूँ, साधन की क्या आवश्यकता?"

5. प्रत्यभिज्ञा दर्शन: 'पहचान' का मनोविज्ञान

अभिनवगुप्त ने अपने गुरु उत्पलदेव के दर्शन को आगे बढ़ाते हुए 'प्रत्यभिज्ञा' (Recognition) का तर्क दिया।

"कर्ता स्वतन्त्रः आत्मा हि सर्वमाता प्रकीर्तितः।
चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परा वाक् स्वरसोदिता॥"
अर्थ: आत्मा ही स्वतंत्र कर्ता है और सब कुछ जानने वाला (सर्वमाता) है। चेतना (चिति) का स्वभाव ही 'प्रत्यवमर्श' (Self-reflection) है। यही 'परा वाक्' (Supreme Word) है जो अपने आप (स्वरस) उदित होती है।

तर्क: मोक्ष कुछ नया पाना नहीं है, बल्कि अपनी ही भूली हुई पहचान (कि मैं ही शिव हूँ) को वापस पाना है। जैसे कोई युवती अपने प्रेमी राजा को सामने देखकर भी नहीं पहचान पाती, लेकिन सखी के बताने पर उसे पहचान ("यह वही है!") होती है और आनंद मिलता है।

6. सौंदर्यशास्त्र: रस-ध्वनि और 'शांत रस' की स्थापना

अभिनवगुप्त ने भरतमुनि के 'रस-सूत्र' की जो व्याख्या 'अभिनवभारती' में की, उसने भारतीय कला चिंतन को बदल दिया। उन्होंने काव्य की आत्मा 'ध्वनि' (Suggestion) को माना और आनंदवर्धन के 'ध्वन्यालोक' पर 'लोचन' टीका लिखी।

साधारणीकरण (Universalization)

उन्होंने कहा कि नाटक देखते समय दर्शक का 'अहंकार' (Ego) लुप्त हो जाता है। वह राम या शकुंतला को 'व्यक्ति' के रूप में नहीं, बल्कि 'साधारण' (Universal) रूप में देखता है। यही कला का आनंद है।

शांत रस का तार्किक आधार

भरतमुनि ने 8 रस माने थे। अभिनवगुप्त ने 9वें रस (शांत रस) को स्थापित किया।

"स्वं स्वभावं शममपि...
तत्र सर्वरसानां शान्तप्राय एवास्वादः।"
अर्थ: (अभिनवभारती) चित्त का मूल स्वभाव 'शांति' (शम) है। जब रति, क्रोध, भय आदि की लहरें शांत हो जाती हैं, तो मन अपनी मूल अवस्था में लौटता है। अतः 'शांत' ही सभी रसों का आधार (Base) है और वही परम आस्वाद है।

7. प्रभाव और निष्कर्ष: भैरव गुफा का रहस्य

अपने जीवन के अंतिम समय में, अभिनवगुप्त ने 'भैरव-स्तोत्र' की रचना की। जनश्रुति के अनुसार, वे अपने 1200 शिष्यों के साथ कश्मीर की 'भैरव गुफा' (Bhairava Cave) में प्रवेश कर गए और सदेह शिव में विलीन हो गए।

आचार्य अभिनवगुप्त का दर्शन हमें सिखाता है कि तर्क (Logic), तंत्र (Ritual) और कला (Art) अलग-अलग नहीं हैं। ये सभी उस एक ही 'परम-संवित्' (Supreme Consciousness) तक पहुँचने के द्वार हैं। उनका दर्शन "त्याग" का नहीं, बल्कि "स्वीकार" का दर्शन है—जहाँ संसार शिव की ही क्रीड़ा है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • तंत्रालोक (भाग 1-12) - (हिन्दी व्याख्या सहित)।
  • ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी - अभिनवगुप्त।
  • अभिनवभारती (नाट्यशास्त्र टीका) - डॉ. नगेन्द्र।
  • Abhinavagupta: An Historical and Philosophical Study - K.C. Pandey.
  • The Triadic Heart of Siva - Paul Muller-Ortega.

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